बैक्टीरिया को मारेगा बैक्टीरिया:हॉस्पिटल्स में खतरनाक संक्रमण फैलाने वाले सुपरबग को खास तरह के बैैक्टीरिया से खत्म करने की कोशिश, शुरू होगा ह्यूमन ट्रायल

12 दिन पहले
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हॉस्पिटल्स में ऐसे सुपरबग्स पाए जाते हैं जिन पर एंटीबायोटिक्स दवाएं बेअसर साबित होती हैं। इन सुपरबग्स बैक्टीरिया से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने नया तरीका निकाला है। वैज्ञानिकों ने खास तरह के बैक्टीरिया तैयार किए हैं जो इनसे लड़ने का काम करेंगे। इन्हें इंजीनियर्ड बैक्टीरिया का नाम दिया गया है।

वैज्ञानिकों का कहना है, स्टेफायलोकोकस ऑरेयस नाम का सुपरबग कैथेटर और ब्रीथिंग ट्यूब के जरिए मरीजों के शरीर में पहुंचता है। इन पर दवाएं असर न होने के कारण मरीजों की हालत बिगड़ती है। मरीजों में ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए इंजीनियर्ड बैक्टीरिया इसे रोकने का काम करेंगे।

यह रिसर्च बार्सिलोना का संस्थान सेंटर फॉर जीनोमिक रेग्युलर कर रहा है। शोधकर्ता लुइस सेरानो कहते हैं, इंजीनियर्ड बैक्टीरिया खास तरह का प्रोटीन के जरिए सुपरबग को मात दे सकता है।

पहले जानिए, दवाएं बेअसर साबित क्यों हो रही हैं?
जब बैक्टीरिया से होने वाले इंफेक्शन के बाद मरीज जरूरत से ज्यादा एंटीबायोटिक्स दवाएं लेता है तो इनमें खास तरह की रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है। ऐसा होने पर दवाएं इन पर बेअसर साबित होने लगती हैं। इसे एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (AMR) कहते हैं। अगर दवा के डोज का असर न हो तो डॉक्टर से मिलें। ये बताता है कि बैक्टीरिया ने दवा के खिलाफ अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है।

अब जानिए, वैज्ञानिक कैसे सुपरबग को खत्म करेंगे
सुपरबग को खत्म करने के लिए वैज्ञानिकों ने पहले चूहे पर प्रयोग किया। इंजीनियर्ड बैक्टीरिया ने चूहे में लगी कैथेटर पर मौजूद स्टेफायलोकोकस ऑरेयस नाम के सुपरबग को खत्म कर दिया। अब यही प्रयोग इंसानों पर किया जाना है। वैज्ञानिकों का कहना है, 2023 तक इसका ह्यूमन ट्रायल शुरू होगा। इसमें खासतौर पर फेफड़ों के संक्रमण से जूझ रहे मरीज शामिल होंगे।

रिसर्च के मुताबिक, सुपरबग अपने आसपास ऐसी बायोफिल्म्स विकसित कर लेते हैं, जो एंटीबायोटिक्स नहीं तोड़ पातीं। इसलिए इन सुपरबग्स पर दवाओं का असर नहीं होता। इंजीनियर्ड बैक्टीरिया खास तरह के एंजाइम्स की मदद से इसी बायोफिल्म को तोड़ने का काम करते हैं।

अगर एंटीबायोटिक्स ने काम करना बंद कर दिया तो क्या होगा?
एक्सपर्ट कहते हैं, भविष्य में अगर एंटीबायोटिक्स ने काम करना बंद कर दिया तो संक्रमित मरीजों की मौतों में इजाफा होगा। खासतौर पर हिप रिप्लेसमेंट और सी-सेक्शन कराने वाले मरीजों में मौत का खतरा बढ़ेगा। यूके की फर्म एंटीबायोटिक्स रिसर्च के प्रोफेसर कोलीन गार्नर का कहना है, बायोफिल्म संक्रमण मरीजों में सेप्सिस जैसी बीमारी की वजह बन सकता है और जान का जोखिम बढ़ता है।

एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस से हर साल दुनिया में सात लाख मौतें
विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस से दुनियाभर में हर साल 7 लाख लोगों की मौत होती है। एंटीबायोटिक दवाओं के गलत इस्तेमाल के कारण वैज्ञानिक और डॉक्टर इसलिए चिंतित हैं क्योंकि पिछले तीन दशकों से नई एंटीबायोटिक दवाएं खोजी नहीं जा सकी हैं।

धीरे-धीरे बैक्टीरिया पर दवाओं का असर कम हो रहा है। अगर यही हाल रहा तो छोटी-छोटी बीमारियां भी आने वाले समय में इंसानों के लिए जानलेवा साबित होंगी।

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