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बच्चों में साइलेंट कोविड-19 का खतरा:बच्चों की नाक और गले में कई हफ्तों तक रह सकता है कोरोनावायरस, ऐसे एसिम्प्टोमैटिक मरीजों से आबादी में संक्रमण फैलने का खतरा

8 महीने पहले
रिसर्चर्स कहते हैं कि बच्चों में लक्षण न दिखने पर इनसे पूरी कम्युनिटी में वायरस फैल सकता है। - प्रतीकात्मक फोटो
  • वॉशिंगटन के चिल्ड्रेन नेशनल हॉस्पिटल के रिसर्चर्स ने साउथ कोरिया में स्टडी की
  • रिसर्चर्स ने कहा, सिर्फ लक्षण दिखने पर बच्चों की जांच हुई तो एसिम्प्टोमैटिक बच्चों का दायरा बढ़ सकता है

बच्चों की नाक और गले में कई हफ्तों तक कोरोनावायरस रह सकता है। इस दौरान ऐसा भी हो सकता है कि उनमें इसके कोई लक्षण (एसिम्प्टोमैटिक) न दिखें। यह दावा वॉशिंगटन के चिल्ड्रन नेशनल हॉस्पिटल की रिसर्च में सामने आया है। रिसर्चर्स का कहना है कि अध्ययन बताता है कि कैसे कोरोनावायरस गुपचुप तरीके से अपना संक्रमण फैला सकता है।

केवल लक्षण दिखने पर जांच होने के कारण बढ़ सकते हैं मामले
कनाडा के रिसर्चर्स ने यह अध्ययन साउथ कोरिया में किया है। उनका कहना है, यह देखा गया है कि बच्चों में कोरोना का संक्रमण गुपचुप तरीके से फैल रहा है। रिसर्च में सामने आया कि 85 संक्रमित बच्चे टेस्टिंग से सिर्फ इसलिए दूर हो गए, क्योंकि उनमें लक्षण नहीं दिख रहे थे। कोविड-19 की जांच भी उनकी की गई जिनमें लक्षण दिखे। ऐसा आगे भी हुआ तो कम्युनिटी में एसिम्प्टोमैटिक बच्चों का दायरा बढ़ सकता है।​​​​​​

सीडीसी की नई गाइडलाइन का विरोध जारी
इस रिसर्च के नतीजे उस समय सामने आए हैं, जब अमेरिका की सबसे बड़ी स्वास्थ्य संस्था सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) का विरोध हो रहा है। सीडीसी ने हाल ही में एक गाइडलाइन जारी की थी जिसके मुताबिक, एसिम्प्टोमैटिक मरीजों की जांच कराने की जरूरत नहीं है। यह तब तक करने की जरूरत नहीं है, जब तक वे किसी कोरोना के मरीज के संपर्क में न आए हों।

सीडीसी के इस फैसले को अमेरिकन अकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स ने खतरनाक पिछड़ा कदम कहा है।

91 में से 38 बच्चे एसिम्प्टोमैटिक और प्री-सिम्प्टोमैटिक निकले
रिसर्च के मुताबिक, साउथ कोरिया में 18 फरवरी से 31 मार्च के बीच 91 एसिम्प्टोमैटिक, प्री-सिम्प्टोमैटिक और सिम्प्टोमैटिक बच्चे मिले थे जिनमें कोरोना की पुष्टि हुई। इनमें से 20 बच्चों को कोरोना के लक्षण नहीं दिखे। ये एसिम्प्टोमैटिक थे। 91 में से 18 ऐसे बच्चे भी थे जो प्री-सिम्प्टोमैटिक थे। यानी इनमें कोई शुरुआती लक्षण तो नहीं दिखा लेकिन बाद में लक्षण दिख सकते हैं।

वहीं, बाकी बच्चों में कोरोना के साफतौर पर लक्षण दिखे। इनमें बुखार, खांसी, डायरिया, पेट में दर्द, स्वाद या गंध का पता न चल पाना जैसे लक्षण दिख रहे थे।

खेल-खेल में संक्रमण का बढ़ता खतरा
रिसर्चर्स कहते हैं कि बच्चों में लक्षण न दिखने पर इनसे पूरी कम्युनिटी में वायरस फैल सकता है। ये बच्चों के साथ खेलते हैं और कई तरह की गतिविधियों में शामिल रहते हैं। औसतन में ऐसे एसिम्प्टोमैटिक बच्चों में 14 दिन में लक्षण दिखते हैं।

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