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पंचर बनाने वाले ने बदली बेटियों की Life, एक को बनाया फुटबॉलर तो दूसरी को बना रहे डॉक्टर

यह कहानी है पंचर लगाने वाले एक पिता की। यहां लड़कियों की जल्द शादी करने का रिवाज है।

Dainik Bhaskar

Jan 29, 2018, 05:53 AM IST
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फरीदाबाद। यह कहानी है पंचर लगाने वाले एक पिता की। यहां लड़कियों की जल्द शादी करने का रिवाज है। लेकिन इन्होंने अपने समाज के विपरीत जाकर अपनी बेटियों को घर की चौखट से बाहर निकालकर पढ़ने के लिए भेजा। खराब आर्थिक स्थिति के आगे भी इनके हौसले कमजोर नहीं हुए। बेटियों को अच्छी तालीम और मुकाम पर पहुंचाने के शिद्दत के साथ लगे हैं। पंचर वाले पापा के नाम से फेमस है फतेह सिंह...

- फरीदाबाद के रहने वाले फतेह सिंह रोपल पंचर वाले पापा के नाम से मशहूर हैं। उन्होंने अपनी मेहनत से अपनी बेटियों की जिंदगी बदल दी।

- ये खुद साइकिल-बाइक का पंचर लगाते हैं। लेकिन इनके हौसलों की उड़ान बहुत ऊंची है। इतनी ऊंची कि इन्होंने झुग्गी से निकलकर एक बेटी को फुटबॉल का नेशनल प्लेयर बनाया तो दूसरी को डाक्टर।

- उनकी दुकान पर आने वाले लोगों को इस बात पर कई बार यकीन नहीं होता कि एक पंचर लगाने वाले के बच्चे डाक्टर और नेशनल प्लेयर भी हो सकते हैं।

झुग्गी में रहकर बनाया बेटियों का करियर
- फतेह सिंह की बेटा व दोनों बेटी सरकारी स्कूल में थीं। दोनों पढ़ाई में अच्छी थीं। झुग्गियों में माहौल अच्छा नहीं था।

- ऐसे में फतेहसिंह अपनी बेटी की पढ़ाई के लिए झुग़्गी छोड़कर किराए पर कमरा लेकर रहने लगे। उनकी बड़ी बेटी कोमल व छोटी बेटी बॉबी अपने पापा के हालातों को समझती थी। कोमल डाक्टर बनना चाहती थी।

- उसने अपने पिता से यह बात कही। पिता ने कहा क्यों नहीं, तुम पढ़ाई करो। बाकी की चिंता मुझ पर छोड़ दो।

- कोमल ने बिना कोचिंग लिए 2014 में ऑल इंडिया प्री मेडिकल एंट्रेस टेस्ट में 498वीं रैंक प्राप्त की। अब बेटी को एडमिशन दिलाना था।

- उ नकी बेटी का एडमिशन बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में हुआ। बेटी के सपने को पूरा करने के लिए फतेह सिंह ने कर्जा लेकर बेटी को डाक्टरी की पढ़ाई के लिए भेजा।

- अब कोमल के एमबीबीएस का तीसरा साल है। वह डाक्टर बन अपने पिता का नाम रोशन करना चाहती है। उनकी दूसरी बेटी बॉबी नेशनल फुटबॉल प्लेयर है।

- बॉबी खेल में लड़कों को भी मात देती है। बॉबी अक्सर पापा की दुकान पर आकर उनके काम में भी हाथ बंटाती है और वहां फुटबॉल की प्रैक्टिस भी करती है।

- हाल ही में बॉबी नार्वे में हुए इंटरनेशनल टूर्नामेंट में हिस्सा लेकर लौटी है।

लोगों के ताने पर नहीं दिया ध्यान : फतेह सिंह के अनुसार शुरू में जब उन्होंने बेटी को डाक्टरी की पढ़ाई के लिए भेजा और छोटी बेटी की फुटबॉल की कोचिंग शुरू कराई। तब लोगों ने कहा कि अरे बेटे पर ध्यान दो। बेटी को तो पराए घर जाना है। पर फतेह सिंह ने किसी की नहीं सुनी। वे हर कदम पर अपनी बेटियों के साथ रहे। उन्होंने कहा कि उनकी बेटी पर उन्हें गर्व है। वह अपने पिता के हालातों को जानती थी। उन्होंने बहुत मेहनत की। उन्होंने कहा कि जब उनकी बेटी डाक्टरी के लिए एंट्रेस टेस्ट की तैयारी कर रही थीभलोग हंसते थे एक पंचर लगाने वाले की बेटी डाक्टर बनेगी। यह सुनकर उन्हें बुरा लगता था।
मंडे पाॅजिटिव
पंचर बनाने वाले पिता फतेह सिंह ने बदली बेटियों की जिंदगी, पहले लोग हंसते थे, कहते कि पंचर लगाने वाले के बच्चे डाक्टर, आईएएस तो नहीं बनेंगे

लोगों ने कहा पंचर लगाने वाले के बच्चे पंचर ही लगाएंगे
फतेह सिंह फरीदाबाद के बड़खल मोड़ पर मोबाइल पंचर वैन खड़ी है। उनके पास अपनी दुकान नहीं है। ऐसे में उन्होंने गाड़ी के अंदर ही पंचर का सारा समान रख रखा है। 15 साल से वेे इस काम को कर रहे हैं। वे पहले बड़खल में ही झुग्गियों में अपनी पत्नी दो बेटी व बेटे के साथ रहते थे। फतेह सिंह के अनुसार उनके तीनों बच्चे सरकारी स्कूल जाते थेे। पंचर लगाने के दौरान ही कई लोग पूछते बच्चे क्या कर रहे हैं। तब मैं उन्हें कहता कि पढ़ रहे हैं। उन्हें पढ़ा लिखाकर आगे बढ़ाना है। इस पर कई बार लोग हंसते। कहते कि पंचर लगाने वाले के बच्चे डाक्टर, आईएएस तो नहीं बनेंगे। सरकारी स्कूल में 10वीं 12वीं पास कर लें यही काफी है। पंचर वाले के बच्चे पंचर ही लगाएंगे। यह बात सुनकर उन्हें दुख होता था।

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