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ये बिजनेसमैन आदिवासी बच्चों के लिए बनवा रहे हॉस्टल, 27 हॉस्टल बन चुके, 81 का काम जारी

हीरा कारोबारी हैं। केशुभाई ने एक किताब में आदिवासी किसानों के बच्चों की समस्याओं के बारे में पढ़ा।

धीरेंद्र पाटिल | Last Modified - Feb 19, 2018, 07:25 AM IST

ये बिजनेसमैन आदिवासी बच्चों के लिए बनवा रहे हॉस्टल, 27 हॉस्टल बन चुके, 81 का काम जारी

सूरत.सूरत के रहने वाले केशुभाई गोटी हीरा कारोबारी हैं। केशुभाई ने एक किताब में आदिवासी किसानों के बच्चों की समस्याओं के बारे में पढ़ा। इसने केशुभाई को इतना आहत किया कि उन्होंने फौरन आदिवासी किसानों के बच्चों के लिए 108 छात्रावास बनवाने का संकल्प ले लिया। अब तक केशुभाई ऐसे 27 हॉस्टल बनवा चुके हैं। 81 और हॉस्टल बनवाने के लिए काम जारी है। एक हॉस्टल बनवाने में 25 से 30 लाख रुपए का खर्च आता है।

इस रकम का 50% हिस्सा केशुभाई देते हैं, बाकी 50% रकम लोगों की मदद से जुटाते हैं।केशुभाई दक्षिण गुजरात के डांग, वलसाड, नवसारी, व्यारा से लेकर दाहोद तक के आदिवासी क्षेत्रों में ये छात्रावास बनवा रहे हैं। केशुभाई को ये पहल करने की प्रेरणा उनके खुद के संघर्ष से मिली। कभी उन्हें नौकरी तक से निकाल दिया गया था, लेकिन आज केशुभाई करोड़ों का हीरा कारोबार कर रहे हैं। केशुभाई 1972 में हीरे का काम करने के लिए मुंबई गए थे। तब उनके पास सफर का किराया और ढंग के पकड़े तक नहीं थे। एक रिश्तेदार ने केशुभाई की मदद की। उन्होंने मुंबई में हीरे से जुड़ा काम सीखा और वापस सूरत आ गए। यहां एक कंपनी में काम तो मिला पर मालिक ने यह कहकर निकाल दिया कि- तुम्हें ठीक से काम नहीं आता। केशुभाई यहां भी हताश नहीं हुए और अपनी जमापूंजी से सूरत में ही छोटे पैमाने पर हीरे का कारखाना शुरू किया। आज उनके इस कारखाने में 500 कारीगर काम करते हैं।

करीब 200 करोड़ का कारोबार फैला है। वे सूरत, वल्लभीपुर, डांग में 25 से ज्यादा सामाजिक संस्थाओं में जुड़े हैं। अपनी मां के नाम से बने ट्रस्ट काशीबा हरिभाई गोटी चैरिटेबल के माध्यम से केशुभाई जरूरतमंदों की मदद करते रहते हैं। समाज को कुछ लौटाने की इच्छा के चलते ही उन्होंने गरीब किसानों के लिए 108 हॉस्टल बनवाने का ये संकल्प लिया।

केशुभाई बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के लिए भी काम कर रहे

केशुभाई गोटी बताते हैं कि- ‘मैं काफी समय से भूमिपुत्र मैग्जीन पढ़ता रहा हूं। इसी मैग्जान में एक बार किसानों और भूमिहीन लोगों के हालातों के बारे में पढ़ा। उनकी समस्याएं वाकई में बहुत भीषण लगीं। मैं बचपन से विनोबा भावे के विचारों से प्रभावित रहा हूं। इन्हीं विचारों की वजह से मुझे लगा कि ऐसे गरीबों के लिए कुछ करना चाहिए। छात्रावास बनने से बच्चों के रहने की उचित व्यवस्था हो सकेगी। मैं मानवतानी महेक सेवा मंडल के साथ मिलकर आदिवासी क्षेत्र के छात्रावासों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन मुहैया कराने की भी कोशिश में लगा हूं।’

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