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यूिनट बंद हुए 24 घंटे भी नहीं बीते थे बिना सेफ्टी मजदूरों को बॉयलर में भेज दिया, धधक रहे क्लिंकर गिरे तो गूंज उठीं चीखें

खेदड़ गांव स्थित राजीव गांधी थर्मल पॉवर प्लांट में मंगलवार दोपहर पौने तीन बजे हुए दर्दनाक हादसे में झुलसे छह...

Danik Bhaskar | May 09, 2018, 03:10 AM IST
खेदड़ गांव स्थित राजीव गांधी थर्मल पॉवर प्लांट में मंगलवार दोपहर पौने तीन बजे हुए दर्दनाक हादसे में झुलसे छह मजदूरों को बिना सेफ्टी ही बॉयलर के ऐश बॉटम में कोयले की राख साफ करने के लिए भेजा गया था। यूनिट को बंद हुए 24 घंटे भी नहीं बीते थे। इसके कारण चिमनी में चिपके क्लिंकर या कोयले के जलते अवशेष अचानक मजदूरों पर आ गिरे। झुलसने के साथ ही उनकी चीख-पुकार से पावर प्लांट गूंज उठा। चार मजदूर तो खुद बॉयलर से कूदकर बाहर आए थे, जबकि दो को कड़ी मशक्कत के बाहर निकाला गया था। सभी बुरी तरह झुलस चुके थे। इनके कपड़े तो जले ही, साथ ही शरीर की त्वचा भी उतर गई थी। उन्हें तुरंत प्लांट की एंबुलेंस से निजी अस्पताल में हिसार भिजवाया गया।

बता दें कि ऐश बॉटम में राख की सफाई तभी होती है, जब ठंडे हो चुके क्लिंकर को तोड़कर साफ कर दिया जाता है। इससे मजदूरों की जान का जोखिम कम रहता है लेकिन यहां लापरवाही बरतने के कारण बड़ा हादसा हो गया। बरवाला के डीएसपी जयपाल का कहना है कि मामले की जांच कर रहे हैं। उधर, देर शाम पुलिस ने झुलसे मनोज के बयान पर ईएनईआरजीओ कंपनी के लेबर ठेकेदार मिंगनी खेड़ा निवासी प्रवीन व साइट इंचार्ज राजेश के खिलाफ मामला दर्ज किया है। पेज 4 भी देखे।

जांच के लिए आज पहुंचेंगी

कई टीमें

झुलसने कर्मियों को थर्मल की एंबुलेंस से हिसार भिजवाया गया।



यूनिट वन के ऐश बॉटम में चल रहा था काम

खेदड़ थर्मल में 600-600 मेगावॉट की 2 यूनिट हैं। थर्मल की यूनिट वन के एयर फिल्टर में लीकेज होने के कारण रात करीबन साढ़े 12 बजे ही बंद किया था। मंगलवार सुबह इसमें टेक्निकल तौर पर मरम्मत और साफ-सफाई का काम चल रहा था। एनेर्गो कंपनी के अंतर्गत काम करने वाले बरवाला के खेदड़ गांव निवासी अमित, जगदीप, विक्रम, पाबड़ा का सतवीर व यूपी के देवरिया निवासी छोटेलाल यादव और मनोज क्लीनिंग के काम में जुटे हुए थे। कंपनी के अधीन 110 कर्मचारी हैं। 7 फरवरी को थर्मल में काम करने का टेंडर मिला था।

यूं बनता है क्लिंकर :चाईनीज तकनीक पर बने खेदड़ पॉवर प्लांट से कोयले की राख (ऐश) निकालने के लिए बॉयलर में ऐश हेंडलिंग सिस्टम लगा हुआ है। इससे राख छनकर बेल्ट के माध्यम से स्टोर में पहुंच जाती है। प्लांट विशेषज्ञों के अनुसार कई बार कोयला पूरी तरह जलता नहीं है और इसके टुकड़े बॉयलर क्षेत्र में चिपक जाते हैं। धीरे धीरे उसमें राख भी चिपकने लगती है। और यह अधजले कोयले बड़े पत्थर की तरह बन जाते हैं। इसे क्लिंकर कहा जाता है। चूंकि यह राख निकलने की प्रक्रिया को बाधित कर देता है, इसलिए इसे ठंडा कर फिर तोड़कर निकालना पड़ता है।

इस जगह पर थर्मल में हादसा हुआ।

प्रशासन ने यह दिया तर्क : हादसे के दौरान यूनिट वन के बॉयलर में आई तकनीकी खामीं को ढकने के भी थर्मल प्रशासन ने प्रयास किए। यूनिट वन को बंद इसलिए करना पड़ा कि इसका एयर फिल्टर लीक हो गया था। इसकी वेल्डिंग करनी थी। इसके अलावा प्रशासन द्वारा यह भी कहा गया कि प्लांट की यूनिट वन को बिजली की नो डिमांड के चलते बंद किया गया है। वहीं, निजी अस्पताल में मौजूद एसडीओ स्तर के एक अधिकारी ने तो यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि कोई बड़ा इश्यू नहीं है।

72 घंटे बाद बॉयलर में करना होता है काम

तकनीकी या फिर अन्य वजह से जब थर्मल प्लांट की यूनिट को बंद किया जाता है तो इसके बाद बॉयलर व इसके ऐश बॉटम की सफाई का काम मजदूरों द्वारा किया जाता है। कुछ तकनीकी खामी आने पर कुशल कारीगर भी मरम्मत इत्यादि का काम करते हैं। यह सब प्रक्रिया यूनिट बंद होने के 72 घंटे बाद शुरू की जाती है ताकि बॉयलर पूरी तरह ठंडा हो जाए। लेकिन थर्मल प्रशासन ने यूनिट बंद होने के मात्र 10 घंटे बाद ही बॉयलर में काम के लिए मजदूरों को लगा दिया था।

भास्कर री-कॉल

चाइना इंजीनियर व कर्मियों समेत 30 गवां चुके हैं जान

थर्मल प्लांट में जब से काम शुरु हुआ है तब से लेकर अभी तक दर्जनों हादसे हो चुके हैं। इन हादसों में चाइना के इंजीनियर्स सहित 30 से अधिक मजदूर एवं कर्मी जान गंवा चुके हैं। कई लोग दिव्यांग भी हो गए। इन हादसों से आज तक प्लांट प्रबंधन ने कोई सबक नहीं लिया है। यही वजह है कि यहां सुरक्षा के इंतजाम न होने पर मजदूरों को जान गंवानी पड़ती है।