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1970 से अभी तक विस्थापन झेल रहे हैं आदिवासी, मालूम नहीं फाइल कहां है?’

सापूतारा से थोड़ी ही दूरी पर स्थित नवागांव में रह रहे 270 डांग परिवारों के लिए इस जगह के मायने बदल जाते हैं।

Dainik Bhaskar

Nov 30, 2017, 02:41 AM IST
Bhaskar Ground Report on Saputara Tribal Families

सापूतारा (गुजरात). ‘गुजरात की आंखों का तारा है- सापूतारा। इस हिल स्टेशन पर बात करने के लिए कोई नहीं है, सिवाय बादलों के।’ ये एक लाइन उस एक मिनट पांच सेकेंड के ऐड फिल्म से ली गई है जो बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन ने गुजरात टूरिज्म के लिए शूट किया है। इसमें कोई शक नहीं है कि सापूतारा गुजरात के आंखों का तारा है। एक आम गुजराती या खासकर सूरतवासियों के लिए डांग जिले में स्थित यह हिल स्टेशन वीकेंड में मस्ती लूटने का अड्डा है। लेकिन सापूतारा से थोड़ी ही दूरी पर स्थित नवागांव में रह रहे 270 डांग परिवारों के लिए इस जगह के मायने बदल जाते हैं। इनके लिए सापूतारा उस दर्द की तरह है जो सालों से टीस रहा है।

पुराना गांव उजाड़ दिया, नया अभी तक बसा ही नहीं

सापूतारा कारण है जुना गांव के उजड़ने और नवागांव, जो अभी तक बसा नहीं, के बसने का। गुजराती में जूना का मतलब होता है पुराना। आदिवासी राज्य के सबसे पुराने नागरिक हैं, डांग जिले में उनका एक गांव था। सबसे पुराने लोगों का सबसे पुराना गांव- जूना गांव। जूना गांव तो विकसित होकर सापूतारा हो गया, लेकिन वहां रहने वाले आदिवासी अब भी अपनी जमीन ढूंढ़ रहे हैं। 1970 से पहले एक ही नाम था- जूना गांव। जिसमें डांग आदिवासियों के 42 घर थे। 1970 में हुए विकास ने इन 42 परिवारों को गुजरात-महाराष्ट्र के बॉर्डर पर ही नहीं ला पटका, बल्कि इन्हें पहचान और परंपरा से भी अलग कर दिया। सालों से रह रहे आदिवासियों को जब उनकी जमीन से हटाने की कहानी रतन भाई हरि भाई गांगुलके बताते हैं, क्योंकि 47 साल से वे अपनी जमीन तलाश रहे हैं।

वे कहते हैं, ‘हमें जब हटाया गया था तो बारिश का मौसम था। हम वहां से उठना ही नहीं चाहते थे। हमसे जबर्दस्ती अंगूठे का निशान ले लिया। तब कांग्रेस की सरकार थी और हितेंद्र कन्हैयालाल देसाई मुख्यमंत्री थे। सत्ता परिवर्तन हुआ और भाजपा सरकार बनी। वर्तमान पीएम नरेंद्र मोदी राज्य में सबसे अधिक समय तक मुख्यमंत्री रहे। अब वे 42 परिवार बढ़ कर 270 परिवारों में बदल गए हैं। लेकिन विडंबना ही कहेंगे कि जूना गांव के आदिवासियों के नाम अब यह रिकॉर्ड चस्पा है कि पूरे जिले के 311 गांवों में से नवागांव ही एक ऐसा गांव है, जिसके पास खेती के लिए कोई जमीन नहीं है। जिस जमीन पर ये फिलहाल बसे हैं, उस पर भी इनका अधिकार नहीं है।

सरकार रहने के लिए घर और खाने को जमीन दे दे

विस्थापन के बाद से ही ये लोग सरकार से मांग कर रहे हैं कि कम-से-कम जहां ये रह रहे हैं उस जमीन को तो इनके नाम से कर दिया जाए, लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिली है। रामू भाई कहते हैं, ‘हम सरकार से ज्यादा कहां मांग रहे हैं। रहने के लिए घर और खाने-कमाने ले लिए थोड़ी सी जमीन ही तो मांग रहे हैं। लेकिन इतना भी नहीं मिल रहा है। उलटे कुछ साल पहले एक और सरकारी नोटिस मिला है जिसमें यह जमीन भी खाली करने के लिए कहा गया है क्योंकि टूरिस्टों के लिए सरकार यहां पार्क बनाना चाह रही है।’ अपनी मांग को लेकर इस समुदाय के कुछ लोग 2012 में सीएम नरेंद्र मोदी से मिले भी थे और उन्होंने भरोसा दिलाया था कि वो नवागांव का कुछ करेंगे। उस बारे में रामचंद्र चीमन हड़्स बताते हैं, ‘हम गए थे मिलने। मोदी जी से सामने-सामने मिले थे। उन्होंने एक लेटर भी दिया था। बोले थे कि काम हो जाएगा। फाइल चलेगी लेकिन आज तक कहां कुछ हुआ?

इन परिवारों तक बिजली और इंटरनेट तो है लेकिन घरों में शौचालय नहीं है। इसकी वजह स्थानीय जानकार बताते हैं, वह कहते हैं, ‘देखिए इनमें से किसी के नाम पर जमीन नहीं है। कागज में यह कोई गांव है ही नहीं। अब ऐसे में ना तो इन्हें शौचालय बनवाने की योजना का फायदा मिलता है और ना ही इनके पास इतने पैसे हैं कि ये शौचालय बनवा लें।’ वह हमसे यह कह ही रहे थे कि पास खड़े युवाओं के झुंड से किसी ने आवाज लगाई, ‘टीवी पर बच्चन कहते हैं- खुले में शौच करोगे तो बाघ आ जाएगा। रहेगा शौचालय तभी ना घर में करेंगे? नहीं तो बाहर ही जाएंगे ना? अब बाघ आता है तो आने दो?’

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