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टीबी का हार्ट कनेक्शन:क्या होती है ट्यूबरकुलर पेरिकार्डाइटिस की बीमारी? ये हमारे लिए कितनी खतरनाक? जानिए इसके बारे में सबकुछ

9 दिन पहले
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केस - 1

45 वर्ष के संजय (परिवर्तित नाम) को पिछले कुछ दिनों से सांस में तकलीफ हो रही थी। एक दिन अचानक तकलीफ काफी बढ़ गई तो हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। यहां जांच करने पर पता चला की उसके हार्ट का आकार काफी बढ़ गया है। हार्ट में काफी मात्रा में पानी भर गया। साथ ही हार्ट की दीवारों में भी सूजन आ गई थी। उसे तुरंत कैथ लैब ले जाकर उसका पानी निकाला गया तब जाकर राहत महसूस हुई। बाद में जांच में पता चला की उसे टीबी थी।

केस - 2

सतना की मंजूबाला (परिवर्तित नाम) को 2 महीने पहले खांसी और बुखार की शिकायत थी। जांच कराने पर टीबी की बीमारी का पता चला। इलाज बीच में ही बंद कर देने के कुछ दिनों बाद उसकी छाती में तेज दर्द की शिकायत हुई साथ ही धड़कनें भी तेज हो गई। भर्ती करने पर पता लगा की उसे हार्ट की झिल्ली (मेम्ब्रेन) की टीबी हो गई, साथ ही हार्ट के चारों ओर पानी भी भर गया था।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2030 में विश्व को टीबी से मुक्त करने का लक्ष्य रखा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2030 में विश्व को टीबी से मुक्त करने का लक्ष्य रखा है।

एक अनुमान के मुताबिक विश्व के कुल 26% टीबी के केस यानी टीबी का हर चौथा मरीज भारतीय है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2030 में विश्व को टीबी से मुक्त करने का लक्ष्य रखा है और भारत सरकार ने भारत में टीबी मुक्ति का लक्ष्य 2025 का रखा था, लेकिन कोरोना के बाद स्थिति में बदलाव हुआ। 2019 में कुल 90,000 लोगों की मृत्यु टीबी के कारण हमारे देश में हुई थी। जहां टीबी मुख्यत: फेफड़ों को प्रभावित करती है, वहीं शरीर के कुछ और अंगों पर भी इसका दुष्प्रभाव देखने को मिलता है, जिसे एक्स्ट्रा पल्म्युनरी टीबी के रूप में जाना जाता है।

हार्ट को कैसे प्रभावित करती है टीबी?

हार्ट का टीबी पर असर अक्सर ट्यूबरकुलर पेरिकार्डाइटिस के रूप में देखने को मिलता है। हार्ट की बनावट में तीन परत होती हैं- एंडोकार्डियम,मायोकार्डियम और जो सबसे बाहर की परत या झिल्ली जिससे हार्ट चारों ओर से ढका हुआ रहता है, उसे पेरिकार्डियम कहते हैं। ट्यूबरकुलर पेरिकार्डाइटिस में अक्सर झिल्ली में सूजन आ जाती है, जो थोड़ी कठोर एवं मोटी हो जाती है, जिससे हार्ट के फैलने-सिकुड़ने में रुकावट आती है। हार्ट पर एक किस्म का दबाव पड़ने लगता है। साथ ही, हार्ट के इस झिल्ली के चारों ओर अधिक मात्रा में तरल पदार्थ जमा हो जाता है, जिसे पेरिकार्डियल इफूसन कहते हैं। शुरुआत में ये तरल काफी पतला पानी के समान होता है, जो कि धीरे-धीरे गाढ़ा हो जाता है और इसमें जाले भी पड़ने लगते हैं। अक्सर देखा जाता है कि जिन लोगों की इम्यूनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) कम होती है, उनमें इस बीमारी के होने की आशंका काफी ज्यादा रहती है।

जिन लोगों की इम्यूनिटी कम होती है, उनमें ट्यूबरकुलर पेरिकार्डाइटिस होने की आशंका काफी ज्यादा रहती है।
जिन लोगों की इम्यूनिटी कम होती है, उनमें ट्यूबरकुलर पेरिकार्डाइटिस होने की आशंका काफी ज्यादा रहती है।

