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मिट्टी में ही ईश्वर हैं…शास्त्रों में हल्दी के गणेश बनाने का उल्लेख

प्राचीनकाल में बारिश के पानी से बैक्टीरिया दूर करने को हल्दी से मूर्ति बनाई जाती थी

Danik Bhaskar | Sep 15, 2018, 12:07 PM IST

वडोदरा । गणेश की मिट्टी की मूर्ति बनाने के पीछे केवल पर्यावरण ही मुख्य कारण नहीं है बल्कि आध्यात्मिक साइंस भी इससे जुड़ा है। मिट्टी में पंचमहाभूत तत्व होते हैं। यह मानव और समस्त सृष्टि में विद्यमान होता है। शास्त्रों में हल्दी से गणेश बनाने का उल्लेख है। हल्दी एंटीबायोटिक है, बारिश के पानी में इससे बनी मूर्ति विसर्जित करने से बैक्टीरिया नष्ट होते हैं। पहले ढांचा तैयार करते हैं...

वडोदरा के कलाकार तपनभाई ने बताया कि मिट्टी की मूर्ति बनाने से पहले सूखी घास का पूड़ा बनाकर ढांचा तैयार करते हैं। उनके अनुसार मस्तक अहंकार का प्रतीक है। भक्ति में अहंकार न आए इसलिए आकाश यानी शून्यमय भक्तिभाव से मस्तक को भगवान के समझ झुकाएं। भक्तिभाव से पूजा करने पर भगवान गणेश सारे पापों को जला देते हैं। परंतु यह ताप (प्रायश्चित) हृदय से होना चाहिए। हर स्थिति को सहन करने की शक्ति जल में है। जल में विसर्जन करने से मूर्ति प्रवाहित और बदलते जीवन को दर्शाता है। मुसीबत में भक्त की परीक्षा होती है। दृढ़ विश्वास रखने से भगवान भक्त को कंधे पर भी बिठाते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि हवा के तेज झोंके से विचलित नहीं होना चाहिए। मिट्टी पैर में होती है। मिट्टी से बनी मूर्ति का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि देह मिट्टी की होती है, और मिट्टी में ही मिल जाती है।

ताड़फलिया पोल में मिट्टी के गणेश

100 साल से घर में मिट्‌टी की मूर्ति बनाते और विसर्जन करते हैं : वडोदरा कम्यूनिटी साइंस सेंटर के संचालक डॉ. जितेंद्र गवली 100 साल से घर पर मिट्टी की मूर्ति बनाते हैं। घर में विसर्जन करते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। जितेंद्रभाई के परिवार वाले इसे निभा रहे हैं।

20 फीट ऊंची मूर्ति में 5 टन मिट्टी

वडोदरा शहर के ताड़फलिया पोल में मिट्टी की मूर्ति बनाई गई है। यह मूर्ति 20 फीट ऊंची है। मूर्ति बनाने वाले तपनभाई ने बताया कि इसे बनाने में 5 टन मिट्टी लगती है। यह मिट्टी कोलकाता से गंगा नदी के किनारे से मंगाई गई है। लोकमान्य तिलक ने 1894 में सार्वजनिक गणेश की स्थापना करने की शुरुआत की थी।

पद्मासन गणेश पूज्य माने जाते हैं

कलाकार जलेन्दु ने बताया कि मूर्ति बनाने के लिए मिट्टी गहराई से निकाली जाती है। इसमें चिकनी मिट्टी का उपयोग होता है जिसे बड़ी मुश्किल से हाथ से निकालते हैं। इससे पद्मासन में बैठी मूर्ति बनानी चाहिए। पद्मासन अवस्था में बनी मूर्ति को ही शास्त्रों में मान्यता दी गई है।

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