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हम इंसान हैं जानवर नहीं, सत्य की खातिर आग्रहपूर्वक ना कहना, उसी का नाम सत्याग्रह

प्रतिज्ञा तोड़ने वाले देश के काम के नहीं हैं, सरकार के काम के भी नहीं और ईश्वर के काम के भी नहीं

किशोर उपाध्याय, जुल्फिकार तुंवर, संकेत शाह/नरेश खींची | Last Modified - Mar 22, 2018, 03:29 AM IST

  • हम इंसान हैं जानवर नहीं, सत्य की खातिर आग्रहपूर्वक ना कहना, उसी का नाम सत्याग्रह
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    खेड़ा सत्याग्रहियों की टुकड़ी... होमरूल की हवा चल रही है, हर गांव में होमरूल की स्थापना की जा रही है। प्रजा जागृत हुई है लेकिन अभी संपूर्ण जागृति नहीं हुई है। ऐसे में इस जंग की शुरुआत हुई है। गांधीजी और सरदार की अगुवाई में खेड़ा सत्याग्रहियों ने देश को नई दिशा दिखाई है।

    खेड़ा.गुजरात के खेड़ा जिले के किसानों के लिए महात्मा गांधीजी ने दशा श्रीमाली की वाड़ी में सत्याग्रह का एलान किया था। गांधीजी ने लोगों को संबोधन किया कि हम लोग इंसान हैं जानवर नहीं हैं। सत्य की खातिर आग्रहपूर्वक ना कहना ही सत्याग्रह है। सत्याग्रह की स्थापना कर मंडप डालने के लिए हम लोग यहां इकट्ठा हुए हैं। हमें सरकार को राजस्व नहीं देकर लड़ाई के लिए तैयार रहना है, उसके लिए जो भी सहन करना पड़े हम करेंगे। आप लोग लड़ोगे तभी सरकार मानेगी कि आप लड़ने वाले हो प्रतिज्ञा का पालन करने वाले हो। प्रतिज्ञा तोड़ने वाले देश के काम के नहीं, सरकार के काम के नहीं और ईश्वर के काम के भी नहीं। मेरी आपसे एक ही गुजारिश है कि दुख सहन करना लेकिन राजस्व मत भरना।


    सरकार के सामने साबित कर देना कि हम लोग दुख सहन करेंगे, लेकिन राजस्व नहीं देंगे। जिस काम के लिए हम लोग यहां इकट्ठा हुए वह प्रसंग इतना महत्वपूर्ण है कि वह हमारी यादों में हमेशा रहेगा। सरकार राजस्व नहीं ले इस बारे में जिले में कई दिनों से आंदोलन चल रहे हैं। फसल चार आनी से कम हुई है इसलिए राजस्व नहीं लेना चाहिए।

    सभा की सहमति से मैंने जिले में कई जगहों पर जाकर जांच की और हमारे दूसरे भाइयों ने भी जांच की। जांच के बाद पता चला है कि जिले में इस साल चार आनी से कम फसल हुई है। सरकार लोगों की मांग सुनने को तैयार नहीं है, उसने तो राजस्व वसूलने का फैसला लिया है। नहीं देने पर सख्त कार्रवाई करने के संकेत दे रही है। चौथाई एवं जमीन खालसा करने की नोटिस निकाली गई है। तलाटियों के जुल्म की शिकायतें भी मिल रही हैं। सभा में जो तलाटी और मुखी पधारे हैं उन्हें मैं बता देना चाहता हूं कि सरकार से वफादार ठीक है, लेकिन जुल्म करने में वफादारी ठीक नहीं है।


    कठलाल में सत्याग्रह के बीज रोपे गए
    गांधीजी 18 फरवरी 1918 के दिन कठलाल की एम.आर. शाह हाईस्कूल में रुके थे। यहीं पर जनसभा को संबोधन किया था और सत्याग्रह की शुरुआत की थी। सत्याग्रह सेना के प्रेरक मोहनलाल पंडया भी कठलाल के हैं। गांधीजी ने किसी की हवेली में रुकने से बेहतर पाठशाला के आंगन में रुकना ही पसंद किया था।

    खेड़ा सत्याग्रह की कहानी, बापू की जुबानी

    जितनी विनती करनी थी कर ली, उसके बाद ही सत्याग्रह की शुरुआत की है

    मजदूरों की हड़ताल खत्म होने के बाद मुझे सांस लेने की फुरसत भी नहीं मिली और खेडा जिले के सत्याग्रह का काम शुरू करना पड़ा। जिले में अकाल की स्थिति होने से राजस्व माफ करने की मांग पाटीदार किसान कर रहे थे। इस बारे में श्री अमृतलाल ठक्कर ने जांच कर रिपोर्ट सौंप दी थी। मैं किसी भी प्रकार की सलाह देने से पहले कमिश्नर से मिला।