ट्यूबरकुलर पेरिकार्डाइटिस के लक्षण

अक्सर ट्यूबरकुलर पेरिकार्डाइटिस की शुरुआत बुखार से होती है। लगभग 75 फीसदी मामलों में सबसे पहले शाम के समय तेज होने वाला बुखार आता है, साथ ही मरीज को काफी ज्यादा पसीना भी आता हैं। ये लक्षण फेफड़ों की टीबी में भी नजर आ सकते हैं, लेकिन उसके बाद छाती में दर्द, भारीपन, सांस लेने में दिक्कत, खांसी आना, पैरों में सूजन, ये कुछ लक्षण हैं जो ट्यूबरकुलर पेरिकार्डिटिस में अक्सर देखे जाते हैं।

छाती में दर्द, सांस लेने में दिक्कत, खांसी आना, ये कुछ लक्षण हैं जो ट्यूबरकुलर पेरिकार्डिटिस में अक्सर देखे जाते हैं।
छाती में दर्द, सांस लेने में दिक्कत, खांसी आना, ये कुछ लक्षण हैं जो ट्यूबरकुलर पेरिकार्डिटिस में अक्सर देखे जाते हैं।

कैसे होती है ट्यूबरकुलर पेरिकार्डाइटिस की पहचान?

अक्सर इसकी पहचान टीबी के अन्य लक्षणों जैसे अक्सर शाम को बुखार आना, भूख कम हो जाना, वजन कम होना, जैसे लक्षणों से होती है। फेफड़ों की टीबी के दौरान कई बार ट्यूबरकुलर पेरिकार्डाइटिस भी हो सकती है। कई बार केवल ट्यूबरकुलर पेरिकार्डाइटिस ही होती है। इसकी पहचान के लिए छाती के एक्स-रे की जांच सबसे महत्वपूर्ण जांच होती है। इसमें अगर हार्ट का साइज बढ़ा हुआ लगे या हार्ट के चारों तरफ कुछ तरल पदार्थ जमा हुआ दिखे, तो ट्यूबरकुलर पेरिकार्डाइटिस हो सकता है। इसके बाद हार्ट की इकोकार्डियोग्राफी की जांच में पता लगाया जाता है कि क्या हार्ट की पेरिकार्डियम खुरदुरी और मोटी हो चुकी है, पेरिकार्डियम के चारों तरफ तरल पदार्थ जमा हुआ है वो कितनी मात्रा में है, क्या उससे हार्ट पर दबाव काफी ज्यादा है। इनके अलावा टीबी के अन्य टेस्ट जैसे बलगम की जांच, हार्ट के चारों ओर जमे तरल की जांच, ब्लड टेस्ट जैसे ADA, PCR आदि भी किए जाते हैं।

ट्यूबरकुलर पेरिकार्डिटिस की पहचान टीबी के लक्षणों जैसे अक्सर शाम को बुखार आना, भूख कम हो जाना, वजन कम होना से होती है।
ट्यूबरकुलर पेरिकार्डिटिस की पहचान टीबी के लक्षणों जैसे अक्सर शाम को बुखार आना, भूख कम हो जाना, वजन कम होना से होती है।

यह हो सकती हैं जटिलताएं

अक्सर देखा गया है की समय रहते डायग्नोसिस के अभाव में मरीज लंबे समय तक ट्यूबरकुलर पेरिकार्डाइटिस से पीड़ित रहता है। जब तक इसका पता चलता है, तब तक हार्ट की पेरिकार्डियम यानी सबसे बाहरी झिल्ली काफी मोटी एवं कठोर हो चुकी होती है, जिससे हार्ट की संकुचन क्षमता पर बुरा असर होता है। इसे कंस्ट्रिक्टिव पेरिकार्डिटिस कहते हैं।

