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सोनीपत में भगवत दयाल ने कहा था-बंसी बजाई, भजन गाया, अब करूंगा देवी पूजा

2 वर्ष पहले
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चुनाव में पार्टियां बदलने का दौर नया नहीं है। कई रोचक किस्से ऐसे हैं, जब दिग्गज खुले मंच पर समर्थन देकर वापस लौट गए। ऐसा ही एक किस्सा सोनीपत का है। 12 अक्टूबर 1986 को विशाल जनसभा हुई। इसमें कांग्रेस से दूरी बनाकर देवीलाल के समर्थन में उतरे प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पं. भगवत दयाल शर्मा ने मंच से कहा कि मैंने बंसी बजाकर भी देख ली, भजन गाकर भी देख लिए, अब देवी पूजन करूंगा। उन्होंने देवीलाल काे खुला समर्थन देकर जनता में माहौल गर्म कर दिया। चुनाव की तारीख घोषित होने के बाद देवीलाल ने पं. भगवतदयाल की सिफारिश पर हरियाणा में कोटे से अधिक 12 ब्राह्मण प्रत्याशी बनाए। इस समय बंसीलाल को हार दिखाई देने लगी तो राजीव गांधी के माध्यम से पं. भगवत दयाल पर दबाव बनाकर वापस बुला लिया। देवीलाल फिर भी सत्ता लेकर आए। बंसीलाल सरकार के दौरान वर्ष 1986 में देवीलाल के न्याय युद्ध अभियान ने जनता के बीच माहौल बदल दिया। उस समय पं. भगवत दयाल शर्मा हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री, मध्यप्रदेश और उड़ीसा के राज्यपाल रहकर अपने घर शांत बैठे थे। वह हरियाणा के तीनों लालों चौ. बंसीलाल, चौ. देवीलाल और चौ. भजनलाल को समय-समय पर अपने तेवर दिखाकर विरोधी बना चुके थे। पं. भगवत दयाल शर्मा ने 1987 के विधानसभा चुनाव से पहले फिर राजनीतिक अंगड़ाई ली। देवीलाल के संघर्ष से वे लालायित हो उठे। राजनीतिक टीस में उन्होंने देवीलाल से हाथ मिलाने की ठानी। तत्कालीन वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि इसका माहौल तैयार करने के लिए 19 अगस्त, 1986 को भिवानी में एक विशेष बैठक बुलाकर भगवतदयाल ने ब्राह्मण समाज के प्रमुख लोगों का दिल टटोला और सत्ता में भगीदारी के लिए उकसाया। इसके बाद देवीलाल से उनकी भेंट हुई। राष्ट्रीय लोकदल का हरियाणा में नेतृत्व कर रहे देवीलाल भी जानते थे कि पं. भगवतदयाल साथ आएं तो 1987 के विधानसभा चुनाव की नइया पार लगाई जा सकती है। बंसीलाल के मुख्यमंत्री बनने के बाद कांग्रेस में भजनलाल भी खफा थे। देवीलाल के साथ उनकी भी बैठक हुई लेकिन राजीव गांधी ने तुरंत भजनलाल को बुलाकर राज्यसभा की खाली सीट नियुक्ति दी और बाद में केंद्र में मंत्री बनाकर उनके बागी तेवर रोक लिए।

पं. भगवत दयाल शर्मा

ब्राह्मणों को देवीलाल ने दी 12 सीट

पं. भगवतदयाल शर्मा और चौ. देवीलाल के बीच हुए समझौते के अनुसार सोनीपत में जनसभा कर भगवत दयाल ने मंच से देवीलाल के समर्थन की घोषणा की। उन दिनों राष्ट्रीय लोकदल के प्रधान तथा पूर्व प्रधानमंत्री चौ. चरण सिंह के बीमार होने के चलते हेमवती नंदन बहुगुणा राष्ट्रीय लोकदल के कार्यकारी प्रधान थे। चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह को देवीलाल की बढ़ती लोकप्रियता हजम नहीं हुई और उन्होंने रोहतक में चरणसिंह समर्थकों की बैठक बुलाकर विरोध में उतर आए। बाद में अजीत सिंह ने राष्ट्रीय लोकदल से अलग दल बनाना पड़ा। 17 जून 1987 में हरियाणा विधानसभा चुनाव की तारीख तय हुई। देवीलाल ने पं. भगवतदयाल शर्मा की सिफारिश पर कोटे से अधिक 12 ब्राह्मणों को पार्टी प्रत्याशी बनाया। बाद में राजीव गांधी के दबाव में पं. भगवतदयाल शर्मा ने समर्थन वापस ले लिया। हालांकि देवीलाल द्वारा घोषित ब्राह्मण प्रत्याशियों ने लोकदल से ही चुनाव लड़ा और अधिकतर जीते भी। देवीलाल और उनकी समर्थित पार्टी भाजपा को 90 में से 85 सीटें मिली।

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