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घटती आंखों की रोशनी को कंट्रोल करने की कोशिश:मोतियोबिंद को रोकेगा छोटा सा छर्रेनुमा इम्प्लांट, इसे आंखों में इंजेक्ट किया जाएगा और यह कैल्शियम घटाकर सर्जरी का रिस्क कम करेगा

13 दिन पहले
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मोतियाबिंद को रोकने के लिए वैज्ञानिकों ने एक नया छर्रेनुमा इम्प्लांट तैयार किया है। अगर मोतियाबिंद हो गया है तो यह इम्प्लांट उसे बढ़ने नहीं देता और बिना सर्जरी के इसका इलाज करने में मदद करता है।

यह इम्प्लांट आंखों में कैल्शियम का स्तर बढ़ने से रोकता है। यह किस हद तक असरदार है, इसकी जांच के लिए क्लीनिकल ट्रायल चल रहा है। जल्द ही ह्यूमन ट्रायल शुरू होगा।

वैज्ञानिकों का कहना है यह इम्प्लांट बड़ा बदलाव ला सकता है क्योंकि दुनियाभर के बुजुर्गोँ में मोतियाबिंद एक आम बीमारी बनती जा रही है। यूके में हर साल मोतियाबिंद के 3.50 लाख ऑपरेशन किए जाते हैं। 65 साल की उम्र के हर तीन में से एक इंसान की एक या दोनों आंखों में मोतियाबिंद होता है।

मोतियाबिंद कब, क्यों और कैसे होता है, पहले इसे समझें
आसान भाषा में समझें तो आंखों पर सफेद चकत्ते जैसे पैच बनने को हो मोतियाबिंद कहते हैं। ऐसा होने पर इंसान को सबकुछ धुंधला दिखाई देता है। मरीजों को चलने-फिरने में भी दिक्कत होती है, खासकर रात में। अगर समय पर इसका इलाज न हो तो मरीज को स्थायीतौर पर दिखना बंद हो सकता है।

यह बुजुर्गों में होने वाली बीमारी है। बढ़ती उम्र में अगर स्मोकिंग और अल्कोहल का सेवन करते हैं तो मोतियाबिंद का खतरा और ज्यादा बढ़ता है। यह बीमारी को बढ़ाने वाले रिस्क फैक्टर्स हैं।

अब इसकी वजह भी जान लीजिए
उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कुछ एंटीऑक्सीडेंट्स की कमी हो जाती है। नतीजा ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है जो लेंस से जुड़े टिश्यू को डैमेज करता है और आंखों के लेंस में कैल्शियम इकट्ठा होने लगता है। ऐसा होने पर सबकुछ धुंधला दिखने लगता है। इसके इलाज के तौर पर सर्जरी की जाती है, जो करीब 30 मिनट तक चलती है। सर्जरी के दौरान आंखों में छोटा सा चीरा लगाकर पुराने लेंस को हटाकर नया लेंस लगाया जाता है।

क्या है नया इम्प्लांट और कैसे काम करेगा
नए इम्प्लांट को अमेरिकी फार्मा कम्पनी नेक्युटी फार्मास्युटिकल्स ने तैयार किया। इम्प्लांट का नाम है NPI-002। कम्पनी का दावा है कि इस इम्प्लांट की मदद से काफी हद तक मरीजों की सर्जरी रोकी जा सकेगी।

कंपनी का कहना है, एंटीऑक्सीडेंट्स से भरे इस छर्रेनुमा इम्प्लांट को मरीज की आंख में इंजेक्ट किया जाता है। यह इम्प्लांट धीरे-धीरे एंटीऑक्सीडेंट्स (एन-एसिटिसिस्टीन एमाइड) को रिलीज करता है। यह केमिकल मोतियाबिंद के असर को कम करने का काम करता है।

दावा: गंभीर मोतियाबिंद को भी कंट्रोल करता है
अमेरिका की वाशिंगटन यूनिवर्सिटी ने जानवरों पर इस इम्प्लांट का प्रयोग किया है। रिसर्च रिपोर्ट में सामने आया कि यह गंभीर से गंभीर मोतियाबिंद के असर को घटाता है। इसकी मदद से आंखों में एंटीऑक्सीडेंट्स की मात्रा बढ़ती है और पहले के मुकाबले कैल्शियम की मात्रा 2.5 गुना तक कम हो जाती है।

65 या इससे अधिक उम्र के 30 मरीजों पर होगा ट्रायल
इस इम्प्लांट का क्लीनिकल ट्रायल चल रहा है। पहला ह्यूमन ट्रायल जल्द शुरू होगा। ट्रायल में 65 या इससे अधिक उम्र वाले 30 मरीजों को शामिल किया जाएगा।

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