निश्चित मात्रा से ज्यादा तरल जमा होने से हार्ट के दाएं तरफ के चैंबर्स पर दबाव काफी ज्यादा बढ़ा जाता है। इस अवस्था को कार्डियक टैंपोनाड कहते हैं। ये एक गंभीर स्थिति है जिसमें अगर समय रहते इस दबाव को कम न किया जाए, तो मरीज की जान भी जा सकती है।

अक्सर देखा गया है की समय रहते डायग्नोसिस के अभाव में मरीज लंबे समय तक ट्यूबरकुलर पेरिकार्डाइटिस से पीड़ित रहता है।
अक्सर देखा गया है की समय रहते डायग्नोसिस के अभाव में मरीज लंबे समय तक ट्यूबरकुलर पेरिकार्डाइटिस से पीड़ित रहता है।

कैसे होता है इस बीमारी का उपचार?

अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी के फेलो एवं कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. हेमंत चतुर्वेदी कहते हैं कि ट्यूबरकुलर पेरिकार्डाइटिस एक ऐसी बीमारी है जिसमें हार्ट पर दबाव पड़ता है एवं इसकी संकुचन की क्षमता प्रभावित होती है। इसलिए जांच में इसकी पहचान करने के तुरंत बाद ही इलाज शुरू कर देना चाहिए। मुख्य इलाज मुख्य बीमारी यानी की टीबी का किया जाता है। रिवाइज्ड नेशनल टीबी प्रोग्राम के तहत, मरीज जिस श्रेणी में आता है उसके अनुसार एंटी ट्यूबरकुलर दवाएं तय मात्रा एवं तय समय तक दी जाती हैं।

ट्यूबरक्युलोसिस से शरीर में कमजोरी आती है इसलिए हमें ऐसे आहार पर फोकस करना चाहिए जो आसानी से पच सके।
ट्यूबरक्युलोसिस से शरीर में कमजोरी आती है इसलिए हमें ऐसे आहार पर फोकस करना चाहिए जो आसानी से पच सके।

अगर हार्ट की पेरिकार्डियम के चारों तरफ जमा हुआ तरल पदार्थ काफी अधिक मात्रा में है, जिससे हार्ट के फंक्शन प्रभावित हो रहे हों, तो सबसे पहले उस तरल पदार्थ को फ्लोरो इमेजिंग की सहायता से बाहर निकाला जाता है। इसे पेरिकार्डियो सेंटेंसिस कहते हैं। ऐसा करके मरीज की जान बचने की संभावना रहती है। इसके अलावा कंस्ट्रिक्टिव पेरिकार्डिटिस की स्थिति में कार्डियक सर्जरी के माध्यम से पेरिकार्डियम यानी सबसे बाहरी झिल्ली जो कठोर खुरदुरी हो जाती है, उसकी स्ट्रिपिंग यानी परत उतारी जाती है, जिससे हार्ट की संकुचन क्षमता वापस से बहाल की जा सके। इसलिए ये काफी जरूरी है कि इस बीमारी को जल्दी पहचाना जाए, जिससे तुरंत एंटी ट्यूबरकुलर दवा चालू करके कॉम्प्लिकेशंस से बच सकें।

अपोलो हॉस्पिटल नई दिल्ली की चीफ न्यूट्रिशनिस्ट डॉ. प्रियंका रोहतगी बताती हैं कि ट्यूबरक्युलोसिस की वजह से लंबे समय तक बुखार रहता है, शरीर में बहुत ज्यादा कमजोरी आ जाती है। इसलिए हमें इस समय ऐसे आहार पर फोकस करना चाहिए जो आसानी से पच सके। ज्यादा कैलोरी, प्रोटीन युक्त आहार जैसे दालें, बी कॉम्प्लेक्स युक्त आहार जैसे पालक एवं अन्य हरी पत्तेदार सब्जियां, मसूर, विटामिन ए, सी युक्त मौसमी फल अमरूद, संतरा सेब, आलू बुखारा आदि खाना चाहिए। इससे इम्यूनिटी अच्छी रहती है। प्रोसेस्ड और पैकेज फूड जैसे रिफाइंड शुगर, रिफाइंड आटा, सॉस, ज्यादा चाय और कॉफी नहीं लेना चाहिए। इससे अपच, मितली जैसी समस्या हो सकती है।

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