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पेरेंट्स को अलर्ट करने वाली रिसर्च:बच्चों को डिप्रेशन से दूर रखना है तो उन्हें स्पोर्ट्स और फिजिकल एक्टिविटी के लिए प्रेरित करें, कनाडा के शोधकर्ताओं का दावा

19 दिन पहले
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बच्चों को डिप्रेशन से दूर रखना चाहते हैं तो उन्हें स्पोर्ट्स या फिजिकल एक्टिविटी के लिए प्रेरित करें। यह दावा मॉन्ट्रियल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपनी हालिया रिसर्च में किया है। शोधकर्ता कहते हैं, जो लड़के किशोरावस्था में फिजिकली एक्टिव रहते हैं उनके इमोशनली वीक होने का खतरा कम रहता है।

रिसर्च की 3 बड़ी बातें

  • मॉन्ट्रियल यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता मारिया-जोसे कहती हैं, रिसर्च के दौरान यह देखा गया कि बच्चों की फिजिकल एक्टिविटी का मेंटल हेल्थ पर क्या असर पड़ता है। इसके लिए हमनें 5 से 12 साल के लड़के-लड़कियों पर रिसर्च की। इन बच्चों का जन्म 1997 से 1998 के बीच हुआ था।
  • इन बच्चों की फिजिकल एक्टिविटी कैसी, इसके बारे में बच्चों से सवाल-जवाब किए गए और पेरेंट्स से भी पूछताछ की गई। रिसर्च में सामने आया कि जिन बच्चों ने अपनी 5 साल की उम्र में स्पोर्ट्स एक्टिविटी में हिस्सा नहीं लिया वो खुद को थका हुआ महसूस करते हैं। ये चिल्लाते बहुत थे और डरे हुए से दिखते थे।
  • रिसर्च रिपोर्ट कहती है डिप्रेशन और बेचैनी के मामले उन बच्चों में अधिक देखे गए जो करीब 12 साल की उम्र में भी फिजिकली एक्टिव नहीं थे। वहीं, लड़कियों में कोई बड़ा बदलाव नहीं देखा गया।

बच्चों पर कई बातों का असर पड़ता है

शोधकर्ता कहते हैं, हमारा लक्ष्य यह बताना था कि बच्चों की शुरुआती उम्र की स्थिति उन पर असर डालती है। वो कितना गुस्सा करते हैं, पेरेंट्स कितने पढ़े-लिखे हैं और फैमिली की आय कितनी है, उन पर इसका भी असर पड़ता है।

स्कूल जाने से पहले भी जो लड़के हल्की-फुल्की फिजिकल एक्टिवटी करते हैं उनमें टीम के साथ काम करने, खुद पर कंट्रोल रखने और दूसरों के साथ अच्छे सम्बंध बनाने की खूबी विकसित होती है।

लड़के और लड़कियों के डिप्रेशन-बेचैनी में है फर्क
शोधकर्ता कहते हैं, लड़के और लड़कियों में होने वाले डिप्रेशन और बेचैनी में फर्क है। लड़कों में डिप्रेशन और बेचैनी होने पर ये समाज से खुद को अलग कर लेते हैं और इनमें एनर्जी का लेवल तेजी से घटता है। यह इनमें नकारात्मक भावनाओं को जगाता है।

वहीं, लड़कियों में डिप्रेशन और बेचैनी होने पर ये किसी करीबी या दोस्त से मदद लेती हैं। उनसे बात शेयर करती हैं। इसलिए स्थिति इतनी नहीं बदलती। इसके अलावा लड़कों के मुकाबले लड़कियों अपने इमोशन को बेहतर कंट्रोल कर पाती हैं। यह खूबी उन्हें अंदरूनी तौर पर टूटने से बचाती है।

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