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कड़वा अनुभव: राष्ट्रपति से सम्मान प्राप्त करने के लिए तरसते रहे अंगदाता

अंगदान करने वालों के करीब 150 परिजन पहुंचे थे, मायूस लौटी 14 माह के बेटे का दिल दान करने वाली मां।

Dainikbhaskar.com | Last Modified - May 30, 2018, 01:10 PM IST

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    सम्मान करने बुलाया, पर केवल फोटो ही खींची।

    सूरत। शहर से अपने ब्रेन डेड स्वजनों के अंगों का दान करने वाले महादानियों का राष्ट्रपति के हाथों सम्मान कराने का कार्यक्रम सरसाणा कन्वेशन हॉल में आयोजित किया गया था। राष्ट्रपति जब हमारा सम्मान करेंगे, तब हमारे चेहरे पर कैसा भाव होगा, इस विचार के साथ सभी कार्यक्रम स्थल पहुंचे। पर उन्हें वहां निराशा ही मिली। मंच पर बुलाया ही नहीं गया…

    सूरत के अंगदान करने वाले लोगों के लगभग 150 परिजनों को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा सम्मानित करने के लिए बुलाया गया, लेकिन उन्हें मंच पर बुलाया तक नहीं। राष्ट्रपति ने इनका हाल पूछा और साथ फोटो भी खिंचाई, पर उसके बाद इन पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया। आखिरकार ये लोग मायूस होकर अपने घर लौट गए। मंगलवार सुबह 11 बजे सरसाणा के प्लेटिनम हॉल एग्जिबिशन एंड कन्वेंशन में अंगदान करने वालों के परिजनों का सम्मान समारोह आयोजित किया गया था। हॉल में करीब एक घंटे तक कार्यक्रम चलता रहा, लेकिन मंच पर एक परिजन को भी नहीं बुलाया गया। इनमें वह मां भी थी, जिसने अपने 14 माह के बेटे का दिल दान किर दिया था। परिजन इंतजार करते रहे कि उन्हें सम्मान के लिए बुलाया जाएगा, पर आखिर तक उन्हें किसी ने आवाज नहीं दी। इन लोगों को सुबह 9 बजे ही बुला लिया गया था। इनमें बच्चे और बुजुर्ग महिलाएं भी थीं, जो परेशान दिखीं। राष्ट्रपति के चले जाने के बाद परिजन भूखे-प्यासे घर लौट गए। आयोजकों ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को गणेश प्रतिमा भेंट की, जिसे लेने से इनकार करते हुए उन्होंने कहा कि सबसे पहले अंग प्रत्यारोपण भगवान गणेश का हुआ था, इसलिए यह प्रतिमा संस्था के कार्यालय में रखी जाए। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम उनके लिए है, जिन्होंने अपनी सबसे महत्वपूर्ण वस्तु दान की है। डोनेट लाइफ के प्रमुख नीलेश मांडलेवाला ने कहा कि सूरत से 249 किडनी, 101 लीवर, 6 पैंक्रियाज, 17 हार्ट और 212 नेत्रदान से 582 लोगों को नया जीवन मिल चुका है।

    अंगदान करने वाले व्यक्ति का इलाज मुफ्त होगा

    राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने बताया कि इलाहाबाद के मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज ने एक नई पहल शुरू की है। अंगदान का संकल्प लेने वाले व्यक्ति का इलाज, चाहे जिस बीमारी का हो, जीवन भर यहां मुफ्त किया जाएगा। इसी प्रकार लखनऊ स्थित राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट ने भी अंगदान का संकल्प करने वालों के परिजनों को इलाज में 25 फीसदी छूट देने की पहल की है। डोनेट लाइफ संस्था के बारे में उन्होंने कहा कि संस्था के माध्यम से 2017 में ही 127 लोगों को नया जीवन दिया गया है।

    आए थे 150 परिजन, पर 28 को ही राष्ट्रपति से मिलवाया

    47 वर्षीय कृष्णा बंदराज 7 जुलाई 2017 को सिर में चोट लगने से ब्रेनडेड हो गए थे। परिजनो ने संस्था के कहने पर कृष्णा की किडनी लीवर और नेत्र का दान कर दिया। कडोदरा के अरिहंत पार्क निवासी कृष्णा के बेटे देवकी नंदन ने बताया कि संस्था ने सम्मान के लिए बुलाया, लेकिन 28 लोगों को ही राष्ट्रपति से मिलवाया।

    मायूसी- बेटी खाने के लिए रोती रही, किसी ने पूछा तक नहीं

    डिंडोली के नवागाम निवासी किरणबेन शाह ने एक साल पहले अपने ब्रेनडेड 14 माह के बेटेे का दिल दान किया था। वह अपने पति, एक माह के बेटे और तीन साल की बेटी के साथ आई थीं। उन्होंने कहा, सुबह 8 बजे से आकर बैठी थी। मेरी बेटी खाने के लिए रो रही थी। मुझसे तो किसी ने मुलाकात तक नहीं की।

    साड़ी पर स्टोन लगाकर फीस भरने वाली जिग्नासा ने एमएससी में 4 मेडल

    वीर नर्मद दक्षिण गुजरात यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने रसायन विज्ञान की छात्रा जिग्नासा सावलिया को 4 मेडल और 3 पुरस्कार प्रदान किए। पूणागाम की रहने वाली जिग्नासा ने कहा कि पापा एम्ब्रॉयडरी में 12000 की नौकरी करते हैं। बड़ी बहन की शादी हो चुकी है, उन्हें पढ़ाई में रुचि नहीं थी। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, इसलिए उन्हें 9वीं के बाद नहीं पढ़ाया गया। जिग्नासा ने कहा, पढ़ाई करने के अलावा मैं अपनी मां के साथ घर पर साड़ी पर स्टोन लगाने का काम करती हूं। बीएससी में सेकंड नंबर पर आने के बाद ठान लिया था कि एमएससी में प्रथम स्थान लाऊंगी। मैंने दिन-रात एक करके पढ़ाई की।

    छात्र बोले- हमें बताया ही नहीं कि राष्ट्रपति आ रहे हैं

    यूनिवर्सिटी में डिग्री लेने के लिए सुबह से ही छात्रों की भीड़ इकट्ठा हो गई थी, लेकिन जब उन्हें पता चला कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद आ रहे हैं, तो हॉल में जाने के लिए लाइन में लग गए। जब वे एंट्री गेट पर पहुंचे तो उनसे पास मांगा गया, जो उनके पास नहीं था। निराश होकर उन्हें वापस जाना पड़ा। छात्रों ने कहा कि परिपत्र में कहीं नहीं लिखा है कि राष्ट्रपति आने वाले हैं। जिन छात्रों को डिग्री बांटी जा रही थी, उनके लिए किसी भी प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं थी। काफी छात्रों को बिना डिग्री के वापस लौटना पड़ा। 12 विभागों में 28 हजार डिग्रियां बांटने की जानकारी यूनिवर्सिटी ने दी थी।

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    मेयर को आवेदन भी नहीं दे पाए।
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    बाजू के हॉल में भेज दिया।
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    पति के अवसान के बाद अंगदान किए, पर सम्मान के नाम पर निराशा-कैलास बेन
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    जाते समय कहा, भोजन करके जाना।
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    मायूसी- बेटी खाने के लिए रोती रही, किसी ने पूछा तक नहीं
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    चार मेडल मिलने के बाद अपने माता-पिता के साथ जिग्नासा सावलिया।
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    प्रोटोकाल में परिवर्तन होने से कार्यक्रम में बदलाव किया गया।
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