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ये डायमंड King वर्कर्स को देता है कार-फ्लैट, खुद के बेटे को भेजा था चॉल में

जहां नीरव मोदी व्यापारियों का नाम डुबोए हैं, वहीं इस हीरा व्यापारी ने बिजनेस में ट्रांसपेरेंसी की मिसालें कायम की हैं।

Dainik Bhaskar

Feb 19, 2018, 07:13 PM IST
Diamond trader savji dholakiya success story and tips to son

सूरत. डायमंड ज्वैलर नीरव मोदी 11 हजार करोड़ के फ्रॉड को लेकर चर्चा में हैं। नीरव और उनके मामा मेहुल चौकसी से जुड़ी 200 से ज्यादा शेल कंपनियां जांच के दायरे में हैं। एक ओर जहां नीरव ने हीरा कारोबारियों को बदनाम किया है, वहीं इसी फील्ड से जुड़े सूरत के सावजी ढोलकिया अपने कामों से नई मिसालें कायम कर रहे हैं। DainikBhaskar.com इसी इंस्पायरिंग बिजनेसमैन के बारे में बता रहा है।

13 की उम्र में छोड़ा था स्कूल

- सावजीभाई शून्‍य से शिखर पर पहुंचने वाली शख्सियत हैं। वे गुजरात के अमरेली जिले के डुढाला गांव से ताल्लुक रखते हैं। इनके पिता किसान थे। आर्थिक तंगी के चलते इन्होंने 13 साल की उम्र में पढ़ना छोड़ दिया था।
- सावजी 1977 में अपने गांव से साढ़े बारह रुपए लेकर सूरत अपने चाचा के घर पहुंचे थे, जो कि एक हीरा व्यापारी थे। इन्होंने वहीं डायमंड ट्रेडिंग की बारीकियां सीखीं।

1984 में शुरू की खुद की कंपनी, आज टर्नओवर 5500 करोड़

- 1984 में इन्होंने अपने भाई हिम्मत और तुलसी के साथ मिलकर हरि कृष्णा एक्सपोर्टर्स नाम से अलग कंपनी शुरू की।
- इस कंपनी का प्रेजेंट में ईयरली टर्नओवर 5500 करोड़ रुपए है। यह कंपनी डायमंड और टेक्‍सटाइल सेगमेंट में काम करती है। इनकी कंपनी क्वालिटी के साथ ही ट्रांसपेरेंसी के लिए मशहूर है।

कर्मचारियों को बोनस में दिए कार-फ्लैट

- सावजीभाई हर साल दिवाली बोनस के तौर पर कर्मचारियों को फ्लैट, कार, स्‍कूटर और ज्‍वैलरी बॉक्‍स देने के लिए मशहूर हैं। पिछले साल इन्होंने अपने सभी कर्मचारियों को बोनस में कार दी थीं।

बेटा न समझे खुद को Super Rich, दी थी ऐसी कड़ी ट्रेनिंग

- सावजी ढोलकिया के बेटे द्रव्य ने न्यूयॉर्क की पेस यूनिवर्सिटी से MBA किया है। प्रेजेंट में वे अपना फैमिली बिजनेस न्यूयॉर्क से ऑपरेट करते हैं। अरबपतियों में शुमार होने के बावजूद द्रव्य डाउन टू अर्थ हैं। इसके पीछे इनके पिता द्वारा दी कड़ी ट्रेनिंग है।
- ग्रैजुएशन के दौरान द्रव्य पिता सावजीभाई के साथ बिजनेस मीटिंग के लिए लंदन गए थे। पापा को पापड़ खाने का शौक है, इसलिए बेटे ने रेस्टोरेंट में खाने के साथ पापड़ भी ऑर्डर कर दिया।
- खाने के बाद जब बिल आया तो उसमें एक पापड़ की कीमत चार पॉन्ड (360 रुपए लगभग) दर्ज थी। उस समय सावजीभाई ने बेटे से कुछ नहीं कहा, लेकिन मन ही मन तय कर लिया कि बेटे को पैसे की कीमत समझाना जरूरी है।
- MBA कंप्लीट होने के बाद जब द्रव्य न्यूयॉर्क से सूरत लौटे तो सावजीभाई ने उसे फैमिली बिजनेस में शामिल करने की जगह फ्रैशर की तरह जॉब करने के लिए कहा।

आगे पढ़ें, कैसी रही करोड़पति डायमंड किंग के बेटे की ट्रेनिंग...

