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कच्छ के रण में ऐसी है मजदूरों की जिंदगी, गड्‌डे खोद कर खारे पानी के सहारे गुजरा

भास्कर रिपोर्टर ने 24 घंटे गुजारे कच्छ के रण में 15 हजार नमक श्रमिकों के इलाके में।

Danik Bhaskar | Jan 10, 2018, 09:38 AM IST

अहमदाबाद. ये टेंट नहीं, कच्छ के छोटे रण क्षेत्र में नमक श्रमिकों के बच्चों के स्कूल हैं। प्राथमिक सुविधाएं भी इनके लिए दूर की कौड़ी है। नमक श्रमिकों के बच्चों को इन्हीं के बीच से पढ़कर निकले 10-12वीं तक पढ़े बच्चे सेवाभाव से पढ़ाते हैं। कच्छ के छोटे रण क्षेत्र के खाराघोडा, झिझूवाडा एवं साथलपुर आदि इलाकों में ऐसे 13 स्कूल हैं। ये स्कूल भी सर्वशिक्षा अभियान के तहत विविध संगठनों की मदद से चलाए जा रहे हैं। 15000 नमक श्रमिकों की जिंदगी के संघर्ष-साहस को जानने के लिए भास्कर रिपोर्टर ने 24 घंटे इनके बीच बिताए।

15000 परिवारों को 10 दिन में एक बार पानी की सप्लाई

- 5000 वर्ग मीटर क्षेत्र में रहने वाले इन 15000 परिवारों को 10 दिन के अंतराल पर पेयजल की आपूर्ति होती है। बाकी दिन 50 मीटर तक के गड्‌डे खोद कर खारे पानी के सहारे गुजर करनी पड़ती है।

- रण में अलग-अलग हिस्सों में 150 किमी की यात्रा की। इस दौरान सभी जगह नमक श्रमिकों के जीवन में एक ही समानता नजर आ आई-अभाव और दयनीयता। हालांकि, कुछ संगठन अब सोलर पैनल सहित उपकरण मुहैया करवा कर इनके जीवन स्तर को ऊंचा उठाने का प्रयास भी कर रहे हैं, लेकिन ये सब फिलहाल ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।

यहीं जन्में हैं, यहीं मर जाना है

- कंचन बहन नमक श्रमिक इन अभावों को अपनी नियति मान चुके हैं। 50 साल की कंचनबहन राषुजा कहती हैं कि- मेरा जन्म रण में हुआ, रण में पूरी जिंदगी बिता दी है। नमक पकाने में। अब शरीर भी जवाब देने लगा है। न तो पीने का पानी रोज मिलता है, न बच्चों को दूध। 10 दिन में सरकारी टैंकर से पेयजल आता है।

- रोजाना इस्तेमाल के लिए भी पानी मयस्सर नहीं होता। दाल -रोटी रोज का खाना है। पास के गांवों से यदि कोई सब्जी दे गया हो तब ही बन पाती है। शौचालय दूर की बात है। नमक श्रमिक अभावों के बीच गुजर करने को मजबूर हैं। कारण 1972 से लिटिल रण ऑफ कच्छ का बड़ा हिस्सा घुडखर अभ्यारण्य बन गया है। इस कारण नमक श्रमिकों लीज पट्टे भी नहीं मिलते। कुए से 24 घंटे पानी निकालने के लिए डीजल की जरूरत होती है