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कैंसर डे पर उम्मीदभरी खबर:4 बार कैंसर को मात देने वाले 67 साल के परिमल गांधी की कहानी, बोले; डर को नहीं अपनी उम्मीदों को बढ़ाएं

अहमदाबादएक वर्ष पहलेलेखक: अंकित गुप्ता
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कैंसर का नाम सुनते ही मरीज जीने की उम्मीद छोड़ने लगता है, लेकिन डटकर मुकाबला करें तो इसे हरा सकते हैं। 67 साल से परिमल गांधी इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। परिमल अब तक 4 बार कैंसर को मात दे चुके हैं।

उन्हें पहली बार कैंसर का पता 1984 में चला। बीमारी से लड़ने के लिए उन्होंने खुद को तो संभाल लिया लेकिन परिवार में मातम सा छा गया। बीमारी से लड़ते हुए परिवार को भी संभाला। 37 साल के सफर में सिर्फ कैंसर ही नहीं कई बीमारियों का सामना किया। आज वो कैंसर के मरीजों को मोटिवेट करने का काम भी कर रहे हैं।

आज वर्ल्ड कैंसर डे है, इस मौके पर परिमल गांधी की जुबानी जानिए उनकी कहानी, जो उन्होंने भास्कर से साझा की....

कैंसर से पहले परेशान आंखों की कम हो रही रोशनी का सामना किया
मेरा जन्म 1953 में अहमदाबाद में हुआ। बचपन से ही सिंगिंग और प्यानो बजाने का शौक था। बीमारी से पहला वास्ता 21 साल की उम्र में हुआ। पता चला कि मैं बाइलेटरल कॉर्नियल डिस्ट्रॉफी से जूझ रहा हूं। यह ऐसी दुर्लभ बीमारी है जब आंखों में स्पॉट जैसा आ जाता है और धीरे-धीरे दिखना कम हो जाता है।

यहां बात सिर्फ बीमारी की नहीं थी, मेरा सपना भी टूटा था क्योंकि मैं बचपन से पायलट बनना चाहता था। केमिकल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन कर रहा था लेकिन बढ़ती बीमारी के कारण उसे बीच में छोड़कर इंग्लिश लिट्रेचर से पढ़ाई पूरी की और गोल्ड मेडल भी जीता।

पहला कॉर्नियल ट्रांसप्लांट फेल हुआ लेकिन उम्मीद नहीं छोड़ी
1984 में पहली बार ब्लड कैंसर का पता चला। इसी दौरान आंखों के इलाज के लिए पहला कॉर्नियल ट्रांसप्लांट भी किया गया, लेकिन यह सफल नहीं रहा। अहमदाबाद में एक कॉन्फ्रेंस के दौरान मेरी मुलाकात आंखों के एक डॉक्टर से हुई, जिन्हें मैंने अपनी पूरी समस्या बताई। उन्होंने मुझे इलाज के लिए अमेरिका आने को कहा। पैसों की तंगी थी। इसमें मेरी मदद रोटरी इंटरनेशनल नाम के संगठन ने की।

संगठन ने मुझे अमेरिका भेजने के लिए एक फंड बनाया और नाम रखा 'परिमल गांधी फंड'। दो दिन में करीब 6 लाख रुपए इकट्ठा हुए और ट्रीटमेंट के लिए अमेरिका पहुंचा। वहां डॉ. जॉन अल्फा और डॉ. महेंद्र पटेल ने ट्रांसप्लांट की फीस नहीं चार्ज और उन पैसों का इस्तेमाल कैंसर के इलाज में किया।

2018 में कैंसर का तीसरी झटका और 2010 में बायपास सर्जरी
ट्रीटमेंट के बाद भी कैंसर बार-बार हुआ। 1984, 1994 और 2004 में ब्लड कैंसर हुआ। जिससे मैं लड़ा और हराया। 2018 में ब्लैडर का कैंसर हुआ। इलाज चल रहा है। अब इसका असर काफी हद तक कम हो गया है।

बीमारी को खुद पर हावी होने से रोकना है तो उससे लगातार लड़ना जरूरी है। 2010 में कार्डियक बायपास सर्जरी हुई। वर्तमान में डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से भी जूझ रहा है। मैं दिन में 4 बार इंसुलिन के इंजेक्शन और तीन बार 11 अलग-अलग तरह की दवाएं ले रहा हूं। आंखों में अभी भी आईड्रॉप का इस्तेमाल कर रहा हूं।

कैंसर के अनुभव को परिमल ने अपनी ऑटोबायोग्राफी 'कैन सरमाउंट' में साझा किया है।
कैंसर के अनुभव को परिमल ने अपनी ऑटोबायोग्राफी 'कैन सरमाउंट' में साझा किया है।

बीमारी के डर पर हावी सेंस ऑफ ह्यूमर
मैं मानता हूं मेरा सेंस ऑफ ह्यूमर ही मुझे बीमारियों से लड़ने की ताकत देता है। बीमारियों के नाम से मैं कभी नहीं घबराया और जैसा डॉक्टर्स ने कहा वैसा ही किया। कभी रुका नहीं। कैंसर बीमारी जरूर है लेकिन यह आपको जीवन रोक नहीं सकती। अपने इसी अनुभव को मैंने अपनी बायोग्राफी 'कैन सरमाउंट' में बयां किया है, ताकि लोग बीमारी का नाम सुनकर डरें नहीं, उसको मात दें।