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ये है गुजरात की ‘पेड गर्ल’, इस तरह से बनाए ईको फ्रेंडली पेड्स

आनंद निकेतन स्कूल के इस प्रोजेक्ट जोन से राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन के लिए चयनित।

Dainikbhaskar.com | Last Modified - Jan 31, 2018, 04:36 PM IST

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    कक्षा 9 की धार्मि पटेल और राजवी पटेल।

    महेसाणा। देश में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार 80 प्रतिशत महिलाएं बाजार में मिलने वाले सेनेटरी पेड का इस्तेमाल नहीं कर पातीं। महेसाणा की आनंद निकेतन स्कूल की दो स्टूडेंट्स ने केले के पेड़ की डालियों के रेशों से कम खर्च में सेनेटरी पेड बनाया हैं। स्वास्थ्य और पर्यावरण के अनुकूल इस सेनेटरी पेड का चयन वडोदरा में आयोजित सीबीएससी के जोन स्तर के विज्ञान प्रदर्शनी के लिए किया गया है। यह प्रोेजेक्ट अब फरवरी में दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय स्तर की विज्ञान प्रदर्शनी में प्रस्तुत किया जाएगा। टेस्टिंग के लिए अस्पताल के गायनेक विभाग में दिया….

    स्कूल द्वारा 15 सेम्पल टेस्टिंग के लिए सिविल अस्पताल के गायनेक विभाग में दिए गए हैं। स्कूल प्रबंधन इसे एक गृह उद्योग के रूप में विकसित करने की योजना बना रहा है। शाला संचालक बिपीन भाई पटेल और प्रिंसीपल डॉ. ट्रेशा पॉले ने बताया कि स्कूल के शिक्षक जॉनी अब्राहम और तपस्या ब्रह्मभट्अ के मार्गदर्शन में कक्षा 9 की स्टूडेंट्स धार्मि पटेल ओर राजवी पटेल ने यह सेनेटरी पेड तैयार किया है।

    रिसर्च पेपर आदि पढ़कर बनाया सेनेटरी पेड

    वडोदरा की एक एजेंसी से संपर्क कर केले के पेड़ के बेकार तने से रेशे निकालकर उससे सेनेटरी पेड बनाए। अक्टूबर से दिसम्बर तक कई पेड बना लिए।

    पेड प्रोडक्शन के लिए विचार किया है-शिक्षक

    शिक्षक जॉनी अब्राहम ने बताया कि इस पेड को हमने ट्रायल के लिए महेसाणाा के सिविल अस्पताल के गायनेक विभाग को दिया है। स्कूल से बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन करने पर विचार कर रहा है। केले के पेड़ का बेकार तना इसके लिए बहुत ही उपयोगी है। तने से रेशे निकालकर उससे पेड बनाया जाता है। गरीब महिलाओं के लिए यह पेड कतई महंगा नहीं है। केवल 5 रुपए में इसे प्राप्त किया जा सकता है।

    पेड की विशेषता

    -केले के स्टेम्स से रेशे निकालकर उससे ईको फ्रेंडली पेड बनाया जाता है। इसके उपयोग के बाद भी इसे डिस्ट्रॉय करने पर पर्यावरण काे किसी प्रकार का नुकसान नहीं होता।

    -रेशे में पेपर से अधिक अाब्जर्व करने की क्षमता होती है।

    -यह पेड 5 रुपए में बनाया जा सकता है, जो बाजार की अपेक्षा सस्ता है।

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    फरवरी में दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय स्तर पर विज्ञान प्रदर्शनी में प्रस्तुत किया जाएगा।
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