    श्री मोहनलाल पंडया और श्री शंकरलाल पारीख कड़ी मेहनत कर रहे थे। स्व. गोकलदास कहानदास पारेख और श्री विट्ठलदास पटेल के जरिए विधानसभा में बात रखी जा रही थी। सरकार के पास डेपुटेशन पहुंचे थे। इस समय मैं गुजरात सभा का प्रमुख था। सभा ने कमिश्नर, गवर्नर को अर्जी की, तार लिखे, अपमान सहन किए लेकिन कुछ नहीं हुआ। उस समय अमलदारों का दौर इस समय हास्यास्पद लगता है। अमलदारों का उस समय का हल्के स्तर का बर्ताव असंभावित लगता है। लोगों की मांग इतनी साफ और सही थी कि उसके लिए आंदोलन करने की जरूरत ही नहीं थी। फसल चार आनी या उससे भी कम होने पर उस साल राजस्व माफ करने का नियम था।


    लोग बता रहे थे कि आंकणी चार आना से कम होनी चाहिए। सरकार के नहीं मानने पर लोग समिति का गठन करने की मांग कर रहे थे। सरकार को वह मंजूर नहीं था। जितनी विनती करनी थी करने के बाद साथियों से विचार विमर्श करने के बाद सत्याग्रह करने की सलाह मैंने दी थी।


    साथियों में खेड़ा जिले के सेवक समेत श्री वल्लभ भाई पटेल, श्री शंकरलाल ठक्कर, श्री अनसुयाबहन, श्री इंदुलाल कन्हैयालाल याज्ञिक, श्री महादेव देसाई इत्यादि थे। वल्लभ भाई अपनी वकालत से समय निकाल कर आए थे। हमने नडियाद अनाथ आश्रम में रहना तय किया था। नडियाद में इतनी बड़ी संख्या में लोगों को रखने के लिए और कोई दूसरा मकान नहीं था।

    जहां अहिंसा और सत्य है वहां मोहन है और जहां मोहन वहां जय है

    - खेड़ा जिले के किसानों के शुरू किए सत्याग्रह के यज्ञ की पूर्णाहुति का कार्यक्रम 29 जून के दिन नडियाद में मनाया गया था। जिसमें फूलचंदभाई ने गांधीजी को मानपत्र दिया था। जिसमें बापू की गुरु और भगवान से तुलना की गई थी। बापू के लिए सम्माननीय शब्द कुछ इस प्रकार लिखे थे, जहां पर अहिंसा और सत्य है वहां पर मोहन है और जहां मोहन है वहीं पर जय है।

    - आप जैसे उत्तम कर्मयोगी आचार्य की चरण में रह कर हमने धर्म, अधर्म और लोभ के स्वरूप को पहचान कर अहंकार रहित होकर शुद्ध कार्य किया उतनी सफलता हमें मिली। श्रीकृष्ण भगवान की भूमि माता की गोद में पले बड़े हुए, आपने इस धरती का गौरव बढ़ाया है। चरोतर अंचल की आज निर्बल हो रहे किसानों को आपने मंत्र दिया कि अत्याचार को ज्ञानपूर्वक और विनय से सहन करने पर उसका नाश होता है।


    मान का भूखा सेवाधर्म से भ्रष्ट होता है: गांधीजी
    - सत्याग्रह के समापन के वक्त दिए गए मानपत्र के जवाब में गांधीजी ने कहा कि मानपत्र के बदले में मैं आपका आभारी हूं। जो इंसान सेवाधर्म को कबूल करता है उस इंसान को मान-सम्मान की भूख नहीं रहती।

    - उन्होंने सर्वस्व कृष्णार्पण किया होता है। सेवाधर्मी मान की भूख नहीं रख सकता। मान की भूख होने पर उसी समय वह सेवाधर्म से भ्रष्ट हो जाता है। मान का भूखा मनुष्य खुद को ही नहीं बल्कि प्रजा को भी नुकसान पहुंचाता है।

