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ब्लैक फंगस पर एक्सपर्ट की सलाह:नाक से खून निकलना, चेहरे पर सूजन और स्किन का रंग बदलना भी ब्लैक फंगस के लक्षण, जानिए मरीजों में इसके लक्षण अलग-अलग क्यों हैं

5 महीने पहले
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देश के कई राज्यों में ब्लैक फंगस के मामले बढ़ रहे हैं। सबसे ज्यादा मामले कोरोना के मरीजों में सामने आ रहे हैं। यह फंगस शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर अपना असर डाल रहा है। एक्सपर्ट का कहना है, लक्षणों से यह समझा जा सकता है कि ब्लैक फंगस का संक्रमण शरीर के किस हिस्से में हुआ है। एम्स के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया से जानिए किस तरह के मरीजों में ब्लैक फंगस का खतरा अधिक है और कौन से लक्षण शरीर के किस हिस्से में संक्रमण का इशारे करते हैं...

संक्रमण की जगह के मुताबिक लक्षण बदलते हैं
एक्सपर्ट कहते हैं, ब्लैक फंगस का संक्रमण शरीर के किस हिस्से में हुआ है, इसके आधार पर लक्षण दिखते हैं। ब्लैक फंगस यानी म्यूकरमायोसिस का संक्रमण दो तरह से होता है।

1- राइनो ऑर्बिटल सेरेब्रल म्यूकरमायोसिस: जब सांस के जरिए इस फंगस का संक्रमण होता है तो नाक, आंख, मुंह संक्रमित होता है। यहां से संक्रमण ब्रेन तक भी पहुंच सकता है। ऐसे मामलों में सिरदर्द, नाक से पानी निकलना, नाक में दर्द, नाक से खून निकलना, चेहरे पर सूजन, स्किन का रंग बदलना जैसे लक्षण दिखते हैं।

2- पल्मोनरी म्यूकरमायोसिस: जब हवा में मौजूद ब्लैक फंगस के कण श्वसन तंत्र यानी रेस्पिरेट्री सिस्टम तक पहुंच जाते हैं तो ये सीधे तौर पर फेफड़ों पर असर डालते हैं। ऐसा होने पर बुखार, सीने में दर्द, खांसी या खांसने के दौरान ब्लड निकलने जैसे लक्षण दिखते हैं।
कुछ मामलों में यह पेट तक पहुंच जाता है। नतीजा ये पेट, स्किन और शरीर के दूसरे हिस्से पर भी असर डालता है।

ऐसे मरीजों में संक्रमण का खतरा अधिक
एम्स के डायरेक्टर डॉ. रणदीप सिंह गुलेरिया का कहना है, ब्लैक फंगस के मामले शुरुआत में डायबिटीज के ऐसे मरीजों में सामने आ रहे थे जिनका ब्लड शुगर अधिक बढ़ा हुआ था। लेकिन इसका खतरा कीमोथैरेपी ले रहे कैंसर के मरीजों को भी है। इसके अलावा इम्यून सिस्टम को कमजोर करने वाली इम्यूनोसप्रेसेंट दवाएं लेने वाले मरीज भी रिस्क जोन में हैं।
डॉ. गुलेरिया कहते हैं, कोरोना के मरीजों में इसके मामले बढ़ रहे हैं। एम्स में 20 से अधिक ब्लैक फंगस के मामले सामने आ चुके हैं।

कोरोना के मरीजों को क्यों होता है ब्लैक फंगस का इंफेक्शन
एक्सपर्ट का कहना है, कोरोना के इलाज के दौरान जिस तरह की दवाएं दी जाती हैं उससे शरीर में लिम्फोसाइट्स की संख्या कम हो जाती है। ये लिम्फोसाइट्स व्हाइट ब्लड सेल्स का हिस्सा हैं जो रोगों से लड़ने में मदद करती है। शरीर में लिम्फोसाइट्स की संख्या कम होने पर इम्युनिटी घट जाती है, नतीजा फंगल इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए कोरोना पीड़ितों के इलाज के दौरान या रिकवरी के बाद ब्लैक फंगस के मामले सामने आ रहे हैं।

ये शरीर में कैसे पहुंचता है?

वातावरण में मौजूद ज्यादातर फंगस सांस के जरिए हमारे शरीर में पहुंचते हैं। अगर शरीर में किसी तरह का घाव है या शरीर कहीं जल गया है तो वहां से भी ये इंफेक्शन शरीर में फैल सकता है। अगर शुरुआती दौर में ही इसका पता नहीं लगाया गया तो आंखों की रोशनी जा सकती है या फिर शरीर के जिस हिस्से में ये फंगस फैले हैं, वो हिस्सा सड़ सकता है।

ब्लैक फंगस कहां पाया जाता है?

ये फंगस वातावरण में कहीं भी रह सकता है, खासतौर पर जमीन और सड़ने वाले ऑर्गेनिक मैटर्स में। जैसे पत्तियों, सड़ी लकड़ियों और कम्पोस्ट खाद में यह पाया जाता है।

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