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साइंस ऑफ स्मेल:रिसर्च में दावा- कुत्तों की तरह इंसान भी एक दूसरे को सूंघते हैं, समान गंध वालों से दोस्ती बेहतर होती है

3 महीने पहले
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रिसर्च के नतीजे बताते हैं कि जानवरों के साथ-साथ इंसानों के लिए भी गंध महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।  - Dainik Bhaskar
रिसर्च के नतीजे बताते हैं कि जानवरों के साथ-साथ इंसानों के लिए भी गंध महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। 

जिस तरह कुत्ते सूंघकर ही अपने दोस्त या दुश्मन को पहचान लेते हैं, उसी तरह इंसान भी लोगों की गंध सूंघकर उन्हें अपना दोस्त बनाते हैं। यह दावा इजराइल के वीजमन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के वैज्ञानिकों ने किया है। रिसर्चर्स का कहना है कि हमें जिन लोगों की गंध अपनी गंध जैसी लगती है, हमारी उनसे दोस्ती दूसरों के मुकाबले बेहतर होती है।

वैज्ञानिकों ने बनाई इलेक्ट्रॉनिक नोज

वैज्ञानिकों ने दो अंजानों के बीच के सोशल इंटरैक्शन की क्वालिटी को समझने के लिए इलेक्ट्रॉनिक नोज या eNose को विकसित की। इसकी मदद से पहले दोनों को सूंघा गया और गंध की पहचान की गई। रिसर्च के नतीजे बताते हैं कि जानवरों के साथ-साथ इंसानों के लिए भी गंध महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इंसान बिना सोचे ही गंध सूंघते रहते हैं

एक कुत्ते को जब यह समझ नहीं आता कि दूसरे कुत्ते से दोस्ती करनी चाहिए या नहीं, तब वह उसे ठीक से सूंघता है। इसके बाद ही वह यह फैसला लेता है कि दूसरे कुत्ते से दोस्ती करनी है या उससे लड़ना है। सूंघने की यह प्रक्रिया इंसानों के अलावा सभी स्तनधारियों में रिकॉर्ड की गई है।

रिसर्च में शामिल इनबाल रावरेबी का कहना है कि इंसान लगातार अपने आसपास लोगों को सूंघते रहते हैं, इस बात से वे खुद अंजान होते हैं। इसके साथ ही वे खुद की गंध भी सूंघते रहते हैं। शायद यही वजह है कि उन्हें जब सामने वाले की गंध अपनी तरह लगती है, तब उससे दोस्ती बेहतर होती है। अब तक हमें यही पता था कि लोग किसी के रूप, बैकग्राउंड, मूल्यों और होशियारी देखकर उससे दोस्ती करते हैं।

ऐसे हुई रिसर्च

रावरेबी ने अपने इस हाइपोथेसिस को प्रूफ करने के लिए एक ही सेक्स के कुछ दोस्तों को इकट्ठा किया। ये अपनी फ्रेंडशिप की शुरुआत में बहुत जल्दी दोस्त बन गए थे। इसके बाद इनके शरीर की गंध के सैंपल्स लिए गए। जांच में पता चला कि दोनों ही दोस्तों की गंध एक दूसरे से काफी मिलती-जुलती थीं।

एक और एक्सपेरिमेंट में रावरेबी ने एक दूसरे से अंजान लोगों की गंध के सैंपल्स को eNose की मदद से इकट्ठा किया। इसके बाद प्रतिभागियों को दोस्ती करने का मौका दिया गया। जांच में पता चला कि जिन लोगों की बहुत्ब आसानी से दोस्ती हो गई उनकी गंध भी एक दूसरे की तरह ही थी।

रिसर्चर्स का कहना है कि यह रिसर्च बताती है कि सामाजिक फैसले लेने में हमारी नाक एक अहम भूमिका निभाती है। सोशल केमिस्ट्री बनाने में भी केमिस्ट्री होती है।

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