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पानी न होने के कारण कम पड़ गई आस्था, विसर्जन के 292 दिन बाद भी दुर्गा मूर्ति की है यह स्थिति

एक बार प्रतिमा विसर्जित करने के बाद कोई मुड़कर देखने भी नहीं आता है।

Danik Bhaskar | May 23, 2018, 03:00 AM IST
विसर्जन : 2 अगस्त 2017 के 292 दिन बाद भी ऐसेे ही पढ़ी है मर्तियां। विसर्जन : 2 अगस्त 2017 के 292 दिन बाद भी ऐसेे ही पढ़ी है मर्तियां।

अहमदाबाद. 2 अगस्त 2017 को दशामां की मूर्तियों का साबरमती में विसर्जन किया गया था। आज 292 दिन के बाद भी अनेकों मूर्तियां कीचड़ में पड़ी हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि प्रतिमाओं का विसर्जन पानी या मिट्‌टी में होना चाहिए, पर दु:ख के साथ कहना पड़ रहा है कि एक बार प्रतिमा विसर्जित करने के बाद कोई मुड़कर देखने भी नहीं आता है। विसर्जन के बाद अनेकों मूर्तियां खंडित हो गई हैं और कीचड़ में पड़ी हैं। ऐसे दृश्यों से आस्था को ठेस पहुंचती है।

मिट्‌टी की मूर्ति स्थापित कर घर में विसर्जन करो

‘भास्कर’ द्वारा प्रतिवर्ष ‘मिट्‌टी के गणेश’ को घर में विसर्जित करने का अभियान चलाया जाता है। भास्कर एक बार फिर यह बात कहना चाहता है कि प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) से बनी मूर्तियां लंबे समय तक विसर्जित नहीं होती हैं। नदी या तालाब में पड़ी खंडित मूर्तियों से आस्था को गहरी ठेस पहुंचती है।


इससे धर्म और पर्यावरण दोनों को नुकसान हो रहा है। भले ही वह मूर्ति गणेश या देवी की हो। मिट्‌टी की मूर्तियों के बारे में भास्कर हमेशा कहता रहा है कि विजर्सन घर में ही करो। क्योंकि जब मिट्‌टी नदी, डैम, तालाब या झरने में डालते हैं तब वह पटने लगती है और उसमें पानी की मात्रा कम होने लगती है। घर में विसर्जन करने से ईश्वर के रूप में पवित्र मिट्‌टी सदैव आपके घर और क्यारियों में रहती है। ‘भास्कर’ इसके लिए लगातार अभियान चलाएगा ताकि मूर्तियां मिट्‌टी की बनें और घर में ही विसर्जन हो। नदियों-तालाबों के पानी के साथ-साथ वातावरण भी शुद्ध रहे।

पानी को पानी की तरह बहाने से पहले एक बार इसे जरूर पढ़ें...

ऐसा कहा जाता है कि एक तस्वीर 1000 शब्दों के बराबर होती है इसलिए ही पीने के पानी के लिए भटकते लोगों की तकलीफ को बताने के लिए भास्कर ने न्यूज की जगह तस्वीरों का सहारा लिया है। हमारे जल रिपोर्टर और फोटो जर्नलिस्ट ने गुजरात के कुछ गांवों में वाटर क्राइसिस की रियलिटी का पता लगाया। उसमें से कई तस्वीरें हम आपको दिखा रहे हैं। इसका उद्देश्य सिर्फ इतना ही है कि इन तस्वीरों को देखकर हम पानी का महत्व समझें और उसे बचाने का प्रयास करें।

3 Km दूर नदी के किनारे गड्ढे में पानी की खोज

गर्मी शुरू होते ही सौराष्ट्र कच्छ में पानी की कमी शुरू हो जाती है। मोरबी और कच्छ जिले के बीच स्थित माडिया नगरपालिका की सीमा पर स्थित तालाबों के सूखने से पेयजल का संकट शुरू हो गया है। मार्च महीने की शुरुआत में यहां के लोग पीने का पानी 3 किमी दूर से लाने लगे हैं। इसके लिए उन्हें पूरे दिन मशक्कत करनी होती है। महिलाएं-पुरुष साथ में पानी लेने जाते हैं। सामान्य दिनों में भी इस इलाके में पानी की कमी सालभर रहती है।

माडिया शहर के 18 मोहल्ले पाथमिक सुविधाओं से वंचित

माडिया मियाणा के वांढ इलाके के 18 मोहल्ले प्राथमिक सुविधाओं से वंचित हैं। स्थानीय नागरिकों संबंधित सभी अधिकारियों से इसकी शिकायत हुई लेकिन आज तक किसी प्रकार की कोई कार्रवाई नहीं हुई।

माडिया शहर के 18 मोहल्ले पाथमिक सुविधाओं से वंचित। माडिया शहर के 18 मोहल्ले पाथमिक सुविधाओं से वंचित।
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