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आसक्ति ही दु:खों का कारण : भरतमुनि

शहर के श्री रामलीला मैदान में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में कथा व्यास महंत भरतमुनि महाराज ने कहा कि सभी सांसारिक...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 12, 2018, 02:15 AM IST

शहर के श्री रामलीला मैदान में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में कथा व्यास महंत भरतमुनि महाराज ने कहा कि सभी सांसारिक वस्तुओं का आकर्षण सदैव एक जैसा नहीं रहता। व्यक्ति के लिए उसका महत्व समयानुसार बदलता रहता है।

यदि धन और नेतृत्व का आकर्षण स्थायी होता तो बड़े-बड़े सम्राट अपना राजपाट और धन-संपदा त्याग कर वैरागी नहीं होते। इस संसार में कुछ भी पूर्ण नहीं है, सब कुछ अपूर्ण एवं असत्य है। उन्होंने कहा कि हमारे देश का पूरा नाम भारत है जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘भा अर्थात प्रकाश एवं ‘रत का अर्थ ओतप्रोत। इस प्रकार भारत का अर्थ हुआ प्रकाश से ओतप्रोत। वह देश जहां प्रकाश यानि उजाला रहता है। भारत ने ही इस दुनिया को अन्न, औषधि, शून्य, दशमलव, प्रतिशत, संस्कृति का बोध करवाया था। उन्होंने कहा कि वास्तव में हमारी आसक्ति ही दु:खों का कारण है।

जो व्यक्ति भोर में जगना नहीं जानता वह अपनी डायरी में लिख दे कि सफलता अभी दूर है। साधना का अर्थ ही निरंतर है। चूंकि मन नवीनता के प्रति उत्सुक होता है इसलिए साधना में ही नवीनता लानी चाहिए। उपासना में नवीनता के लिए अपने आचरण में सुधार भी लाना चाहिए। हर पल उपासना में याचना नहीं होनी चाहिए। उपासना में कोई कामना भी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से करें किसी दूसरे से नहीं।

ऐलनाबाद। श्रीमद्भागवत कथा में प्रवचन करते महंत भरत मुनि महाराज।

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