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प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों के साथ सबसे बड़ा मजाक : योगेंद्र यादव

स्वराज यात्रा के पांचवें दिन फसल बीमा भंडा फोड़ दिवस मनाया गया। आज यात्रा रेवाड़ी के भड़गी गांव से शुरू होकर बालावास...

Dainik Bhaskar

Jul 06, 2018, 03:15 AM IST
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों के साथ सबसे बड़ा मजाक : योगेंद्र यादव
स्वराज यात्रा के पांचवें दिन फसल बीमा भंडा फोड़ दिवस मनाया गया। आज यात्रा रेवाड़ी के भड़गी गांव से शुरू होकर बालावास होते हुए दोपहर मोहम्मद पुर पहुंची। फसल बीमा के बारे में बोलते हुए स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष व किसान नेता योगेंद्र यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना देश के किसान के साथ सबसे बड़ा मजाक है। यह किसान का नहीं बैंकों का बीमा है ताकि उन्होंने किसानों को जो कर्ज दिया है वो डूब न जाये। दुनिया में कही भी ऐसी बीमा योजना नहीं होती जिसमे बीमा जबरदस्ती किया जाए, बीमा धारक को पता भी न लगे और बीमे का क्लेम देने में इतने पेच हों।

हरियाणा में अनिवार्य बीमा सन 2016-17 में ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा’ के साथ शुरू हुआ। जिन किसानों के पास किसान क्रेडिट कार्ड है या जिन्होंने को-ऑपरेटिव सोसाइटी से लोन लिया है उनका बिना पूछे बीमे का प्रीमियम काट दिया जाता है। किसानों ने बताया कि जिन्होंने एक से ज़्यादा बैंक से लोन लिया है उनका प्रीमियम सभी बैंकों ने काट लिया है, लेकिन बीमा भुगतान की शर्तें इतनी टेढ़ी है कि किसान के लिए क्लेम करना लगभग असंभव है। कई फसलें बीमे से बाहर रखी गई हैं। बीमे के इकाई पूरा गांव है। यानी कि जब तक पूरे गांव में फसल का नुकसान न हो तब तक किसी किसान को बीमा का क्लेम नहीं मिलता। इसके कारण बीमा कंपनियों की चांदी हो गई है। पिछले साल (2016-17) में हरियाणा में बीमा कंपनियों को 362 करोड़ का प्रीमियम मिला, लेकिन किसानों को 220 करोड़ का क्लेम दिया गया। कंपनियों को 122 करोड़ का मुनाफा हुआ। स्वराज यात्रा के साथी और अखिल भारतीय किसान सभा के अभय सिंह, गांव फिदेडी ने बताया कि उन्होंने पिछले साल 20 गांव में फसल को पाले और कीड़े से हुए नुकसान का सर्वे करवाया था लेकिन बीमा कंपनी ने बहाने लगाकर क्लेम को खारिज कर दिया। यात्रा के दौरान कई किसानों ने फसल बीमा से हुए नुकसान का जिक्र किया।

यात्रा के दौरान पाया गया कि यहां पानी के स्रोत सूख रहे हैं बहुत से ग्रामों में पीने के लिए जल कैंपर में आने लगा है। एक नई प्रकार की संस्कृति आने लगी है, लगता है कि पानी पर अब जल माफिया कब्जा कर लेंगे। इसको रोकने के लिए हमें अपने जोहड़ तालाबों को पुनर्जीवित करना होगा।

कभी चिलचिलाती धूप तो कभी जोरदार बारिश पर स्वराज पद यात्रियों के हौसले भी बुलंद है मोहम्मदपुर से कलड़ावास हरचंदपुर बावल से तिहाड़ा में किसानों से बातचीत कर उन्हें अपने अधिकारों के लिए सचेत किया। स्वदेशी संस्कृति खानपान को बढ़ाने देने की मांग को उठाते हुए हरियाणा के देशी खाने को दैनिक भोजन में बढ़ावा देने के बारे स्वराज यात्रा के साथी इंद्रनील बिस्वास ग्रामीणों को विस्तृत रूप से बताया। आज स्वराज यात्रा धरचना, शाहपुर, नांगल, तेजू, प्राण पुरा, सुबाहेडी होते हुए झाबुआ पहुंचेगी जहां आज रात्रि का विश्राम है। इस यात्रा में भारत के विभिन्न हिस्सों से आए किसान नेता, स्वराज पदयात्री शामिल है। अविक सह कर्नल जयवीर, इंद्रनील बिस्वास पश्चिम बंगाल, अर्चना श्रीवास्तव यूपी, रमन, प्रत्युष, नवनीत, निशांत दिल्ली, कामरेड दलीप सिंह नारनौल व अरुणोदय सिंह एमपी से है। रेवाड़ी जिले से महेन्द्र सिंह डूंगर वास, प्रभात सिंह पाली, धर्मपाल सिंह नंबरदार, धर्म सिंह भौतवास, बलवंत मिस्त्री लोधाना, आनंद यादव, कुसुम यादव, एड. अभय सिंह फिदेड़ी व राजबाला यादव भी इस यात्रा में शामिल हैं।

योगेंद्र यादव की कलम से ...

योगेंद्र यादव की कलम से ...

