राजू श्रीवास्तव के शव की वर्चुअल ऑटोप्सी हुई:बिना चीर-फाड़ के हुआ पोस्टमार्टम, जानिए कैसे काम करती है नई तकनीक

नई दिल्ली6 दिन पहले
  • कॉपी लिंक

मशहूर कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव गुरुवार को पंचतत्व में विलीन हो गए। 58 साल की उम्र में बुधवार को उनका निधन हो गया। उन्हें मौत से 42 दिन पहले हार्ट अटैक आया था, जिसके बाद से ही वे दिल्ली के एम्स में भर्ती थे। अस्पताल के फोरेंसिक विभाग के प्रमुख डॉ. सुधीर गुप्ता ने बताया कि राजू के शव का पोस्टमार्टम 'वर्चुअल ऑटोप्सी' तकनीक से किया गया। यह प्रक्रिया नॉर्मल पोस्टमार्टम से काफी अलग है। आइए इसके बारे में जानते हैं…

क्या है वर्चुअल ऑटोप्सी?
वर्चुअल ऑटोप्सी को वर्चुअल पोस्टमार्टम या वर्टोप्सी भी कहा जाता है। इसमें शव की पूरी जांच मशीन की मदद से की जाती है। इस प्रोसेस में नॉर्मल पोस्टमार्टम की तरह कोई चीर-फाड़ नहीं होती है। फोरेंसिक डॉक्टर्स हाई टेक डिजिटल एक्सरे और एमआरआई मशीन का इस्तेमाल करते हैं। इससे धार्मिक भावनाएं आहत होने का खतरा भी नहीं होता और मौत की वजह को लेकर ज्यादा अच्छा अंदाजा मिल जाता है।

डॉ. गुप्ता ने बताया कि वर्चुअल ऑटोप्सी से पोस्टमार्टम करने में कम समय लगता है, जिससे शव को अंतिम संस्कार के लिए जल्दी भेजा जा सकता है। राजू के केस में वर्चुअल पोस्टमार्टम इसलिए किया गया क्योंकि जब उन्हें शुरुआत में एम्स लाया गया था, तब वे होश में नहीं थे। वे ट्रेडमिल पर दौड़ते हुए गिरे या नहीं, यह बात साफ नहीं हो पा रही थी। ऐसी दुविधा में पुलिस शख्स की मौत के बाद पोस्टमार्टम कराने का फैसला लेती है।

वर्चुअल ऑटोप्सी में पार्थिव शरीर को बिना छुए ही पूरी बॉडी स्कैन होती है।
वर्चुअल ऑटोप्सी में पार्थिव शरीर को बिना छुए ही पूरी बॉडी स्कैन होती है।

तकनीक कैसे काम करती है?
डॉ. गुप्ता का कहना है कि वर्चुअल ऑटोप्सी एक रेडियोलॉजिकल परीक्षण है। इसमें उन फ्रैक्चर, खून के थक्के और चोटों का भी पता चल जाता है, जिन्हें आंखों से नहीं देख सकते। इस प्रोसेस की मदद से ब्लीडिंग के साथ-साथ हड्डियों में हेयरलाइन या चिप फ्रैक्चर जैसे छोटे फ्रैक्चर का भी आसानी से पता चल जाता है। इन्हें एक्सरे के रूप में रखा जा सकता है, जो आगे जाकर कानूनी सबूत बन सकते हैं।

देश में कब शुरू हुई वर्चुअल ऑटोप्सी?
भारत में वर्चुअल ऑटोप्सी 2020 में शुरू हुई। 2019 में राज्य सभा में तब के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने कहा था- व्यक्ति की मौत के बाद परिवार के कई लोग नॉर्मल पोस्टमार्टम कराने से हिचकिचाते हैं। वर्चुअल ऑटोप्सी समय और पैसे दोनों की ही बचत करती है। जहां नॉर्मल पोस्टमार्टम में 2.5 घंटे का वक्त लगता है, वहीं वर्चुअल पोस्टमार्टम 30 मिनट में हो जाता है।

एम्स को इस प्रोजेक्ट के लिए 5 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे। एम्स में हर साल 3 हजार पोस्टमार्टम होते हैं। केस की जटिलता के आधार पर प्रोसेस में 3 दिन का समय भी लग जाता है। दक्षिण-पूर्वी एशिया में एम्स दिल्ली ही वर्चुअल ऑटोप्सी करने वाला एक मात्र अस्पताल है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और स्विट्जरलैंड जैसे देश पहले से ही इस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं।