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Q&A:देश में वैक्सीन के लिए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक भी साथ आए, जल्द ही सफलता मिलेगी : आईसीएमआर एक्सपर्ट

नई दिल्लीएक वर्ष पहले
  • ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के जेनर इंस्टीट्यूट ने सितम्बर तक वैक्सीन उपलब्ध कराने का दावा किया है
  • आईसीएमआर एक्सपर्ट के मुताबि, प्लाज्मा खून का एक हिस्सा इसे डोनेट करने पर शरीर में कमजोरी नहीं आती

देश में वैक्सीन तैयार करने के लिए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) तेजी से काम रहा है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक्सपर्ट भारत के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। कोरोनावायरस की वैक्सीन को लेकर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक काफी निश्चिंत हैं। उनका मानना है कि यह वायरस को खत्म करेगी। वैक्सीन पर काम कर रहे यूनिवर्सिटी के जेनर इंस्टीट्यूट का कहना है कि सितंबर तक वैक्सीन तैयार कर ली जाएगी और यह एक सुरक्षित दवा साबित होगी। आईसीएमआर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ तरुन भटनागर के मुताबिक, जल्द ही इसमें सफलता मिलेगी। डॉ तरुन प्लाज्मा डोनेशन, कम्युनिटी इंफेक्शन और वैक्सीन की तैयारी से जुड़े कई सवालों के जवाब आकाशवाणी को दिए। जानिए इनके बारे में.... 

 #1) वैक्सीन पर आईसीएमआर काफी काम कर रहा है, यह कार्य कहां तक पहुंचा?
कोरोनावायरस पर दो तरह की रिसर्च जारी है। पहला प्लाज्मा थैरेपी और दूसरा बीसीजी वैक्सीन। दोनों पर शोध दूसरे देशों में भी चल रहा है। हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन से कोरोनावायरस का इलाज हो सकता है। पर अनुसंधान किया जा रहा है। इसके अलावा आईसीएमआर और राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान ने इस वायरस के कल्चर का पता लगा लिया है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक भी भारत सरकार के साथ जुड़ गए हैं और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया संग मिलकर काम कर रहे हैं। जल्द ही इसमें सफलता मिलेगी।

 #2) कम्युनिटी स्प्रेड न हो, इसके लिए टेस्टिंग कैसे की जानी चाहिए?
इसमें दो प्रकार के टेस्ट है। पहला, आईटीपीसीआर टेस्ट। यह टेस्ट बताता है कि किसी इंसान को कोविड-19 का संक्रमण है या नहीं। दूसरा, पॉप्युलेशन लेवल पर यह संक्रमण कितना फैल रहा है। उसमें एंटीबॉडी टेस्ट मदद कर सकता है। यह वायरस अटैक करता है तो शरीर अपनी तरफ से एंटीबॉडी का निर्माण करता है। किसी इलाके में अगर हम सभी लोगों का एंटीबॉडी टेस्ट करें तो पता चल सकता है कि कितने लोग वायरस से संक्रमित है लेकिन लक्षण नहीं और कितने लोग संक्रमण से बीमार हैं। इस पूरी प्रक्रिया में पता चल सकता है कि किसी इलाके में यह संक्रमण कितना फैला है।

 #3) कोरोनावायरस से जंग में आईसीएमआर की क्या योजना है?,
इस समय आईसीएमआर की 300 से ज्यादा लैब कोविड-19 की टेस्टिंग कर रही हैं। इसके अलावा करीब 100 प्राइवेट लैब हैं। लैब और बढ़ाई जा रही हैं। टेस्ट की बात करें तो अब तक करीब 8 लाख 30 हजार टेस्ट हो चुके हैं और जांच के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष 10 देशों में है। शुरुआत में रोजाना 1 हजार तक टेस्ट कर रहे थे जो अब बढ़कर 50 हजार हो गए हैं। ये सब आईसीएमआर की निगरानी में हो रहा है। 

 #4) तेल में लहसुन पकाकर ठंडा पर उसे नाक में डालने से क्या वायरस से बच सकते हैं?
अभी तक लहसुन पककाकर तेल खाने या नाक में डालने से कोरोनावायरस के संक्रमण से बचने का कोई प्रमाण नहीं मिला है। अगर आप रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए कुछ खाना-पीना चाहते हैं तो आयुष मंत्रालय के दिशा-निर्देश का पालन करें। घर से बाहर न निकलें और बाहर जाएं तो मास्क लगाकर ही जाएं।

 #5) कुछ इलाकों में सर्वेक्षण कराए जा रहे हैं, इससे क्या फायदा होगा?
कई प्रदेशों में घर-घर जाकर लोगों की खांसी, जुकाम और हल्के बुखार आदि की जानकारी जुटाई जा रही है कि कहीं किसी को कोरोना के लक्षण तो नहीं है। इसको सिंड्रोमिक सर्विलांस कहते हैं। बिना टेस्ट लिए यह पता लगाया जाता है कि अगर कहीं पर एक या दो कोरोना के मरीज हैं तो आसपास रहने वाले लोगों में लक्षण तो नहीं बढ़ रहे। भारत की आबादी इतनी अधिक है कि एक बार में सभी का टेस्ट करना संभव नहीं है।

 #6) क्या प्लाज्मा देने से कमजोरी आती है और इसके लिए जोर-जबरदस्ती की जाएगी?
प्लाज्मा खून का एक हिस्सा होता है। अभी इस पर रिसर्च चल रही है। जिसमें अगर कोई संक्रमित इंसान है तो उसके अंदर वायरस से लड़ने के लिए एंटीबॉडी बन जाती है, जिसे निकालकर गंभीर रूप से संक्रमित इंसान को दिया जाता है। जो प्लाज्मा देता है उसे कोई कमजोरी नहीं आती। किसी के साथ कोई जोर - जबरदस्ती नहीं की जाती। कोई भी व्यक्ति प्लाज्मा देने के लिए बाध्य नहीं है। अभी इस पर प्रयोग चल रहा है, इसे कोई निश्चित पद्धति नहीं मान सकते।

 #7) कई शोध संस्थान जांच किट बना रहे हैं, उन्हें मान्यता कैसे मिलती है?
भारत में जितने शोध संस्थान या प्राइवेट लैब हैं सभी इस कोशिश में लगे हैं कि वायरस की टेस्टिंग प्रोसेस या जांच किट बनाई जाए। अगर वे ऐसा कुछ बनाते हैं तो देश में उसका प्रयोग करने से पहले नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में जांच होती है, यह आईसीएमआर की ही लैब है। अगर किट की जांच प्रक्रिया सफल रहती है तो उसे प्रयोग करने की अनुमति दी जाती है।

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