पृथ्वी से मंगल तक 45 दिन में पहुंच सकेंगे:नासा की नई टेक्नोलॉजी का कमाल; अभी रॉकेट 7 महीने का वक्त लेता है

4 दिन पहले
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नई तकनीक के जरिए इंसान को मार्स पर भेजने की राह आसान हो जाएगी। - Dainik Bhaskar
नई तकनीक के जरिए इंसान को मार्स पर भेजने की राह आसान हो जाएगी।

दुनियाभर के कई देश दशकों से मंगल ग्रह पर इंसान को भेजने की तैयारी कर रहे हैं। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के मुताबिक पृथ्वी से मंगल तक का सफर 7 महीने का होता है। मार्स पर अब तक गए सभी रॉकेट्स को लगभग इतना ही वक्त लगा है। हालांकि, अब एक नई टेक्नोलॉजी की मदद से यह सफर मात्र 45 दिन का रह जाएगा।

इस नई टेक्नोलॉजी का नाम 'न्यूक्लियर थर्मल एंड न्यूक्लियर इलेक्ट्रिक प्रॉपल्शन' है। सरल भाषा में समझें तो नासा ह्यूमन मार्स मिशन के लिए एक ऐसा रॉकेट बनाने जा रहा है, जिसमें परमाणु ईंधन का इस्तेमाल किया जाएगा।

दो तकनीकों की मदद से बनेगा रॉकेट

वैज्ञानिकों ने रॉकेट के पहले फेज को विकसित करना शुरू कर दिया है। यह उसी रॉकेट का इलस्ट्रेशन है।
वैज्ञानिकों ने रॉकेट के पहले फेज को विकसित करना शुरू कर दिया है। यह उसी रॉकेट का इलस्ट्रेशन है।

रॉकेट बनाने के लिए दो तकनीकों का इस्तेमाल होगा। पहली- न्यूक्लियर थर्मल प्रॉपल्शन। इसमें न्यूक्लियर रिएक्टर होता है, जो लिक्विड हाइड्रोजन प्रॉपेलेंट को गर्म करता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ऐसा करने पर प्लाज्मा बनेगा। यह प्लाज्मा ही रॉकेट के नॉजल से निकाला जाएगा, जिससे रॉकेट को आगे बढ़ने के लिए तेज गति मिलेगी। 1955 में अमेरिकी एयरफोर्स और एटॉमिक एनर्जी कमीशन ने ऐसा प्रॉपल्शन सिस्टम बनाने की कोशिश की थी।

दूसरी तकनीक का नाम है न्यूक्लियर इलेक्ट्रिक प्रॉपल्शन। इसमें न्यूक्लियर रिएक्टर आयन इंजन को इलेक्ट्रिसिटी देता है, जिससे इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड बनती है। यह फील्ड जेनॉन जैसी गैसों को रफ्तार देती है, जिससे रॉकेट को आगे बढ़ने की गति मिलती है। इस सिस्टम को बनाने की कोशिश भी 2003 और 2005 में की जा चुकी है।

दोगुनी होगी रॉकेट की परफॉर्मेंस
नई टेक्नोलॉजी के जरिए वैज्ञानिक रॉकेट की परफॉर्मेंस को तकरीबन दोगुना कर सकेंगे। रॉकेट बनाने का यह कॉन्सेप्ट फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी में हाइपरसोनिक्स प्रोग्राम एरिया लीड प्रोफेसर रेयान गोसे ने दिया है। इसका पहला फेज डेवलप करने के लिए उनके साथ 13 और लोगों को रिसर्च में शामिल किया गया है। प्रोजेक्ट के लिए 12.5 हजार डॉलर यानी 10 लाख 18 हजार रुपए की शुरुआती रकम भी दे दी गई है।

इंसानों के लिए मार्स पर जाना होगा आसान

पुरानी तकनीक की मदद से मार्स मिशन 3 साल तक ही चल सकेगा।
पुरानी तकनीक की मदद से मार्स मिशन 3 साल तक ही चल सकेगा।

फिलहाल हम जिस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं, उसमें स्पेसक्राफ्ट को पृथ्वी से मंगल पर जाने के लिए 7 से 9 महीने का समय लगता है। एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि अगर हम इसी रफ्तार से इंसान को मार्स पर भेजेंगे, तो हर 26 महीने में एक फ्लाइट मंगल के लिए उड़ान भरेगी। साथ ही एक मिशन 3 साल तक ही चल सकेगा।

हालांकि नई तकनीक के जरिए मार्स पर जाने की राह आसान हो जाएगी। पृथ्वी से मंगल तक का सफर सिर्फ 6.5 हफ्ते का होगा, जिससे मिशन की लागत में कमी आएगी और वक्त में इजाफा होगा। स्पेस की माइक्रोग्रैविटी में लोगों को सेहत से जुड़ी परेशानियां होने का खतरा भी कम होगा। नासा का यह रॉकेट बनकर कब तैयार होगा, फिलहाल इसके बारे में जानकारी नहीं दी गई है।

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नासा एडमिनिस्ट्रेटर बिल नेल्सन सस्टेनेबल फ्लाइट डेमॉन्स्ट्रेटर प्रोजेक्ट का मॉडल दिखाते हुए।
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