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तब के 2 करोड़ के इनामी खूंखार डाकू पंचम सिंह आज के राजयोगी

100 हत्याओं का आरोप, सर पर दो करोड़ का इनाम, आज चल रहे हैं अध्यात्म के मार्ग पर ।

Dainik Bhaskar

Mar 10, 2018, 05:07 PM IST
कोई अपनी मर्जी से डाकू नहीं बनता, हालात बना देते हैं। कोई अपनी मर्जी से डाकू नहीं बनता, हालात बना देते हैं।

वडोदरा। प्रजापिता ब्रह्मकुमारी के सान्निध्य में आने के बाद राजयोगी के रूप में पहचाने जाने वाले कभी डाकू पंचम सिंह के नाम से जाने जाते थे। उन पर 100 हत्याओं का आरोप था, सरकार ने उन्हें पकड़ने वाले को 2 करोड़ रुपए इनाम देने की घोषणा की थी। 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने आत्मसमर्पण के बाद वे अब अध्यात्म के मार्ग पर चल रहे हैं। महिलाओं से छेड़छाड़ के लिए कानून नहीं जागरूकता की आवश्यकता…

शनिवार को वडोदरा पहुंचने पर राजयोगी ने कहा कि वर्तमान में महिलाओं से होने वाली छेड़छाड़ और ज्यादती की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए कानून नहीं, बल्कि समाज को जाग्रत होने की आवश्यकता है। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए 96 वर्षीय राजयोगी ने कहा कि कोई भी शौक से डाकू नहीं बनता। संयोग ही व्यक्ति को डाकू बनाते हैँ। जब मैं 14 साल का था, तब छत्रीपुरा गांव में पंचायत चुनाव थे। हमारे प्रतिस्पर्धी ने मुझे और पिता को खूब मारा। पुलिस में शिकायत की गई। मैं जेल गया। जेल से छूटने के बाद भी उन्होंने हमारा पीछा नहींं छोड़ा। उन्होंने हमें काफी परेशान किया। मैं तंग आ चुका था। फिर तो मैंने उन लोगों को सबक सिखाने की ठान ली। बस फिर क्या था, एक दिन मैं चम्बल के बीहड़ में उतरकर डाकुओं की गेंग में शामिल हो गया।

12 साथियों के साथ गांव आकर 6 हत्याएं कीं

डाकुओं की गेंग में शामिल होकर मैं अपने 12 साथियों के साथ गांव पहुंचा अौर वहां 6 लोगों की हत्याएं की। इस घटना के बाद मेरा नाम आसपास के इलाकों में गूंजने लगा। एक समय ऐसा भी था, जब मेरा साम्राज्य 25 जिलों तक हो गया था। मेरे नाम से ही लोग थर-थर कांपते थे। उस समय मेरा खौफ ऐसा था कि यदि किसी ने किसी महिला के साथ छेड़छाड़ की, तो मेरे आदमी उसे जिंदा जला देते। पूरी चम्बल घाटी में पंचमसिंह का खौफ था। मुझ पर सरकार ने 2 करोड़ का इनाम रखा था। परंतु किसी की हिम्मत नहीं होती कि मेरे बारे में एक छोटी सी जानकारी भी पुलिस को दे दे।

1972 में इंंदिरा गांधी के सामने किया समर्पण

1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसेवक जयप्रकाश नारायण के माध्यम से मुझे आत्मसमर्पण के लिए कहा। मैं इसके लिए 8 शर्तें रखीं। जिसमें किसी को फांसी नहीं देने, हर डाकू को 30 बीघा जमीन, परिवार को सभी सुविधाएं देन और ओपन जेल में रखने जैसी शर्तें थी। सरकार ने हमारी सारी शर्तें मान ली। कोर्ट ने हमें फांसी की सजा सुनाई थी, पर जयप्रकाश नारायण की अर्जी से राष्ट्रपति ने हमारी फांसी को सजा में बदल दिया। हम 8 साल जेल में रहे। जब हम जेल में थे, तब प्रजापिता ब्रह्मकुमारी के साधक हमसे मिलने आए। उनके प्रवचनों से मैं प्रभावित हुआ। फिर तो हमारा जीवन ही बदल गया। पहले डाकू पंचम सिंह और अब राजयोगी के रूप में मेरी पहचान है। इस आध्यात्मिक जीवन में मन सदैव प्रफुल्लित रहता है। मैं अब इसी में रम गया हूं।

गांव के रसूखदार से त्रस्त हो गया था, इसलिए चम्बल की शरण में पहुंच गया। गांव के रसूखदार से त्रस्त हो गया था, इसलिए चम्बल की शरण में पहुंच गया।
1972 में इंदिरा गांधी के सामने समर्पण कर दिया। 1972 में इंदिरा गांधी के सामने समर्पण कर दिया।
तब के डाकू पंचम सिंह आज राजयोगी के रूप में जाने जाते हैं। तब के डाकू पंचम सिंह आज राजयोगी के रूप में जाने जाते हैं।
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कोई अपनी मर्जी से डाकू नहीं बनता, हालात बना देते हैं।कोई अपनी मर्जी से डाकू नहीं बनता, हालात बना देते हैं।
गांव के रसूखदार से त्रस्त हो गया था, इसलिए चम्बल की शरण में पहुंच गया।गांव के रसूखदार से त्रस्त हो गया था, इसलिए चम्बल की शरण में पहुंच गया।
1972 में इंदिरा गांधी के सामने समर्पण कर दिया।1972 में इंदिरा गांधी के सामने समर्पण कर दिया।
तब के डाकू पंचम सिंह आज राजयोगी के रूप में जाने जाते हैं।तब के डाकू पंचम सिंह आज राजयोगी के रूप में जाने जाते हैं।
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