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ड्राइवर ने जान पर खेलकर बचाई थी 50 लोगों की जिंदगी, मंजर याद कर रूह कांप जाती है

सलीम खुद बता रहे हैं कि उस रात खुद की जान बचाने की चिंता छोड़ कैसे बचाई कई जानें।

वीरेंद्र राय | Last Modified - Jan 26, 2018, 10:27 AM IST

  • ड्राइवर ने जान पर खेलकर बचाई थी 50 लोगों की जिंदगी, मंजर याद कर रूह कांप जाती है
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    (बाएं) बस ड्राइवर सलीम शेख।

    सूरत. 10 जुलाई 2017 को श्रीनगर में बस पर हुए हमले में 50 लोगों की जान बचाने वाले ड्राइवर को जीवन रक्षक पुरस्कार दिया जा रहा है, सलीम खुद बता रहे हैं कि उस रात खुद की जान बचाने की चिंता छोड़ कैसे उन्होंने केवल वो किया, जिससे बस में बैठे सभी यात्री सुरक्षित बच पाए।

    अचानक बरसने लगीं थी गोलियां

    - सलीम शेख के मुताबिक, सब कुछ तयशुदा चल रहा था। 9 जुलाई 2017 को हम सब दर्शनार्थियों ने बाबा अमरनाथ का दर्शन किया और दोपहर के दो बजे यात्रियों को लेकर चले, फिर शाम को श्रीनगर पहुंचे थे। सभी खुश थे कि अच्छी तरह से दर्शन हो गया था। हम सभी ने वहीं पर रात को विश्राम किया। अगले दिन सभी यात्रियों ने श्रीनगर घूमा। श्रीनगर घूमने के बाद हमारी बस शाम चार बजे रवाना हुई। यही कोई 4 से 5 किमी चले होंगे कि बस पंक्चर हो गई। बारिश भी हुई थी, जिसके कारण जैक लगाना मुश्किल हो रहा था। फिर भी किसी तरह टायर का पंक्चर ठीक करवाया गया। इसमें तकरीबन दो घंटे लग गए।

    - आगे उन्होंने बताया कि लगभग छह बजे बस वहां से रवाना हुई। रास्ते में अनंतनाग से कोई दो किमी पहले हमारी बस के दाहिनी ओर से एक बस्ती से पहले अचानक गोलियां बरसने लगीं। आतंकवादी दाहिनी ओर से एक दुकान की आड़ लेकर फायरिंग कर रहे थे। हमलावर कितने थे, यह कहना मुश्किल था, लेकिन जिस तेजी से फायरिंग हो रही थी उससे यही अनुमान लगाया जा सकता था कि वे पांच से छह की संख्या में रहे होंगे। सामने से हुई अचानक फायरिंग से हम सभी डर गए। डर था कि कहीं मुझे गोली लगी तो बस दुर्घटनाग्रस्त हो जाएगी, तब शायद ज्यादा लोग घायल होंगे और आतंकी भी अपने मंसूबों में कामयाब हो जाएंगे।

    गोलियों से बचते हुए बस को निकाला था

    बकौल सलीम, तब तक केबिन में बैठे कंडक्टर मुकेश पटेल को गोली लग चुकी थी। कुछ समझते इससे पहले दो गोली बस मालिक हर्ष देसाई के कंधे और नाक पर आ लगी। अब डर और बढ़ गया। मैं चूंकि दाहिनी ओर ही था, इसलिए गोलियों से बचते हुए बस को निकालना भी मेरी जिम्मेदारी थी। डर के बावजूद मुझे लगा कि अगर बस रोकी तो हमलावर हावी हो जाएंगे। चूंकि मैं कई सालों से अमरनाथ यात्रा पर जा रहा था, इसलिए मुझे पता था कि हर एक-दो किमी पर आर्मी कैंप होता है, इसलिए मैंने निर्णय लिया कि जल्द से जल्द बस भगाकर पहले आर्मी कैंप में ले जाऊं। मैंने ऐसा ही किया।

    आर्मी कैंप तक पहुंचने पर ही बस रोकी

    इधर, बस में गोलियों की आवाज से ज्यादा कांच के टूटने और लोगों के चिल्लाने की आवाजें सुनाई दे रही थीं। उस समय मुझे यह नहीं पता चला कि केबिन के पीछे बैठे यात्रियों को भी गोली लगी है। बस लोगों के चीखने और चिल्लाने की आवाजें सुनाई दे रही थीं। हां, इतना जरूर था कि बस मालिक हर्ष देसाई और कंडक्टर मुकेश पटेल मेरे सामने घायल अवस्था में पड़े थे। घायल होने के बावजूद हर्ष भाई ने मुझे आगे बढ़ने का इशारा किया। अंधेरा होने के बावजूद बस को तेजी से आगे बढ़ाया। गनीमत यह थी कि रोड समतल था। छोटे-मोटे मोड़ रास्ते में पता चला कि दूसरे यात्रियों को भी गोली लगी है, लेकिन, हम इतने सहमे थे कि बस रोकने की स्थिति में नहीं थे। एक किमी की दूरी पर आर्मी कैंप था, जहां पहुंचने पर ही बस रोकी।

    खौफनाक मंजर याद आते ही रूह कांप जाती है

    आर्मी वालों ने तत्‍काल हमारी बस को कवर किया और सभी घायलों के इलाज की व्यवस्था की, लेकिन अफसोस हमारे साथ गए सात तीर्थ यात्रियों की मौत हो गई। इसका मलाल मुझे आजीवन रहेगा। आर्मी कैंप पहुंचने पर वहां मौजूद अधिकारियों ने सभी घायलों के इलाज का इंतजाम कराया। वह खौफनाक मंजर आज भी मेरे आंखों के सामने तैरता है तो रूह कांप जाती है। बस में सवार लोगों की चीखें आज भी विचलित कर देती हैं।

    अब तक अवॉर्ड की सूचना नहीं
    वलसाड निवासी ड्राइवर सलीम शेख को अब तक सरकार की तरफ से देश के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार alt147जीवन रक्षा पदक' के लिए चुने जाने की सूचना नहीं मिली है। भास्कर से बात करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात की जानकारी अखबार और न्यूज चैनल से मिली है, लेकिन स्थानीय प्रशासन की तरफ से ऐसी कोई जानकारी उन्हें नहीं दी गई है। सलीम ने कहा कि उन्हें 26 जनवरी को दिल्ली अवॉर्ड लेने जाना है, लेकिन मुझे अब तक पता नहीं।
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    सीएम विजय रूपाणी के साथ ड्राइवर सलीम।
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    कश्मीर में अमरनाथ यात्रियों की जान बचाने वाले बस ड्राइवर सलीम शेख के परिवार को अपने बेटे पर गर्व है।
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