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सुबह की कॉफी खतरे में है, क्वालिटी खराब होने का डर

दैिनक भास्कर, फरीदाबाद, रविवार 24 जून 2018 जस्टिन वॉरलैंड पर्यावरण खराब हो रहा है, धरती गर्म हो रही है, इस बारे में...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 24, 2018, 02:10 AM IST

सुबह की कॉफी खतरे में है, क्वालिटी खराब होने का डर
दैिनक भास्कर, फरीदाबाद, रविवार 24 जून 2018

जस्टिन वॉरलैंड

पर्यावरण खराब हो रहा है, धरती गर्म हो रही है, इस बारे में बहुत कम लोग चिंता करते हैं। लेकिन यदि ये कहा जाए कि आपकी सुबह की कॉफी का स्वाद खराब होने वाला है, तो सभी को परेशानी होगी। पूछेंगे कि ऐसा क्यों? तो जवाब है, धरती का तापमान 4 डिग्री सेंटीग्रेड तक बढ़ना।

हावर्ड शुल्ट्ज को इसी बात की चिंता है, क्योंकि वे चार दशक तक स्टारबक्स में सेवाएं देने के बाद इस वर्ष जून में रिटायर हो जाएंगे। इतनी बड़ी कंपनी का कार्यकारी चेयरमैन होना और हर दिन की चुनौतियां भारी-भरकम थी, लेकिन आबोहवा बदलने की चुनौती सबसे कठिन मालूम हो रही है। जैसे-जैसे तापमान बढ़ते जा रहा है, जमीनें सूखी हो जाती हैं। ऐसे में कॉफी उगाना मुश्किल तो होता ही है, काफी महंगा भी हो जाता है। चूंकि सरकार बहुत धीमी गति से इस दिशा में रेंग रही है, इसलिए स्टारबक्स ने खुद ही इसमें उतरकर काम करने का फैसला किया है। कंपनी अंतिम स्तर पर जाकर यह पुष्टि करना चाहती है कि प्रोडक्ट में किसी तरह की कमी नहीं आएगी। शुल्ट्ज का कहना है कि आबोहवा बदलने से कॉफी की क्वालिटी खराब हो रही है, जिससे उसकी विश्वसनीयता पर आंच आएगी। कंपनी के कोस्टारिका के अलाजुएला स्थित फार्म हाउस की बालकनी में बैठे वे इसी बात का चिंतन कर रहे हैं। हालांकि शुल्ट्ज तो दिन में एक ही बार कॉफी पीते हैं और करीब 60 फीसदी अमेरिकियों की यही आदत है, लेकिन शेष तो कई बार पीते हैं। आधुनिक सुविधाओं से लैस फार्म हाउस में बैठकर यह नहीं लगता कि समंदरों में जल का स्तर आबोहवा खराब होने के कारण बढ़ गया है, गर्मी असहनीय रूप से तीव्र होते जा रही है। ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण ही स्टारबक्स ने 2013 में 600 एकड़ की भूमि कोस्टारिका में ली थी। साल में कई-कई बार शुल्ट्ज सिएटल से 3500 मील दूर यहां आते हैं। इसी फार्म में स्टारबक्स की लैब भी है। इसी लैब ने चेतावनी दी है कि मौसम में इतनी ही गर्मी रही तो कॉफी का स्वाद खराब हो जाएगा। शुल्ट्ज का मानना है कि इस लैब में होने वाली रिसर्च दुनिया के अनेक किसानों को खेती के तरीके बदलने के बारे में जानकारी दे सकती है। वे कहते हैं कि जब तक जमीन से जुड़कर काम नहीं करेंगे, तब तक यह समझ में नहीं आएगा कि समस्या को कैसे सुलझा सकते हैं।

सिर्फ एक ही अध्ययन नहीं, कई अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि आबोहवा के बदल जाने के कारण कॉफी उद्योग पर खतरा मंडरा रहा है। तेजी से बढ़ता तापमान सूखे को न्योता दे रहा है, जिसके कारण कई बीमारियां फैल रही हैं, कई ऐसे कीटाणु भी मर रहे हैं, जो कॉफी के पौधों के परागण में सहायक है। क्लाइमेट चेंज जर्नल के अनुसार दुनिया में कॉफी के लिए जितनी जमीन का उपयोग हो रहा है, अगले तीस साल में वह बंजर हो जाएगी। प्रोसिडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस के अनुसार लेटिन अमेरिका की करीब 88 फीसदी जमीन तापमान बढ़ने से बेकार हो जाएगी।