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ढोलकिया परिवार में है परंपरा

 

- सावजी ढोलकिया के परिवार में परंपरा है कि परिवार बच्चों को फैमिली बिजनेस ज्वाइन करने से पहले बेसिक जॉब स्ट्रगल की ट्रेनिंग लेने के लिए बाहर भेजा जाता है। 
- सावजी ने अपने बेटे पर भी इसे लागू किया। परंपरा के तहत बच्चों को घर से दूर किसी भी प्रकार के साधन-सुविधा के बगैर भेजा जाता है।
- शर्त होती है कि जहां भी जाएंगे, अपने-पिता अथवा परिवार की पहचान नहीं बताएंगे। सामान्य व्यक्ति की तरह कपड़े साथ होते हैं। फोन भी नॉर्मल वाला। सस्ते में सस्ती जगह पर रहने-खाना भी अनिवार्य होता है। इसके अलावा एक महीने में तीन नौकरियां तलाश करनी होती हैं।

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36 घंटे रहना पड़ा भूखा

 

 

- द्रव्य ढोलकिया जॉब के लिए पहले कोच्चि पहुंचे थे। शुरुआत में हर जगह ना ही सुनने को मिला, लेकिन कोशिश नहीं छोड़ी। 
- पहली जॉब एक BPO में मिली। इसका काम अमरीकी कंपनी के सोलर पैनल बेचने का था। काम शुरू कर दिया, लेकिन सप्ताह भर में ही मेहनताना लिए बिना छोड़ दिया। 
- शर्त के मुताबिक उन्हें एक ही वीक में दूसरी नौकरी तलाश करनी थी। इसके चलते 36 घंटे तक भूखा रहना पड़ा। दूसरी नौकरी बेकरी और तीसरी एक रेस्टोरेंट में मिली। 
- रेस्टोरेंट में जीकॉम लिमिटेड नामक कंपनी के फाइनेंस मैनेजर श्रीजिथ खाना-खाने आते थे। श्रीजिथ से द्रव्य ने नौकरी के लिए बात की, लेकिन बात बनी नहीं। चौथी नौकरी द्रव्य को मैकडोनॉल्ड में मिली, लेकिन समय की कमी के चलते वे वहां ज्वाइन नहीं कर नहीं सके। 
- द्रव्य ने तीन हफ्तों का समय कोच्चि की एक चाल में बिताया, जिसका मासिक किराया 350 रुपए था।

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क्या सीखा द्रव्य ने

 

- द्रव्य ने एक इंटरव्यू में अपने ट्रेनिंग एक्सपीरियेंस के बारे में बताया, "पापा की इस कड़ी ट्रेनिंग ने मुझे कई बातें सिखाईं। पहली ये कि संभव हो सके उतना लोगों की मदद करो एवं उनका ख्याल रखो। मुझे जूते खरीदने का शौक था, जो अब नहीं है। अब ऐसा लगता है कि मेरे सभी शौक बेकार थे।" 
- "दूसरी बात जो सीखी वो थी हर सिचुएशन आपको कुछ सिखाती है। हमें कोशिश करना चाहिए हर अच्छे-बुरे एक्सपीरिएंस से लर्निंग जरूर लें। इन सब बातों के साथ ही मैंने त्याग और दूसरों की पीड़ा समझना भी सीखा।"

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