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मलेरिया के परजीवी ने बढ़ाई चिंता:अब मलेरिया से लड़ने वाली दवा 'आर्टिमिसिनिन' बेअसर हो रही, अफ्रीका के रवांडा में ऐसा पहला मामला सामने आया; यहां हर दस में से नौ मलेरिया के मरीज

2 वर्ष पहले
  • दक्षिण-पूर्व एशिया में कई सालों से इसके बेअसर होने के मामले सामने आ चुके हैं
  • कई देशों में मलेरिया के 80 फीसदी मरीजों पर यह दवा काम नहीं करती

मलेरिया के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा आर्टिमिसिनिन अब बेअसर साबित हो रही है। अफ्रीका के रवांडा में मलेरिया का ऐसा परजीवी मिला है जिस पर यह दवा काम नहीं कर रही है। अफ्रीका में पहली बार मलेरिया की इस दवा के खिलाफ इम्यूनिटी विकसित होने का मामला सामने आया है।

नेचर जर्नल में प्रकाशित शोध के मुताबिक, ‘आर्टिमिसिनिन’ के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित होना नई बात नहीं है। इससे पहले दक्षिण-पूर्वी एशिया के कुछ हिस्सों में यह दवा पिछले कई सालों से बेअसर साबित हो रही है। कई देशों में तो 80 फीसदी मरीजों को इससे कोई फायदा नहीं हो रहा है। हालांकि, अफ्रीका में ‘आर्टिमिसिनिन’ का बेअसर होना ज्यादा चिंताजनक है क्योंकि मलेरिया के हर दस में से नौ मरीज अफ्रीका में ही सामने आते हैं।

257 में 17 मरीजों पर बेअसर हुई दवा

यह बात रवांडा में राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम के दौरान सामने आई। रवांडा मेडिकल सेंटर, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन, कोचीन हॉस्पिटल और अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने मिलकर अफ्रीका के रवांडा में 257 मरीजों के ब्लड सैम्पल लिए। रिपोर्ट में सामने आया कि 19 मरीजों में मलेरिया की दवा ‘आर्टिमिसिनिन’ काम नहीं कर रही थी।

नई रिसर्च के नतीजे चिंता बढ़ाने वाले

एक्सपर्ट्स का कहना है कि 1950 के दशक में जब मलेरिया की पहली दवा क्लोरोक्वीन पेश की गई तो यह माना जा रहा था कि यह बीमारी कुछ ही सालों में खत्म हो जाएगी। पिछले 7 दशक में मलेरिया के परजीवियों ने धीरे-धीरे खुद में दवाओं को बेअसर करने की क्षमता विकसित कर ली । अफ्रीका में ऐसा होना एक बड़ा झटका है क्योंकि यह देश मलेरिया के मामले में आगे है।

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