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गंदा है पर धंधा है: गुजरात में पानी का धंधा-7000 करोड़ और शराब का 30 हजार करोड़

शराब बेचने पर पीने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है। नशाबंदी कानून को सख्त बनाते हुए सरकार ने सजा और बढ़ा दी है।

bhaskar news | Last Modified - Apr 25, 2018, 08:41 AM IST

  • गंदा है पर धंधा है:  गुजरात में पानी का धंधा-7000 करोड़ और शराब का 30 हजार करोड़
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    शराब तस्करों का जाल प्रदेशभर में फैला हुआ है। किसी भी प्रोडक्ट के सेल के लिए जिस प्रकार का नेटवर्क होता है वैसा ही नेटवर्क शराब तस्करों ने भी बनाया है।

    अहमदाबाद.प्रदेश में शराबबंदी यानी शराब बेचने पर पीने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है। नशाबंदी कानून को सख्त बनाते हुए सरकार ने सजा और बढ़ा दी है। प्रदेश में शराबबंदी लागू होने के 58 साल बाद भी स्थिति यह है कि यहां पानी का धंधा 7000 करोड़ और शराब का वार्षिक टर्न ओवर 30 हजार करोड़ है। पिछले 10 साल में शराब की बिक्री में 300% की बढ़ोतरी हुई है। हेल्थ रिपोर्ट के अनुसार शराब पीने वालों की संख्या तीन गुना बढ़ी है। छोटे गांवों से लेकर बड़े शहरों तक लोग सालभर में करोड़ो रुपए की शराब पी जाते हैं।

    - रोजाना 11 से ज्यादा गाड़ियों से शराब पकड़ी जाती है। पिछले दो साल में 16,033 वाहन जब्त किए गए हैं।

    - इन वाहनों से 3 लाख 13 हजार 642 लीटर देशी शराब, 90 लाख 22 हजार 406 बोतल विदेशी और 20 लाख 29 हजार 908 बोतल बियर पकड़ी जा चुकी है।

    - प्रदेश के कई बड़े नेता और पुलिस अधिकारी शराब के धंधे में किसी ना किसी रूप में जुड़े हुए हैं। शराब का स्टॉक करने में पुलिस अधिकारी तस्करों की पूरी मदद करते हैं, कई बार यह मामला सामने आ चुका है।

    - बीमारी के बहाने शराब की परमिट लेने वालों की संख्या भी बढ़ रही है। 2011 में 22 हजार परमिटधारक थे, 2017 में बढ़कर 42 हजार हो गए।


    शराब के लिए कानूनी दांव पेंच से लोग बन रहे हैं मरीज
    - प्रदेश में शराब पीने की परमिट दी जाती है। परमिट के लिए लोग कानूनी दांव पेंच अपनाकर मरीज बन जाते हैं। कुछ बीमारियों में शराब पीना जरूरी होता है और मरीजों को परमिट दिया जाता है।

    - इस प्रकार के परमिट के लिए सिविल सर्जन का सर्टीफिकेट जरूरी है। सर्टीफिकेट बनवाने में बड़ी धांधली होती है और लोग घूस देकर आसानी से सर्टीफिकेट बनवा लेते हैं।

    ड्राय गुजरात के पांच किस्से

    1. हफ्ते के अंत में दीव-दमण में 40% गुजराती
    - हफ्ते के अंत में दीव-दमण और आबू जाने वाले यात्रियों में 40% गुजराती हाेते हैं। दक्षिण गुजरात के लोग दमण, सौराष्ट्र के लोग दीव और मध्य गुजरात के लोग आबू या दीव जाते हैं।

    - अहमदाबाद-वडोदरा के युवक वीक-एंड में राजस्थान के रतनपुर सीमा पर शराब पीने जाते हैं। हफ्ते के अंत में आबू आने वाले अधिकांश वाहन गुजरात के होते हैं।

    - दिवाली, नवरात्रि या 31 दिसंबर जैसे खास दिनों में तीनाें स्थानों पर गुजरातियों को भारी मात्रा में देखा जा सकता है।


