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किसान ‘लाख’ कीट का पालन कर कमाएं लाभ

रेवाड़ी | बावल स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में महाराणा प्रताप कृषि व प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की ओर से लाख कीट की...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 08, 2018, 03:10 AM IST

रेवाड़ी | बावल स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में महाराणा प्रताप कृषि व प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की ओर से लाख कीट की पहचान व संरक्षण के लिए प्रोत्साहन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें डॉ. वीना जैन व कीट विशेषज्ञ डाॅ. बलबीर सिंह ने किसानों को लाख कीट के बारे में बताया। परियोजना निदेशक डॉ. हेमंत स्वामी ने बताया कि लाख उत्पादन तकनीक में भारत का पहला स्थान है। भारत में कीट 26 प्रजातियां व 8 प्रजाति कुसुमी व रंगीनी की व्यावसायिक खेती विभिन्न प्रांतों में की जा रही हैं। रंगीनी प्रजाति की खेती राजस्थान, हरियाणा व गुजरात में ज्यादा की जाती हैं। यह प्रजाति अक्टूबर, नवंबर, जून व जुलाई में परिपक्व होती है। उन्होंने बताया कि लाख प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाली रेजीन मादा कीट द्वारा प्रजनन के बाद बनती हैं। उनके शरीर में फैली सूक्ष्म ग्रंथियों से लाख उत्पन्न किया जाता है। लाख की चूड़ियां, विद्युत इंसुलेटर, पेंट, कपड़ों की रजाई व विभिन्न आयुर्वेदिक दवाइयों मे उपयोग किया जाता है। मधुमक्खी पालन के साथ लाख कीट की खेती कर ज्यादा लाभ ले सकते हैं। लाख कीट पोषक वृक्ष जैसे बेर, पीपल, कुसुम आदि की टहनियों पर पाले जाते हैं। केंद्र की संयोजक डॉ. वीना जैन ने किसानों व महिलाओं को फिल्म दिखाकर व नई तकनीक काे अपनाने के लिए प्रेरित किया है।

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