गांव में सुविधाएं तो हंै सुख कहां है?

गांव में सुविधाएं तो हंै सुख कहां है?

सुबह के 8 बजे थे। हमारी ‘स्वराज यात्रा’ अपने पांचवें दिन के पहले पड़ाव मोहम्मदपुर के बाहर नुक्कड़ सभा के लिए रुकी थी। कोई पचास साठ बच्चे यूनिफार्म पहनकर स्कूल बस का इंतजार कर रहे थे, जैसे दिल्ली में होता है। साथ में मां या दादी भी खड़ी थीं। हमारे स्वागत में ज़मीन पर प्लास्टिक की पल्लड़ बिछी थी, कुछ प्लास्टिक की कुर्सियां भी रखी थीं। ये दृश्य जैसे मेरी आंखों में फोटो फ्रेम के जैसे कैद हो गया। मैं तुलना करने लगा अपने बचपन के गांव से। कच्चे घर और पुले की छप्पर दिखाई नहीं देते। ईंट की दीवारों, सीमेंट के लेंटर्न और एल्युमीनियम के दरवाजों का युग है। मजबूत मगर बेढब। मूंज की खाट, मोढ़े, पीढ़े, चौकी और महिलाओं द्वारा बनी दरियां गायब हो रही हैं। सुरक्षित तो हैं मगर ज्यादा सुविधाजनक हैं ये घर? किसान के सर से पगड़ी उतर गई है। अब तो रस्मी पगड़ी पहनाने वाले मुश्किल से एक दो लोग मिलते हैं। घाघरी चोली अब भी दिखाई देती है, लेकिन युवतियों और बच्चियों में नहीं। कपड़े सरल तो हैं मगर सुंदर भी हैं? वेश भूषा के साथ भोजन भी बदल रहा है। जौ-चने की मिस्सी रोटी और बाजरे की जगह अब गेहूं और चावल ने ले ली है। छाछ की जगह चाय ने ले ली है। राबड़ी तो मांगने पर भी नहीं मिलती। चूरमा मिल जाता है, लेकिन गुड़ और बूरा की जगह अब चीनी ही मिलती है। बाजरा तो बचा है, लेकिन चने और जौ की फसल अब कोई नहीं उगाता। भोजन सहज तो है मगर स्वास्थ्यप्रद है? इतने में स्कूल बस आ गई, बच्चे भविष्य की बस चढ़ गए, मां और दादी वर्तमान और अतीत में लौट गईं। एक सवाल छोड़ गईं। हमारे इस आधुनिक गांव में सुविधा तो है, सुख कहां है? ( योगेंद्र यादव द्वारा यात्रा की डायरी सिर्फ भास्कर के िलए)

सुबह के 8 बजे थे। हमारी ‘स्वराज यात्रा’ अपने पांचवें दिन के पहले पड़ाव मोहम्मदपुर के बाहर नुक्कड़ सभा के लिए रुकी थी। कोई पचास साठ बच्चे यूनिफार्म पहनकर स्कूल बस का इंतजार कर रहे थे, जैसे दिल्ली में होता है। साथ में मां या दादी भी खड़ी थीं। हमारे स्वागत में ज़मीन पर प्लास्टिक की पल्लड़ बिछी थी, कुछ प्लास्टिक की कुर्सियां भी रखी थीं। ये दृश्य जैसे मेरी आंखों में फोटो फ्रेम के जैसे कैद हो गया। मैं तुलना करने लगा अपने बचपन के गांव से। कच्चे घर और पुले की छप्पर दिखाई नहीं देते। ईंट की दीवारों, सीमेंट के लेंटर्न और एल्युमीनियम के दरवाजों का युग है। मजबूत मगर बेढब। मूंज की खाट, मोढ़े, पीढ़े, चौकी और महिलाओं द्वारा बनी दरियां गायब हो रही हैं। सुरक्षित तो हैं मगर ज्यादा सुविधाजनक हैं ये घर? किसान के सर से पगड़ी उतर गई है। अब तो रस्मी पगड़ी पहनाने वाले मुश्किल से एक दो लोग मिलते हैं। घाघरी चोली अब भी दिखाई देती है, लेकिन युवतियों और बच्चियों में नहीं। कपड़े सरल तो हैं मगर सुंदर भी हैं? वेश भूषा के साथ भोजन भी बदल रहा है। जौ-चने की मिस्सी रोटी और बाजरे की जगह अब गेहूं और चावल ने ले ली है। छाछ की जगह चाय ने ले ली है। राबड़ी तो मांगने पर भी नहीं मिलती। चूरमा मिल जाता है, लेकिन गुड़ और बूरा की जगह अब चीनी ही मिलती है। बाजरा तो बचा है, लेकिन चने और जौ की फसल अब कोई नहीं उगाता। भोजन सहज तो है मगर स्वास्थ्यप्रद है? इतने में स्कूल बस आ गई, बच्चे भविष्य की बस चढ़ गए, मां और दादी वर्तमान और अतीत में लौट गईं। एक सवाल छोड़ गईं। हमारे इस आधुनिक गांव में सुविधा तो है, सुख कहां है? ( योगेंद्र यादव द्वारा यात्रा की डायरी सिर्फ भास्कर के िलए)

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