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समुद्र तक जलवायु परिवर्तन का असर:40 फीसदी तक शार्क और रे मछली विलुप्ति की कगार पर, वजह; जलवायु परिवर्तन और मछलियों का अधिक शिकार, 8 साल में खतरा दोगुना हुआ

19 दिन पहले
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दुनिया में मौजूद 40 फीसदी तक शार्क और रे मछलियां विलुप्ति की कगार पर हैं। इसकी वजह है जलवायु परिवर्तन, जरूरत से ज्यादा मछलियों का शिकार। मछलियों पर 8 साल तक हुई रिसर्च में सामने आया है कि 2014 के इनकी विलुप्ति का खतरा 24 फीसदी था जो अब बढ़कर दोगुना हो गया है।

शोधकर्ताओं का कहना है, जलवायु परिवर्तन ऐसे मछलियों के लिए समस्या बढ़ा रहा है। इससे न सिर्फ उनके मनमुताबिक आवास के लिए माहौल में कमी आने के साथ समुद्र का तापमान में भी बढ़ोतरी हो रही है। यह दावा अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की रिसर्च रिपोर्ट में किया गया है।

रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 में जो 1041 में से 181 मछलियों के विलुप्त होने का खतरा था वो अब बढ़कर 391 हो गया है। इनकी घटती संख्या की एक वजह प्रदूषण भी है। प्रदूषण शार्क और रे जैसी मछलियों के लिए तनाव बढ़ाने का काम करता है। जो 6.9 फीसदी तक ऐसी मछलियों पर बुरा असर डाल रहा है।

यहां मछलियों के लिए खतरा अधिक
शोधकर्ताओं का कहना है, जलवायु का तापमान बढ़ने से मछलियों की इन प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा ज्यादा बढ़ता है। खासतौर पर उत्तर और पश्चिमी-मध्य भारत के समुद्र और उत्तर-पश्चिम प्रशांत महासागर में। इन क्षेत्रों में दुनियाभर की तीन चौथाई प्रजातियां पाई जाती हैं, जो खतरे में हैं।

85 सालों से मछलियों की 3 प्रजातियां नहीं दिखीं

पिछले 85 सालों से मछलियों की तीन प्रजातियां ऐसी भी हैं जो देखी ही नहीं गईं। इनमें लॉस्ट शार्क, जावा स्टिंगारी और रेड सी टॉरपीडो शामिल हैं। 1868 से जावा स्टिंगारी, 1898 से रेड सी टॉरपीडो और 1934 से लॉस्ट शार्क नहीं दिखीं।

शोधकर्ता निकोलस डुल्वी का कहना है, इन मछलियों के बाद अगला खतरा उभयचर जानवरों को हैं। जिस तरह से दुनियाभर में मछलियों के लिए खतरा बढ़ रहा है उसका असर दुनिया के कई देशों के समुद्र पर पड़ेगा। समुद्र का पूरा इकोसिस्टम प्रभावित होगा।

समय से पहले जन्म ले रहे मछलियों के बच्चे और इनमें कमजोरी भी
जलवायु परिवर्तन और मछलियों पर एक और रिसर्च ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने की है। नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट जर्नल में छपी रिसर्च कहती है, जैसे-जैसे समुद्र का तापमान बढ़ रहा है उसका असर यहां रहने वाले जीवों पर पड़ रहा है। इस बदलाव के कारण शार्क मछलियों के बच्चे समय से पहले ही जन्म ले रहे हैं साथ ही उनमें पोषण की कमी भी दर्ज की गई है। नतीजा, उनका जिन्दा रहना और मुश्किल होता जा रहा है। इसका असर उनके आकार पर भी पड़ रहा है जो पहले से घट गया है।

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