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दोस्त के लिए जीवनदाता बन गया फ्रेंड, हॉस्पिटल में जान थी खतरे में तो एंबुलेंस से वेंटिलेटर निकालकर मरीज को लगाया तो बच गई जान

हर दिन इतना खर्च कि परिजन टूट गए, बिल ज्यादा आने पर सिविल हॉस्पिटल लाए थे

Dainik Bhaskar

Jun 14, 2018, 03:56 AM IST
पहली तस्वीर में वेंटिलेटर के अभाव में एंबू दिया जा रहा है। पहली तस्वीर में वेंटिलेटर के अभाव में एंबू दिया जा रहा है।

सूरत. सिविल अस्पताल में वेंटिलेटरर का अभाव इस कदर है कि समय पर वेंटिलेटर नहीं मिलने की वजह से हर दिन तीन से चार लोगों की मौत हो जाती है। कुछ ऐसा ही मामला बुधवार को देखने को मिला। जब मरीज यशवन लंबोदरी को समय पर वेंटिलेटर नहीं मिलने के कारण उसकी हालत नाजुक हो गई। अस्पताल के डॉक्टर जब वेंटिलेटर की व्यवस्था नहीं करा पाए तो परिजनों को खुद ही वेंटिलेटर की व्यवस्था करनी पड़ी। इससे सिविल की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़ा हो गया। फिलहाल किसी तरह से मरीज की जान बची।

मित्र की मदद और परिजनों की समझदारी से इस युवक की जान बचाई गई। परिजनों का कहना है कि मरीज को जब सिविल अस्पताल लाया था तब उन्हें बताया गया था कि वेंटिलेटर है, लेकिन जब मरीज को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ी तो हाथ खड़े कर दिए। अगर अस्पताल के भरोसे रहता तो उसकी मौत निश्चित थी।

हर दिन इतना खर्च कि परिजन टूट गए, फिर लाए सिविल

- अम्बा नगर निवासी 18 वर्षीय यशवन लंबोदरी की तबीयत एक हफ्ते से खराब थी। इधर-उधर से प्राथमिक उपचार हुआ, लेकिन आराम नहीं मिला। उसे बुखार की शिकायत थी।

- धीरे-धीरे तबीयत और खराब हो गई। उसे निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन दो दिन बाद अस्पताल ने उसे वेंटिलेटर पर रख दिया। जिसका चार्ज काफी महंगा था।

- आर्थिक स्थिति खराब होने से परिजन परेशान हो गए। प्रतिदिन अस्पताल का खर्चा इतना था कि परिजन टूट गए। किसी ने बताया कि सिविल अस्पताल में यह सुविधा मुफ्त में है।

- इसके बाद परिजनों ने सिविल में संपर्क किया। यहां उन्हें मुफ्त में सुविधा मिलने की जानकारी मिली थी।

पहले मान लिया फिर कहा नहीं है

- मरीज के पिता देवानंद लम्बोदरी ने कहा कि जब वह अस्पताल आए थे तब डॉक्टर ने वेंटिलेटर होने की बात कही थी। जब बेटे को लेकर आए तब मना कर दिया।

- ऐसे में मैं कहां जाता इसलिए अपने मित्र से कहकर मदद के लिए गुहार लगाई। किसी तरह बेटे की जान बची। जान बचाने के लिए कुछ भी किया जा सकता है

जान खतरे में देख एंबुलेंस का वेंटिलेटर दिया: शैलेष गोस्वामी

- 35 वर्षीय शैलेष गोस्वामी के पास निजी एम्बुलेंस है। मरीज के परिजनों का शैलेश मित्र भी है। बुधवार दोपहर को परिजन सिविल अस्पताल आए और वेंटिलेटर खाली होने की जानकारी लेकर चले गए।

- उस समय ट्रॉमा सेंटर के कैजुअल्टी में एक वेंटिलेटर खाली था। करीब साढ़े तीन बजे जब वह मरीज को लेकर आए तब तक वेंटी पर दूसरे मरीज को रख दिया गया था। अब ऐसे में परिजन परेशान हो गए। वह जाएं तो जाए कहां, मरीज की हालत पहले से ही खराब थी।

- उसे तत्काल वेंटी की जरूरत थी। मरीज को फिर से निजी अस्पताल ले जाने के लिए न ही पैसा था और न ही इतना समय। मरीज को बचाए रखने के लिए डॉक्टरों ने उसे एम्बू वेंटी पर रख दिया, लेकिन इससे उसे बचाया नहीं जा सकता था इसलिए शैलेश आनन-फानन में जाकर अपने एम्बुलेंस का वेंटिलेटर खोलकर लाया और डॉक्टरों की सहमति के बाद मरीज को वेंटिलेटर पर रखा गया।

डॉक्टर भी मान रहे नहीं है वेंटिलेटर

- वेंटिलेटर की परमीशन देने वाले मेडिकल ऑफिसर डॉ. ओमकार चौधरी ने कहा कि अगर मरीज की जांच बचाने की बात आए तो शब कुछ किया जाना चाहिए।

- इतने बड़े अस्पताल में अगर प्राइवेट वेंटिलेटर से मरीज की जान बचाई जा रही है तो यह बहुत दुखद है।

- जिस समय मरीज को लाया गया उस समय एक भी वेंटिलेटर खाली नहीं था। जबकि इससे पहले परिजन वेंटी खाली होने की जानकारी लेकर गए थे।

पहली तस्वीर में वेंटिलेटर के अभाव में एंबू दिया जा रहा है। पहली तस्वीर में वेंटिलेटर के अभाव में एंबू दिया जा रहा है।
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पहली तस्वीर में वेंटिलेटर के अभाव में एंबू दिया जा रहा है।पहली तस्वीर में वेंटिलेटर के अभाव में एंबू दिया जा रहा है।
पहली तस्वीर में वेंटिलेटर के अभाव में एंबू दिया जा रहा है।पहली तस्वीर में वेंटिलेटर के अभाव में एंबू दिया जा रहा है।
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