    अंग्रेज सरकार ने हद पार कर दी, कहा- बीवी-बेटा बेचकर पैसा भरो

    पैसा भरने के लिए सरकार द्वारा सीमा ही पार कर दिया गया था। लोगों को खुलेआम गाली दी जाती थी। ह्रदय कांप जाए ऐसे मामले भी बने। इन बातों से सत्याग्रह को बल मिला।
    1-खेड़ा के दैयप गांव के मुस्लिम किसान ने दर्द व्यक्त करते हुए कहा है कि गांव में लेखपाल (तलाटी) काला कहर बरपा रहे हैं। दो दिन से वहां लोगों को नजरबंद रखे हैं। पत्नी के सामने चलाटी अशोभनीय गाली देते हैं। घर बेचो, जेवर बेचो, जमीन बेचो, पशु बेचो और अंत में बीबी और बेटा बेचकर भी सरकार का पैसा भरने के लिए धमकी देते हैं।
    2-बारसीदा के एक किसान ने जमीन का लगान भरने के खातिर अपनी 10 वर्ष की कन्या का विवाह कर जमाई के पास से 15 रुपए लेने पड़े थे। उसके रिश्तेदारों से पूछने पर पता चला कि उसने कन्या के बदले में लिए रुपए जमीन का लगान भरने के सिवाय कोई दूसरे कारण से लिया होगा तो उसे बिरादरी से बाहर कर दिया जाता।
    3- कपडवंज तालुका के मामलतदार वीबी पटेल ने 1/1/1918 नए वर्ष पर एक सूचना जारी कर खुली धमकी दी कि यदि पैसा नहीं भरा गया तो सख्ती से इलाज किया जाएगा। मुल्की पुलस पटेल तथा मामलतदार पटेल सरकारी समयानुसार पैसा न भरे और दंजित न करें तो कानून के अनुसार नौकरी के लिए अयोग्य ठहराना, राजस्व न भरने वाले की स्थावर संपत्ति जब्त होगी। राशि न भरने के लिए उकसाने वाले की राशि बाकी हो तो उसके चौथाई दंड के साथ वसूली की जाती।
    4-किसानों को डराने के लिए अमलदारों ने जब्ती में ली जा सके ऐसी चीज होने के बाद भी दूध देने वाली भैंस को जब्ती में लेकर उसे तुरंत ही धूप में बांधते थे। कई जगहों पर तो उनके बच्चा से भी अलग रखा जाता था। बच्चे रुदन करते, स्त्रियां रोती थीं। किसानों के माल की नीलामी की जाती थी?
    5- अंग्रेज प्रमुख प्रो. पेटे जमीनका खलसा कर किसानों को भींख मांगने के लिए धमकी देता। किसानों पर चोरी का आरोप लगाया। गाना गांव के 10 वर्षीय बालक पर भी चोरी का आरोप लगाया गया।

    पाठकों के ध्यानार्थ: ऐतिहासिक दस्तावेज

    - खेड़ा सत्याग्रह के 100 वर्ष हो गए हैं। गांधीजी के प्रयोग गुजरात में यह पहला प्रयोग था। इसी सत्याग्रह से देश को सरकार मिली। हम मानते हैं कि खेड़ा सत्याग्रह से आज की पीढ़ी को भी जानकारी होनी चाहिए। दैनिक भास्कर इस अवसर पर पाठकों को एक एेतिहासिक दस्तावेज दे रहा है, जिसे संभालकर रखा जा सके।

    - इस अंक की जानकारी के लिए खेड़ा का आंदोलन (शंकरलाल पारीख), सरकार का जीवन चरित्र भाग-1 (यशवंत दोशी), महात्मा लाइफ आॅफ मोहनदास करमचंद गांधी वॉल्यूम-1 (डीजी तेंदुलकर), अग्निकांड में उगा गुलाब (नारायण देसाई), सत्य का प्रयोग (महात्मा गांधी), गांधी हेरिटेज पार्टल और अन्य वेबसाइट की भी मदद ली गई है। गांधी वन स्कोलरडा. त्रिदीप सूद का खास आभार।

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    नडियाद का सत्याग्रह मंदिर : आंदोलन भी देखा, गांधीजी की बीमारी भी
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    टीम महात्मा गांधी- ये हैं खेड़ा सत्याग्रह की ब्रिगेड। वल्लभभाई पटेल और महादेव देसाई। गोकुलदास पारेख-दादासाहेब मावलंकर, विट्‌ठलभाई- शंकरलाल बेंकर
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    ये हैं गांधी के शिष्य, जो उनके लिए जान देने को तैयार...गोपालदास विहारीदास-शंकरलाल परीख, इन्दूलाल याज्ञिक-फूलचंदजी बापूजी शाह, नरहरि पारीख-गोकुलदास तलाटी
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    जब मोहनलाल को मिला ‘प्याज चोर’ का सम्मान

    सरकार ने मातर तालुका के नवागांव के एक किसान की जमीन खालसा करके उसमें की एक बंर की फसल को जब्त माना गया। लेकिन खालसा की नोटिस में इस नंबर को न बताए जाने से उस नंबर को खालसा नहीं माने जाने की बात को गांधीजी ने पहले ही कलेक्टर को लिखकर बताया है। काशीभाई देसाईभाई की जमीन में करीब 6 सौ रुपए की प्याज की फसल थी। बरसात पड़ने से फसल सड़ सकती है। ऐसा होने से गांधीजी ने पूछकर प्याज लेने का निर्णय लिया। इसके लिए कठलाल के मोहनलाल कामेश्वर पंड्या के नेतृत्व में गांव के दो सौ लोगों ने 4 जून को खेत में जाकर प्याज खोजने लगे। अंग्रेस सरकार मोहनलाल पंड्या और नवागांव के निवासियों में भूलाभाई देसाईभाई, काशीभाई देसाईभाई, हीमाभाई हाथीभाई, हरियाल भट्‌ट तथा देवशंकर नाथजी पर चोरी का आरोप लगया।


    कई लोगों को 10 दिन की और मोहनलाल सहित तीन लोगों को 20 दिन की सामान्य कैद की सजा सुनाई गई। उनकी रिहाई के समय गांधीजी स्वयं सात मील चलकर खेड़ा पहुंचे और मोहनलाल सहित सभी का स्वागत किया। इस घटना से मोहनलाल पंड्या को प्याज चोर का खिताब मिला।

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