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14वीं सदी में कहर बरपाने वाला बैक्टीरिया:5 हजार साल पहले 'काली मौत' महामारी फैलाने वाला बैक्टीरिया प्राचीन शिकारी की खोपड़ी में मिला, जर्मनी के वैज्ञानिकों का दावा

एक वर्ष पहले
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लाटविया के रिन्नूकाल्न्स इलाके में 5 हजार साल पहले दफनाए गए शिकारी की खोपड़ी से मिला बैक्टीरिया। - Dainik Bhaskar
लाटविया के रिन्नूकाल्न्स इलाके में 5 हजार साल पहले दफनाए गए शिकारी की खोपड़ी से मिला बैक्टीरिया।

जर्मनी के वैज्ञानिकों ने 5 हजार साल पुराने उस बैक्टीरिया को खोज लिया है जिसने 14वीं सदी में 'काली मौत' नाम की महामारी फैलाई थी। बैक्टीरिया का नाम यर्सिनिया पेस्टिस है, इसे एक प्राचीन शिकारी की खोपड़ी से खोजा गया है। रिसर्च के दौरान यह साबित भी हो चुका है।

अब तक माना जाता था कि 'काली मौत' यानी 'ब्लैक डेथ' प्लेग का बैक्टीरिया एक हजार साल पुराना है, लेकिन नई रिसर्च कहती है कि इसका वंश 7 हजार साल पुराना है। यह दावा जर्मनी की कील यूनिवर्सिटी ने अपनी हालिया रिसर्च में किया है।

मौत के समय शिकारी की उम्र 20 से 30 साल थी
कील यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता क्रॉस कियोरा का कहना है, हमें जिस शिकारी की खोपड़ी से यह बैक्टीरिया मिला है, मौत के समय उसकी उम्र करीब 20 से 30 साल थी। खोपड़ी को RV2039 नाम दिया गया है। लाटविया के रिन्नूकाल्न्स इलाके में इस शिकारी को करीब 5 हजार साल पहले दफनाया गया था। वैज्ञानिकों को इस शिकारी की हड्डियां 19वीं शताब्दी में मिली थीं। 2011 में ऐसी और खोपड़ी मिलने पर दोबारा खोज शुरू की गई।

बैक्टीरिया ने संक्रमित कैसे किया, यह गुत्थी नहीं सुलझी
जर्मन वैज्ञानिकों का कहना है, अब तक ऐसी चार खोपड़ियां और कंकाल मिले हैं। जांच करने पर इनमें काफी संख्या में बैक्टीरिया और वायरस मिले। यहीं से यर्सिनिया पेस्टिस बैक्टीरिया भी मिली। हालांकि, इस बैक्टीरिया ने इंसानों को संक्रमित कैसे किया है, वैज्ञानिक इसका पता नहीं लगा पाए हैं।

दांतों की जांच से सामने आया है कि शिकारी की मौत ब्लड इंफेक्शन से हुई थी।
दांतों की जांच से सामने आया है कि शिकारी की मौत ब्लड इंफेक्शन से हुई थी।

मौत के समय ब्लड में काफी संख्या में था बैक्टीरिया
खोपड़ी में मौजूद दांतों की जड़ जांची गई। इस जांच में एक बात सामने आई कि मौत के समय इनके ब्लड में यह बैक्टीरिया काफी मात्रा में था। इससे लगता है कि शिकारी की मौत ब्लड इंफेक्शन के कारण हुई थी। वैज्ञानिकों का कहना है, अभी इस बात की जांच की जा रही है कि वर्तमान में इस बैक्टीरिया से इंसानों को कितना खतरा हो सकता है।

यूरेसिया और उत्तरी अफ्रीका में बरपाया था कहर
वैज्ञानिकों के मुताबिक, 14वीं सदी में यर्सिनिया पेस्टिस ने यूरेसिया और उत्तरी अफ्रीका में कहर बरपाया था। बैक्टीरिया की जांच से यह भी साबित हुआ है कि यार्सिनिया पेस्टिस के पूर्वज उतने संक्रामक और जानलेवा नहीं थे जितना यह था। नियोलिथिक काल में पश्चिमी यूरोप से ऐसे बैक्टीरिया के कारण इंसानों की आबादी में भारी कमी आई थी।

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