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दूरदर्शन पर मैच देखकर दादा ने डांग की सरिता को खिलाड़ी बनने का दिखाया था सपना

लड़कियों को भी सपने पूरे करने का हक, कम उम्र में शादी रुके तो गुजरात से कई सरिता मिल सकती हैं।

Dainik Bhaskar

Sep 03, 2018, 02:09 PM IST
सरिता लक्ष्मीबाई गायकवाड़ सरिता लक्ष्मीबाई गायकवाड़

वडोदरा। डांग जिले के बारहड़ा गांव की सरिता गायकवाड़ ने जकार्ता एशियन गेम्स में 4x400 मीटर टीम रिले दौड़ में देश को गोल्ड मेडल दिलाया। 'डांग एक्सप्रेस' के रूप में चर्चित सरिता जब छोटी थी, तब उनके दादा दूरदर्शन पर मैच देखते थे। उस वक्त दादा ने ही सरिता को खिलाड़ी बनने का सपना दिखाया। भास्कर ने की सरिता से बातचीत...

सरिता का कहना है कि कम उम्र में लड़कियों की शादी रुके तो उनकी तरह राज्य से कई सरिता अपनी प्रतिभा दिखा सकती हैं। भास्कर के जागृति त्रिवेदी के साथ सरिता गायकवाड़ ने विशेष बातचीत की। बातचीत के अंश सरिता के ही शब्दों में... मेरे माता-पिता खेती करते हैं। साल में मात्र एक ही फसल ली जाती है। बाकी दिनों में वे मजदूरी करते हैं। मुझे बचपन में ही समझ में आ गया था कि परिश्रम का कोई विकल्प नहीं। कोई भी काम कठिन नहीं होता। मेरे परिवार में माता-पिता, एक बहन और एक छोटा भाई है। मैं जब छोटी थी, तब मेरे दादा दूरदर्शन पर खेल और खिलाड़ियों को देखकर कहते थे कि सरिता भी सानिया मिर्जा की तरह एक दिन जरूर नाम कमाएगी। उस समय मैं मात्र खो-खो खेलती थी। वर्ष 2012 के खेल महाकुंभ में खो-खो की स्पर्धा में पहले नंबर पर आई और 25 हजार रुपए का इनाम मिला। तभी से करियर की शुरुआत हुई। घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण मैं महंगी ट्रेनिंग नहीं कर सकती थी। मैंने तय किया कि यदि सफल होती हूं तो ही लोग मान-सम्मान देंगे, इसलिए कड़ी मेहनत करनी है। मेरी आदर्श उड़नपरी पीटी उषा हैं। मेरीकॉम, दंगल, भाग मिल्खा भाग जैसी फिल्मों ने मुझे प्रेरित किया।

जब आवश्यकता होती है, तब नहीं मिलती मदद

खिलाड़ियों का यह दुर्भाग्य है कि निचले स्तर पर जब मदद की जरूरत होती है तो उस समय लोगों को प्रोत्साहन या सपोर्ट नहीं मिलता। राष्ट्रीय सफलता मिलने के बाद ही कोई मदद मिलती है। हमारे क्षेत्र में कम उम्र में शादी कर दी जाती है। भले ही कोई लड़का हो या लड़की। मुख्य रूप से लड़कियों को दूसरे की मानकर उन पर बहुत ध्यान नहीं दिया जाता। लड़कियों को भी अपने सपने साकार करने का हक है। मेरी जैसी कई सरिता डांग दे सकता है। बस, उनको सही दिशा और मार्गदर्शन की जरूरत है।

सरिता को अभिभावकों को सलाह

मैं सभी माता-पिता को सलाह देती हूं कि बच्चा क्या करना चाहता है, उसको परखना चाहिए। 12 से 15 वर्ष की उम्र में भले ही पढ़ाई कराएं, लेकिन यदि पढ़ाई में मन न लगता हो तो उसे मन पसंद के विषय में आगे बढ़ने दें। ऐसा नहीं करेंगे तो बच्चा मानसिक रूप से टूट जाएगा। मैं अभी पंजाब के पटियाला में स्पोर्ट्स अकादमी में ट्रेनिंग ले रही हूं। रोज सुबह पांच बजे उठ जाती हूूं। यहां मैं गुजरात की एकमात्र खिलाड़ी हूं।

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