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जयपुर में मेडिकल साइंस का अनोखा केस:आगरा से लाए 45 दिन पहले जन्मे बच्चे में दो दुर्लभ बीमारियां, दुनिया का यह पहला ऐसा मामला; पॉम्पे डिसीज और स्पाइनल मस्क्युलर एट्रॉफी से जूझ रहा है मासूम

एक महीने पहले
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  • सांस तेज चलने और पैरों में हरकत कम होने के कारण बच्चे को आगरा से जयपुर के लेके लोन हॉस्पिटल लाया गया
  • हॉस्पिटल में तीन डॉक्टरों का एक दल बच्चे का इलाज कर रहा है, उनके मुताबिक, ऐसे मरीज बिना इलाज जिंदा नहीं रह पाते

जयपुर के सरकारी अस्पताल जेके लोन में भर्ती 44 दिन के एक बच्चे में दो दुर्लभ बीमारियां मिली हैं। उसमें पॉम्पे डिसीज और स्पाइनल मस्क्युलर एट्रॉफी-1 का पता चला है। अस्पताल के दुर्लभ बीमारी निदान केन्द्र के प्रभारी डॉ.अशोक गुप्ता के मुताबिक, बच्चे के लिए दवाएं उपलब्ध कराई जा चुकी हैं। नवजात का इलाज तीन डॉक्टरों का एक दल कर रहा है। इस दल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रियांशु माथुर ने भास्कर को बताया, दो दुर्लभ बीमारियां एक नवजात में होने का यह दुनिया का पहला मामला है। जन्म के 25वें दिन बच्चे को आगरा से जयपुर लाया गया था। उसमें सांस तेज चलने के साथ पैरों में हरकत कम हो रही थी।

40 हजार लोगों में से किसी एक में पॉम्पे डिसीज का मामला सामने आता है। वहीं, एक लाख में से 1 या दो लोगों में ही स्पाइनल मस्क्युलर एट्रॉफी होता है।

समय पर पता चलने से इलाज आसान हुआ

डॉ. प्रियांशु माथुर ने बताया, इस मामले में सबसे अच्छी बात यह रही कि दोनों ही बीमारियों का पता समय पर चल गया है। आमतौर पर स्पाइनल मस्क्युलर एट्रॉफी डिसीज होने पर इसके लक्षण करीब 6 महीने बाद दिखते हैं जब बच्चा बैठ नहीं पाता। बीमारियों को पकड़ में आते-आते 9-10 महीने लग जाते हैं। पॉम्पे के लक्षण भी दो से ढ़ाई महीने बाद दिखते हैं। इसकी जांच की फेसिलिटी भी जयपुर में नहीं है। इसका पता चलने में 6-8 महीने लग जाते हैं।

पॉम्पे का शक होने पर जांच हुई

जन्म के 25वें दिन बच्चे को जयपुर लाया गया। पहले दिन ही पॉम्पे डिसीज का शक होने पर जांच हुई। अगले 4 दिन तक देखरेख के बाद बच्चे में स्पाइनल मस्क्युलर एट्रॉफी की आशंका जताई गई और इसकी भी जांच की गई। दोनों में से एक बीमारी का खतरा जताया गया था। लेकिन 40वें दिन जांच में दोनों दुर्लभ बीमारियां होने की बात सामने आई।

विदेशी कम्पनी से मुफ्त दवाएं उपलब्ध कराईं
पॉम्पे की दवाएं काफी महंगी होती हैं। चेरिटेबल प्रोग्राम के तहत पॉम्पे की दवा तैयार करने वाली नीदरलैंड की दवा कम्पनी जेनजाइम से दवाएं मंगाई गईं। अस्पताल प्रशासन ने कम्पनी से दवाएं मुफ्त उपलब्ध कराने का आग्रह किया। कम्पनी की ओर से अप्रूवल मिलते ही मुफ्त दवाएं बच्चे को उपलब्ध कराई गईं। जल्द ही स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी की थैरेपी भी उपलब्ध कराई जाएगी।

एक साल की दवा का खर्च करोड़ों में
डॉ. प्रियांशु माथुर के मुताबिक, बच्चे की बीमारी का इलाज शुरू कर दिया गया है। दवाएं भी उपलब्ध हो गई हैं। ऐसी बीमारी वाले मरीज बिना इलाज जीवित नहीं रह पाते। पॉम्पे डिसीज की दवा का एक साल का खर्च 25-30 लाख रुपए तक आता है। वहीं, स्पाइनल मस्क्युलर एट्रॉफी का खर्च 4 करोड़ रुपए सालाना तक आता है।

क्या है पॉम्पे और स्पाइनल मस्क्युलर एट्रॉफी
नेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर रेयर डिसऑर्डर के मुताबिक, पॉम्पे डिसीज एक रेयर मल्टीसिस्टम डिसऑर्डर है। इसके लक्षण जन्म से लेकर युवावस्था तक कभी भी दिख सकते हैं। इसके मरीजों में मांसपेशियों में कमजोरी, चलने-फिरने में दिक्कत, सांस लेने में तकलीफ होती है। इस बीमारी के कारण ग्लाइकोजन शरीर में ऊतकों में पहुंचकर उसे कमजोर बनाता है। यह एक आनुवांशिक बीमारी है जो एक से दूसरी पीढ़ी में भी जा सकती है।

स्पाइनल मस्क्युलर एट्रॉफी के सबसे ज्यादा मामले बच्चों में सामने आते हैं। बीमारी होने पर मांसपेशियां काफी सख्त हो जाती हैं। ऐसा स्पाइनल कॉर्ड और ब्रेन में नर्व सेल के डैमेज होने से होता है। इस स्थिति में ब्रेन का संदेश मांसपेशियों को कंट्रोल करने वाले नर्व सेल्स तक नहीं पहुंच पाता। इसके मरीजों में चलने-फिरने, गर्दन को हिलाने और उसे कंट्रोल करने में दिक्कत होती है। कई बार स्थिति बिगड़ने पर खाना निगलने और सांस लेने में परेशानी भी हो सकती है।

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