पहल में बीफ का पेंच:यूके में मैकडॉनल्ड का पहला 'नेट जीरो' रेस्तरां कार्बन फुटप्रिंट्स को घटाएगा; बीफ की सबसे बड़ी खरीदार इस कंपनी के लिए बड़ी चुनौती है यह पहल, जानिए कैसे

14 दिन पहले
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मैकडॉनल्ड यूके के श्रॉपशायर में अपना पहला 'नेट जीरो' रेस्तरां खोलेगा। कंपनी का दावा है कि वो इसके जरिए कार्बन फुटप्रिंट्स को कम करेगी। यहां पर प्लांट से तैयार वीगन फूड भी मिलेंगे। फूड की पैकिंग को रिसायकल चीजों से तैयार किया जाएगा। इनका इस्तेमाल होने के बाद फिर पैकिंग को रिसाइकल करके दोबारा प्रयोग किया जा सकेगा।

मैकडॉनल्ड के यूके में करीब 1300 रेस्तरां हैं। कंपनी ने 2040 तक कार्बन उत्सर्जन को जीरो करने का प्लान तैयार किया है। प्लान का नाम है 'प्लान फॉर चेंज'।

कार्बन उत्सर्जन क्या है, यह कैसे हम पर असर डालता है और मैकडॉनल्ड के लिए बड़ी चुनौतियां क्या हैं.... जानिए इन सवालों के जवाब...

सबसे पहले समझें, कार्बन उत्सर्जन है क्या?
आसान भाषा में समझें तो हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में कई ऐसे काम करते हैं, जिससे कार्बन-डाई-ऑक्साइड गैस निकलती है। हम दिन, महीने या साल में जितनी कार्बन-डाई-ऑक्साइड पैदा करते हैं, वही हमारा कार्बन फुटप्रिंट है।

जैसे-जैसे कार्बन फुटप्रिंट बढ़ता है, यह ग्रीन हाउस गैसों के साथ मिलकर धरती को गर्म करने का काम करता है। कई रिसर्च में भी साबित हो चुका है कि यह जलवायु परिवर्तन का खतरा तेजी से बढ़ा रहा है। इन खतरों को रोकना है तो कार्बन फुटप्रिंट्स को घटाना ही होगा।

क्या है मैकडॉनल्ड के लिए जुड़ी चुनौती
मैकडॉनल्ड में हाल ही में प्लांट से तैयार चीजों से बना बर्गर पेश किया है। यह यूके के रेस्तरां में उपलब्ध है। इसे मैकप्लांट का नाम दिया गया है। कार्बन फुटप्रिंट्स को घटाने के लिए मैकडॉनल्ड का यह एक कदम है, लेकिन कंपनी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है बीफ। मैकडॉनल्ड दुनियाभर में ब्रीफ की सबसे बड़ी खरीदार कंपनियों में से एक है।

अमेरिका की इलिनॉयस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की हालिया रिसर्च कहती है, नॉनवेज फूड में से सबसे ज्यादा ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बीफ से होता है। इन्हीं ग्रीन हाउस गैसों में बड़ा हिस्सा कार्बन का होता है। रेस्तरां में 80 फीसदी तक कार्बन का उत्सर्जन बीफ, चिकन, डेयरी और दूसरे प्रोटीन प्रोडक्ट के कारण हो रहा है।

क्या होती हैं ग्रीनहाउस गैस और कैसे जलवायु परिवर्तन के लिए ये हैं जिम्मेदार
ग्रीनहाउस गैसें तापमान में हो रही बढ़ोतरी के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। वातावरण में मौजूद 6 प्रमुख ग्रीनहाउस गैस हैं, इनमें कार्बनडाइऑक्साइड (CO2), मीथेन (CH4), नाइट्रस ऑक्साइड (N2O), हाइड्रोफ्लूरोकार्बन (HFs), परफ्लूरोकार्बन (PFCs), सल्फर हेक्साफ्लोराइड (SF6) शामिल हैं। इनमें कार्बन का उत्सर्जन भी शामिल हैं।

अब इन गैसों से धरती का तापमान कैसे बढ़ रहा है, इसे समझें। दरअसरल, जैसे-जैसे वातावरण में ये गैसें बढ़ रही हैं, इनकी एक मोटी पर्त जैसी बनती जा रही है। ये जरूरत से ज्यादा गर्माहट को रोक रही हैं। नतीजा धरती का तापमान बढ़ रहा है। नेचर फूड जर्नल में पब्लिश रिसर्च कहती है, इस बात के साक्ष्य मिले हैं जो बताते हैं कि रेड मीट जलवायु परिवर्तन की समस्या को बढ़ाने का काम कर रही है।

मीट से होने वाले नुकसान और शाकाहारी होने के फायदे समझें
2016 में नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस की एक स्टडी आई थी। इसमें कहा गया था कि अगर दुनिया की सारी आबादी मांस छोड़कर सिर्फ शाकाहार खाना खाने लगे तो 2050 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 70% तक की कमी आ सकती है।

अंदाजन दुनिया में 12 अरब एकड़ जमीन खेती और उससे जुड़े काम में इस्तेमाल होती है। इसमें से भी 68% जमीन जानवरों के लिए इस्तेमाल होती है। अगर सब लोग वेजिटेरियन बन जाएं तो 80% जमीन जानवरों और जंगलों के लिए इस्तेमाल में लाई जाएगी।

इससे कार्बन-डाई-ऑक्साइड की मात्रा कम होगी और क्लाइमेट चेंज से निपटने में मदद मिलेगी। बाकी बची हुई 20% जमीन का इस्तेमाल खेती के लिए हो सकेगा। जबकि, अभी जितनी जमीन पर खेती होती है, उसके एक-तिहाई हिस्से पर जानवरों के लिए चारा उगाया जाता है।