जांच का नया तरीका ई-नोज:बीमारियों को सूंघने वाली 'नाक', इस इलेक्ट्रॉनिक नोज से पता लगा सकेंगे लिवर, फेफड़े और कोलोन कैंसर जैसी बीमारियां, जानिए कैसे करती है काम

7 दिन पहले
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बीमारियों को पहचानने के लिए वैज्ञानिक नई तरह की जांचों को विकसित करने में जुटे हैं। इलेक्ट्रॉनिक नोज इसका एक उदाहरण है। इलेक्ट्रॉनिक नोज के जरिए लिवर, फेफड़े और कोलोन कैंसर जैसी बीमारियों का पता लगाया जा सकता है। बीमारियों की जांच करने के लिए इस नाक को अपनी नाक पर मास्क की तरह लगाना होगा और कुछ ही समय में बीमारी का पता चल जाएगा।

इसे तैयार करने वाली यूके की बायोटेक कंपनी आउलस्टोन मेडिकल का कहना है, इलेक्ट्रॉनिक नोज (ई-नोज )की मदद से कोविड का पता लगाया जा सके, इस पर भी काम किया जा रहा है। इसे ई-नोज भी कहते हैं।

रिर्च के मुताबिक, आमतौर पर मरीज ब्लड, यूरिन और मल का सैम्पल देते समय सहज नहीं महसूस करता, लेकिन नई जांच मरीजों के लिए बेहद आसान साबित होगी और समय भी कम लगेगा।

कैसे काम करती है इलेक्ट्रॉनिक नोज
यह ई-नोज मरीज की सांस से आने वाली बीमारी की गंध को पहचानकर रोग का पता लगाती है। वैज्ञानिकों का कहना है, जब इंसान सांस छोड़ता है तो उसमें 3500 से अधिक वोलाटाइल ऑर्गेनिक कम्पाउंड्स (VOCs) होते हैं। इसमें गैस के बेहद छोटे कण और माइक्रोस्कोपिक ड्रॉपलेट्स होते हैं। ई-नोज वोलाटाइल ऑर्गेनिक कम्पाउंड्स में मौजूद केमिकल की जांच करती है और बीमारी का पता लगाती है।

डिवाइस को बनाने में 51 साल लग गए
वैज्ञानिक को इसे तैयार करने का आइडिया 1970 में ही आया था, लेकिन इस आइडिए को सेंसेटिव डिवाइस में बदलने, वोलाटाइल ऑर्गेनिक कम्पांउड्स को पहचानने की प्रोग्रामिंग और सेंसर तैयार करने में दशकों लग गए। दुनियाभर के कई देशों में इसका ट्रायल चल रहा है। खासतौर पर यूके में सामने आए परिणाम असरदार रहे हैं।

एक्सपर्ट्स कहते हैं, अगले पांच सालों में ई-नोज के जरिए होने वाला टेस्ट एक रूटीन जांच की तरह होने लगेगा। इस पर लगातार काम किया जा रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है, यह कोशिश की जा रही है कि डिवाइस यह भी बता सके कि बीमारी के हिसाब से मरीज के लिए कौन सी दवा बेहतर रहेगी।

कैंसर की जांच के लिए इसी तकनीक का इस्तेमाल
इस तकनीक के जरिए दुनियाभर के कई देशों में सांस से जुड़े क्लीनिकल ट्रायल चल रहे हैं। इसमें कैंसर से जुड़े ट्रायल भी शामिल हैं। ट्रायल का लक्ष्य कैंसर को समय से पहले पता लगाना है। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और NHS फाउंडेशन के साथ मिलकर यूके के अस्पतालों में 4000 मरीजों पर ट्रायल किया जा रहा है।