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30 KM दूर खुलता है यहां सुरंग का दरवाजा, देखने पहुंचे राहुल गांधी

इस बावड़ी को वास्तुकला का बेजोड़ नमूना माना जाता है। इसलिए इसे 23 जून 2014 को वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स में शामिल किया गया था

DainikBhaskar.com | Last Modified - Nov 14, 2017, 12:29 AM IST

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    रानी की वाव देखने पहुंचे राहुल गांधी।
    पाटण (गुजरात). गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी यहां के ऐतिहासिक बावड़ी 'रानी की वाव' देखने पहुंचे। बता दें कि इस बावड़ी से एक रहस्यमयी सुरंग निकलती है जिसका दूसरा दरवाजा 30 किलोमीटर दूर खुलता है। इस बावड़ी को वास्तुकला का बेजोड़ नमूना माना जाता है। इसलिए इसे 23 जून 2014 को वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स में शामिल किया गया था।

    दुनिया भर से लोग आते हैं देखने
    - रानी की वाव का निर्माण 11वीं सदी में सोलंकी शासक राजा भीमदेव की याद में उनकी पत्नी रानी उदयमती ने करवाया था।
    - माना जाता है कि बावड़ी में बने सुरंग का यूज युद्ध के दौरान राजा और उनकी फैमिली को सुरक्षित निकालने के लिए किया जाता था।
    - 30 किलोमीटर लंबी इस रहस्यमयी सुरंग का दूसरा छोर पाटण के सिद्धपुर में खुलता है।
    बावड़ी की ये है मान्यता
    - वाव में हजार से भी ज्यादा छोटे-बड़े स्कल्पचर हैं। दीवारों और खंभों पर नक्काशियां की गई है।
    - विष्णु और उनके अवतार राम, वामन, महिषासुरमर्दिनी, कल्कि की नक्काशी की गई है।
    - मान्यता है कि इस बावड़ी में नहाने से चर्म रोग से जुड़ी बीमारियां नहीं होती। बावड़ी के आसपास आयुर्वेदिक पौधे लगे हुए हैं।
    - माना जाता है कि इनकी जड़ें बावड़ी के पानी से जुड़ी हुई है जिससे पानी औषधि युक्त बन जाता है।
    - 64 मीटर लंबी, 20 मीटर चौड़ी और 27 मीटर गहरी रानी की वाव के नीचे पानी का टैंक हैं।
    - सात मंजिला इस बावड़ी का निर्माण 1022 से 1063 ईं के बीच किया गया था। लेकिन अब ये केवल 5 मंजिला ही बची है।
    सात शताब्दी तक गाद में दबी थी ये बावड़ी
    - बता दें कि पाटण कभी गुजरात की राजधानी थी। 8वीं सदी के दौरान चालुक्य राजपूतों के चावड़ा साम्राज्य के राजा वनराज चावड़ी द्वारा बनाया गया ये गढ़वाली शहर था।
    - ये वाबड़ी मारू-गुर्जर शैली को दर्शाता है। ये करीब सात सदी तक सरस्वती नदी के लापता होने के बाद गाद में दबी थी।
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    इस बावड़ी से एक रहस्यमयी सुरंग निकलती है जिसका दूसरा दरवाजा 30 किलोमीटर दूर खुलता है।
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    इस बावड़ी को वास्तुकला का बेजोड़ नमूना माना जाता है। इसलिए इसे 23 जून 2014 को वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स में शामिल किया गया था।
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    रानी की वाव का निर्माण 11वीं सदी में सोलंकी शासक राजा भीमदेव की याद में उनकी पत्नी रानी उदयमती ने करवाया था।
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    बावड़ी में बने सुरंग का यूज युद्ध के दौरान राजा और उनकी फैमिली को सुरक्षित निकालने के लिए किया जाता था।
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    30 किलोमीटर लंबी इस रहस्यमयी सुरंग का दूसरा छोर पाटण के सिद्धपुर में खुलता है।
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    वाव में हजार से भी ज्यादा छोटे बड़े स्कल्पचर हैं। दीवारों और खंभों पर नक्काशियां की गई है।
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    विष्णु और उनके अवतार राम, वामन, महिषासुरमर्दिनी, कल्कि की नक्काशी की गई है।
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    इस बावड़ी में नहाने से चर्म रोग से जुड़ी बीमारियां नहीं होती। बावड़ी के आसपास आयुर्वेदिक पौधे लगे हुए हैं।
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    इनके जड़ें बावड़ी के पानी से जुड़ी हुई है जिससे पानी औषधि युक्त बन जाता है।
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    64 मीटर लंबी, 20 मीटर चौड़ी और 27 मीटर गहरी रानी की वाव के नीचे पानी का टैंक है।
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