अब कीमोथैरेपी की बजाय हार्मोनल थैरेपी

एलिस पार्क

फिलिस लेसैटी को 2007 में पता चला कि उनके सीने के दायीं ओर कुछ असामान्य लग रहा है। वे अस्पताल गईं तो डॉक्टर ने बताया कि ब्रेस्ट कैंसर है। इसे तत्काल समाप्त करना चाहिए। फिलिस के पिता, बहन और उनके भाई सभी को कैंसर था और तीनों की मौत असमय हो गई। कीमोथैरेपी के बाद भी दुर्भाग्य ऐसा कि तीनों चल बसे। कीमोथैरेपी का कष्ट असहनीय होता है और सोचकर भी फिलिस सिहर जाती थीं।

उनके फिजिशियन डॉ. जोसेफ सेपेरानो अलबर्ट आइंस्टीन कॉलेज ऑफ मेडिसिन, मोंटफायर में क्लीनिकल रिसर्च में एसोसिएट डायरेक्टर भी हैं। उन्होंने लेसैटी को बताया कि यदि आप कीमोथैरेपी नहीं लेना चाहती हैं, न लें, लेकिन उसके विकल्प के रूप में हार्मोनल थैरेपी ले लें। एक बार एस्ट्रोजेन जैसे कुछ हार्मोन्स पर रोक लगा दी तो महिलाओं में इस तरह का ट्यूमर बढ़ नहीं पाता है। लैसेटी की प्रबल इच्छा थी कि हार्मोनल थैरेपी के प्रयोग में पता चले कि कीमोथैरेपी इस रोग में जरूरी नहीं है।

दस वर्ष बाद लैसेटी को लगा कि कीमोथैरेपी नहीं कराने का फैसला उन्होंने सही लिया था। इसके ट्रायल में इनके जैसी करीब 10 हजार अन्य महिलाओं ने भाग लिया। यह पाया गया कि कीमोथैरेपी से कोई अतिरिक्त लाभ नहीं होता है, लेकिन हार्मोनल थैरेपी के कारण लाभ हुआ। अमेरिका में हर वर्ष 2,60,000 मामले ब्रेस्ट कैंसर के सामने आते हैं। इसमें से 80 फीसदी से अधिक मामले हार्मोन एस्ट्रोजेन के कारण होते हैं। इस कारण से एंटीएस्ट्रोजन का उपचार कराना होता है। ये सभी एक प्रोटीन एचईआर2 से मुक्त होते हैं।

डॉ. जोसेफ द्वारा इन महिलाओं पर किए गए ट्रायल को टेलराक्स कहते हैं। इसे गेमचेंजर माना जा रहा है। कई अध्ययन तो यह भी कहते हैं कि जो महिलाएं रोग के प्रारंभिक स्तर पर रहती हैं, उन्हें कीमोथैरेपी की जरूरत भी नहीं होती है। अमेरिकन सोसायटी ऑफ क्लीनिकल ऑन्कोलॉजी की सालाना बैठक में इससे संबंधित अध्ययन पेश किया गया था। अध्ययन में कहा गया था कि एक जेनेटिक परीक्षण ऑन्कोटाइप डीएक्स होता है। इससे कैंसर दोबारा होने के खतरे का आकलन किया जा सकता है। इसमें 21 जीन का परीक्षण किया जाता है कि कैंसर फिर से तो नहीं उभरेगा। लेकिन फिर भी पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।

यह नया ट्रीटमेंट 50 वर्ष से अधिक की महिलाओं के लिए और भी उपयोगी है। क्योंकि वे ऋतुचक्र से निकल चुकी होती हैं। इनमें हार्मोनल थैरेपी कारगर साबित होती है। इतना ही नहीं यह ट्रीटमेंट सस्ता भी है, जबकि ऑन्कोटाइप डीएक्स परीक्षण में 4000 डॉलर तक लगते हैं और कीमोथैरेपी की औसत व्यय 20 हजार डॉलर है।

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