    2. शराब की होम डिलीवरी, दिन में कभी भी
    - शराब तस्करों का जाल प्रदेशभर में फैला हुआ है। किसी भी प्रोडक्ट के सेल के लिए जिस प्रकार का नेटवर्क होता है वैसा ही नेटवर्क शराब तस्करों ने भी बनाया है।

    - इतना ही नहीं तस्कर ग्राहकों को खुश करने के लिए विदेशी शराब की होम डिलीवरी भी करते हैं। दिन में कभी भी शराब ग्राहकों के घर तक आसानी से पहुंचाई जाती है।


    3. शराब पीने में कश्मीर से भी आगे है गुजरात
    नेशनल सेम्पल सर्वे के आंकड़ों के अनुसार प्रति व्यक्ति शराब पीने के मामले में गुजरात जम्मू-कश्मीर से भी आगे है। कश्मीर में हफ्ते में शराब पीने का औसत आंकड़ा 32 एमएल और गुजरात में 53 एमएल है। कर्नाटक में 23 एमएल साप्ताहिक है। देशी शराब की खपत में गुजरात उत्तराखंड, तमिलनाडु से भी आगे है।


    4. सोशल मीडिया पर शराब की खरीद-बिक्री
    - पुलिस से बचने के लिए कई तस्कर सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। सोशल मीडिया ग्रुप में विश्वासपात्र ग्राहकों को ही जोड़ते हैं।

    - सोशल मीडिया पर ब्रांड और भाव-ताव की बात होने के बाद निर्धारित स्थान पर शराब की डिलीवरी की जाती है।

    - कई तस्कर तो फोन पर ही ग्राहकों को उनकी पसंद की शराब पहुंचाते हैं। ऐसे तस्कर खास ग्राहकों का आर्डर फोन पर लेकर डिलीवरी करते हैं।


    5.पुलिस की छापेमारी भी फिक्स होती है
    - कई जिलों में पुलिस को शराब के अड्‌डों पर छापेमारी और केस करने का टार्गेट दिया जाता है। पुलिस तस्करों के साथ मिलकर छापेमारी और उसका समय फिक्स कर लेते हैं।

    - छापेमारी में कितनी शराब पकड़ी गई यह सब कुछ पहले से ही तय होता है। खास मामलों में पुलिस तस्करों को भी गिरफ्तार करते हैं।

    शराब के 55 हजार केस कोर्ट में विचाराधीन

    1 शराब की तस्करी या बेचने वाले पकड़े जाते हैं पर इसमें से बहुत ही कम लोगों को सजा होती है। क्योंकि देशी शराब के साथ पकड़े गए आरोपी के केस का फैसला जल्दी नहीं होता है और वे जमानत पर छूट जाते हैं। कोर्ट में इस प्रकार के 55 हजार से ज्यादा केस विचाराधीन हैं।

    2 शराब के केस में गवाहों का बयान महत्वपूर्ण है। अधिकांश मामलों में गवाह अपने बयान से मुकर जाते हैं। पुलिस के अनुसार गवाह स्वतंत्र और प्रतिष्ठित व्यक्ति होना चाहिए। कानून विशेषज्ञ संदीप क्रिस्टी का मानना है कि सरकारी कर्मचारियों को गवाह बनाया जाए तो सजा दिलाने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होगी और शराब के केस भी जल्दी निपट जाएंगे।

    शराब के बिजनेस में पुलिस और नेताओं की मिलीभगत
    प्रदेश में शराब के अवैध बिजनेस में पुलिस अधिकारियों और नेताओं की मिलीभगत के कई मामले सामने आ चुके हैं और आगे भी आते रहेंगे। कई पुलिस अधिकारियों ने शराब के धंधे में बहुत बड़ा निवेश किया है। कई बार तो शराब का स्टॉक करने में पुलिस अधिकारी तस्करों की आर्थिक मदद भी करते हैं और रूट भी क्लीयर कर देते हैं।

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    नेशनल सेम्पल सर्वे के आंकड़ों के अनुसार प्रति व्यक्ति शराब पीने के मामले में गुजरात जम्मू-कश्मीर से भी आगे है।
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    पुलिस से बचने के लिए कई तस्कर सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। सोशल मीडिया ग्रुप में विश्वासपात्र ग्राहकों को ही जोड़ते हैं
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Web Title: Wine Business In Gujarat
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