हॉस्पिटल में भर्ती न होने वालों में खतरा कम नहीं:कोविड के हल्के लक्षणों वाले मरीजों में रिकवरी के 1 साल बाद भी 40% हार्ट फेल और 24% तक स्ट्रोक का खतरा, अलर्ट रहें

10 दिन पहले
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कोविड से रिकवरी के 1 साल बाद भी मरीज इसके खतरों और साइड इफेक्ट्स से जूझ रहे हैं। ऐसे मरीजों पर हुई नई रिसर्च अलर्ट करने वाली है। अमेरिकी शोधकर्ताओं का कहना है, कोविड के हल्के लक्षणों वाले ऐसे मरीज जो हॉस्पिटल में भर्ती नहीं हुए उनमें भी सालभर बाद हृदय रोगों का खतरा कम नहीं हुआ है।

इन मरीजों में 39 फीसदी तक हार्ट फेल और 24 फीसदी तक स्ट्रोक होने का रिस्क है। इतना ही नहीं, इनमें 119 फीसदी पल्मोनरी एम्बोलिज्म (ब्लड क्लॉटिंग का एक प्रकार) और 277 फीसदी तक दिल में सूजन होने की आशंका बनी हुई है।

हल्के लक्षण वाले मरीज भी खतरे से बाहर नहीं
शोधकर्ता कहते हैं, जो मरीज हॉस्पिटल में भर्ती हो चुके हैं उनमें इन बीमारियों का खतरा ज्यादा रहता है, लेकिन हल्के लक्षणों वाले मरीजों में भी खतरे कम नहीं हैं। यह रिसर्च अमेरिका की वाशिंगटन यूनिवर्सिटी और सेंट लुइस हेल्थ केयर सिस्टम ने मिलकर की है।

शोधकर्ता जियाद अल-अली कहते हैं, रिकवरी के बाद के साइड इफेक्ट बहुत अलग हैं। सरकारों और हेल्थ सिस्टम से जुड़े लोगों को यह समझने की जरूरत है कि कोविड का असर लम्बे समय चलता है। लॉन्ग कोविड के परिणाम परेशान करने वाले हैं और लोग इसे गंभीरता से नहीं ले रहे।

लॉन्ग कोविड क्या है, इसे समझें

लॉन्ग कोविड की कोई मेडिकल परिभाषा नहीं है। आसान भाषा में इसका मतलब है शरीर से वायरस जाने के बाद भी कुछ न कुछ लक्षण दिखते रहना। कोविड-19 के जिन मरीजों की रिपोर्ट निगेटिव आ चुकी है, उन्हें महीनों बाद भी समस्याएं हो रही हैं। कोविड-19 से उबरने के बाद भी लक्षणों का लंबे समय तक बने रहना ही लॉन्ग कोविड है।

कोविड के हल्के लक्षण वाले मामले खतरनाक
नेचर जर्नल में पब्लिश रिसर्च बताती है कि रिकवरी के लम्बे समय बाद भी शरीर पर वायरस का असर क्यों दिख रहा है, अब तक इसका पता नहीं चल पाया है। लॉन्ग कोविड के मरीजों पर कई तरह से वायरस बुरा असर डाल रहा है।

गंभीर मरीजों में कार्डियक अरेस्ट का खतरा 482 फीसदी तक
शोधकर्ताओं का कहना है, कोविड के बाद हॉस्पिटल में भर्ती हुए गंभीर मरीजों में कार्डियक अरेस्ट होने का खतरा 482 गुना तक है। यह खतरा संक्रमण के सालभर बाद तक बना रहता है।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

कोविड-19 से रिकवर लोगों में वह शामिल हैं जो इन्फेक्शन की वजह से मरे नहीं है। हालांकि एक्सपर्ट मानते हैं कि रिकवर होने के बाद भी ऐसे लोगों पर एक साल तक निगरानी रखनी जरूरी है। तभी हम भरोसे के साथ कह सकेंगे कि रिकवर हो चुके लोग पूरी तरह से स्वस्थ हैं। लॉन्ग कोविड से जूझ रहे लोगों को मल्टीडिसिप्लिनरी और मल्टी-केयर अप्रोच से ही ठीक किया जा सकता है। इसकी वजह यह है कि कोविड-19 शरीर के कई अंगों को नुकसान पहुंचा रहा है।

दिल-सांस के अलावा दूसरी जांचें भी जरूरी

ब्रिटिश शोधकर्ताओं का कहना है अभी कोरोना वायरस को मात देने के बाद मरीजों को दिल और सांस से जुड़ी जांचें कराने को कहा जाता है, लेकिन लॉन्ग कोविड के मामलों में इसके अलावा भी कुछ जांचें करानी चाहिए। इनमें न्यूरोसायकियाट्रिक और न्यूरोलॉजिकल लक्षणों को देखने की जरूरत है। जितनी तरह के लक्षण मरीजों में दिख रहे हैं, वे शरीर के कई अंगों पर बुरा असर डाल सकते हैं। इनके कारणों का पता लगाकर ही मरीजों का सही इलाज किया जा सकता है।

कब तक लक्षण बने रहेंगे, कहना मुश्किल

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की न्यूरोसाइंटिस्ट एथेना अक्रमी कहती हैं कि ऐसे मरीजों में आगे कितनी तरह के लक्षण दिखेंगे, इसकी बहुत कम जानकारी मिल पाई है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जैसे-जैसे समय बीतता है, लक्षण दिखाई देने शुरू हो जाते हैं। ये कितनी गंभीर होंगे और इनका रोजमर्रा की जिंदगी पर क्या असर पड़ेगा, इसका पता भी बाद में ही चलता है।

अभी तक हुई रिसर्च में पता चला है कि लॉन्ग कोविड के मामले में लक्षण 35 हफ्तों के बाद तक दिखना जारी रह सकते हैं।

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