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जाति, संप्रदाय नहीं बल्कि अपनी मूल प्रकृति को धारण करना ही धर्म है: साध्वी किरण भारती

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से राजकीय आदर्श सीनियर सेकेंडरी स्कूल में की जा रही सात दिवसीय श्रीकृष्ण कथा...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 06, 2018, 02:15 AM IST

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से राजकीय आदर्श सीनियर सेकेंडरी स्कूल में की जा रही सात दिवसीय श्रीकृष्ण कथा के तीसरे दिन भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण की गाथा सुनाई गई। सारा पंडाल नंद महोत्सव में डूबा सा लग रहा था। नन्हे कन्हैया को पालने में झूलते देख सभी दर्शक नतमस्तक हो उठे। बड़ी संख्या में कस्बा व आसपास के गांवों से लोग कथा का आनंद लेने पहुंचे।

साध्वी जी ने कहा कि आज मानव मस्तिष्क ने जिसे धर्म की संज्ञा दी है वह तो धर्म है ही नहीं। वह तो धर्म का विकृत एवं अंशु रूप है। धर्म के नाम पर पनपते संप्रदाय है। ये वो सांप्रदायिक वृत्ति है जिसमे समाज बैठे बिठाए इंसान इंसान से विभक्त हो गया। विश्व इतिहास में अनेक रक्तरंजित होलियां अंकित हैं। ये सब संप्रदाय के नाम पर है। धर्म तो विराट है, अपने आप में संपूर्ण, अखंड एवं अविभाज्य है। धर्म तो शास्वत सनातन है। सनातन धासौ धर्मस्य। साध्वी ने कहा कि धर्म संस्कृत की धू धातु से निकला है जिसका अर्थ है धारण करना। हमें अपनी मूल प्रकृति को धारण करना है। जैसे अग्रि की मूल प्रकृति उष्णता है। उष्णता के बिना वह राख का ढेर है। इसी मनुष्य की प्रकृति है चैतन्य ईश्वरीय प्रकाश। उस प्रकाश स्वरूप परमात्मा को देखना। उन्होंने कहा कि अपनी मूल प्रकृति को धारण करना तब तक संभव नहींं जब तक हम ब्रह्मज्ञान के द्वारा साक्षात्कार न कर लें। धर्म केवल चर्चा या वाद विवाद का विषय नही हैं। परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति अपने घट में ही कर लेना ही धर्म है।कथा में किरण भारती, पूनम भारती, पुष्पभद्रा भारती व अन्य साध्वी बहनों ने भजन गायन कर संगत को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम में डॉक्टर करतार कौर यमुनानगर, अमरजीत सिंह औलख बलाचौर व डॉक्टर विक्रम सिहं कोहलीवाला मुख्य तौर पर उपस्थित रहे।

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