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अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्च:कोरोना से रिकवर होने के बाद 4 माह तक बनी रहती हैं एंटीबॉडीज, ट्रम्प का जिंदगीभर एंटीबॉडीज बने रहने का दावा हुआ खारिज

10 दिन पहले
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  • शोधकर्ताओं का दावा, ये एंटीबॉडीज कोरोना से उबर चुके मरीजों में दोबारा होने वाले संक्रमण से बचाएंगी
  • 4 महीने तक कोरोना के 343 मरीजों के ब्लड सैम्पल लेकर एंटीबॉडीज की जांच की गई

कोरोना से रिकवर होने वाले मरीजों में अगले 4 महीने तक इस वायरस से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज बनी रहती हैं। यह दावा अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने अपनी रिसर्च में किया है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्च ने ट्रम्प के उस दावे को खारिज किया है जिसमें उन्होंने कहा था कि कोरोना को हराने के बाद मुझमें जीवनभर के लिए एंटीबॉडीज बन सकती हैं।

रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों के मुताबिक, ये एंटीबॉडीज कोरोना से उबर चुके मरीजों में दोबारा होने वाले संक्रमण से बचाएंगी।

343 मरीजों पर हुई स्टडी
शोधकर्ताओं के मुताबिक, कोरोना से जूझने वाले 343 मरीजों पर रिसर्च की गई। इनके ब्लड सैम्पल लिए गए। इनमें से ज्यादातर मरीजों की हालत नाजुक थी और 93 फीसदी को हॉस्पिटल में भर्ती करने की नौबत आई।

4 महीने तक मरीजों के ब्लड सैम्पल लिए
साइंस इम्यूनोलॉजी जर्नल में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक, कोरोना के मरीजों से ब्लड सैम्पल 4 महीने तक लिए गए। पहली बार सैम्पल तब लिया जब वे खांसी, बुखार और सांस लेने की तकलीफ से जूझ रहे थे।

रिसर्च के लिए इनके ब्लड से प्लाज्मा को अलग किया गया। इसकी जांच हुई। जांच में सामने आया कि इनमें 4 महीने तक इम्यूनोग्लोब्यूलिन-जी एंटीबॉडी बनी रहीं। इम्यूनोग्लोब्यूलिन-जी एंटीबॉडी एक तरह से प्रोटीन होता है जो तब रिलीज होता है जब कोई संक्रमण होता है।

क्या कहा था अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने
कोरोना से रिकवर होने के बाद फॉक्स न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा था, वाकई में कोई नहीं जानता कि मैं इम्यून हूं। ये इम्युनिटी कम समय के लिए रह सकती है। या लम्बे समय तक भी रह सकती है। ऐसा भी हो सकता है कि ये जीवनभर के लिए रहे।

क्या होती हैं एंटीबॉडीज

जब इंसान किसी वायरस के संपर्क में आता है तो शरीर का इम्यून सिस्टम उससे लड़ने के लिए एंटीबॉडीज बनाता है। ये वायरस को शरीर में फैलने से रोकती हैं। शरीर में इसका लेवल पता करने के लिए एंटीबॉडी टेस्ट कराया जाता है। टेस्ट के जरिए यह भी पता लगाया जाता है कि शरीर इन्हें बना रहा है या नहीं। अगर ये मौजूद हैं तो आशंका बढ़ जाती है कि आप कोविड-19 के संपर्क में आ चुके हैं।

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