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नई टेस्ट किट:ICMR ने विकसित की सिलीकोसिस का पता लगाने वाली किट, जानिए क्या है यह जानलेवा बीमारी जो मरीज का सांस लेना मुश्किल कर देती है

11 दिन पहले
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इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने फेफड़ों से जुड़ी बीमारी सिलिकोसिस का पता लगाने के लिए नई टेस्ट किट विकसित की है। टेस्ट किट की मदद से इस बीमारी को गंभीर होने से पहले पता लगाया जा सकेगा। सिलिकोसिस का समय से पता लगाना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि एक बार हालत बिगड़ने पर मरीज को पहले की तरह स्वस्थ कर पाना मुश्किल हो जाता है।

सिलिकोसिस क्या है, यह कैसे इंसानों को जकड़ता है, इसे कैसे पहचानें और इसके रिस्क फैक्टर क्या हैं...जानिए इन सवालों के जवाब...

सिलिकोसिस क्या है?
सिलिकोसिस फेफड़ों से जुड़ी बीमारी है। बालू, मिट्‌टी और धूल में सिलिका नाम का एक मिनिरल पाया जाता है। इसके इर्द-गिर्द रहने वाले या ऐसे माहौल में काम करने वाले मजदूरों में सिलिका के कण सांसों के जरिए फेफड़ों तक पहुंचते हैं। धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ती रहती है और फेफड़े डैमेज होते रहते हैं। एक समय के बाद सिलिका के कण फेफड़ों को इतना डैमेज कर देते हैं कि मरीज के लिए सांस लेना मुश्किल हो जाता है। इसे सिलिकोसिस की सबसे गंभीर स्टेज कहा जाता है। आम भाषा में समझें तो फेफड़े ठीक से काम करना ही बंद कर देते हैं।

सिलिकोसिस दूसरी कई बीमारियों का खतरा बढ़ाती है। इनमें टीबी, लंग कैंसर और क्रॉनिक ब्रॉन्काइटिस शामिल हैं।

इस बीमारी का पता कैसे लगाएं
इस बीमारी का पता लगाने के लिए कोई खास जांच नहीं है। डॉक्टर्स लक्षणों के आधार पर इसका पता लगाते हैं। जैसे- आराम करने या चलने-फिरने पर सांस लेने पर कैसा महसूस होता है, पूछते हैं। जॉब से जुड़ी जानकारी लेते हैं। मरीजों में किसी खास तरह के बदलाव या लक्षणों को देखा जाता है। पिछले मेडिकल रिकॉर्ड की जानकारी ली जाती है। इसके अलावा खतरा होने पर विशेषज्ञ कुछ जांचें कराने की सलाह देते हैं। ये जांच मरीज के फेफड़ों की हालत के बारे में बताती हैं।

अब बात, सिलिकोसिस के इलाज की

इस बीमारी का कोई सटीक इलाज नहीं है। एक बार फिर बीमारी होने पर मरीज को पहले की तरह स्वस्थ नहीं किया जा सकता। इलाज के जरिए सिर्फ बीमारी बढ़ने की रफ्तार को धीमा किया जा सकता है। धूम्रपान से दूर रहने की सलाह दी जाती है। इलाज के तौर पर ब्रॉन्कोडायलेटर की मदद से सांस की नलियों को राहत दी जाती है और सूजन को कम करने की कोशिश की जाती है। कई बार मरीज को ऑक्सीजन भी देते हैं।

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