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अर्थव्यवस्था और कारोबार के लिए उतार-चढ़ाव भरा रहा जीएसटी का एक साल का ये सफर

गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) लागू हुए आज एक वर्ष हो गया। एक जुलाई 2017 को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी...

Danik Bhaskar | Jul 01, 2018, 02:00 AM IST
गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) लागू हुए आज एक वर्ष हो गया। एक जुलाई 2017 को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय चार्टर्ड एकाउंटेंट संस्थान के कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे, वहीं गुड़गांव में सीएम मनोहर लाल ने इसी संस्थान की गुड़गांव शाखा के कार्यक्रम में जीएसटी को लेकर कई दावे किए। टैक्स की नई व्यवस्था की सफलता के लिए चार्टर्ड एकाउंटेंट से सहयोग का आह्वान किया था। नई व्यवस्था से प्रदेश के उपभोक्ता से लेकर तमाम कारोबारी प्रभावित हुए। प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ा। शुरुआत में माना जा रहा था कि जीएसटी से प्रदेश सरकार को काफी लाभ होगा, मगर निराशा हाथ लगी। पहले वित्त वर्ष 2017-18 के अंतर्गत एक जुलाई 2017 से लेकर 31 मार्च 2018 तक प्रदेश में जीएसटी के एवज में कुल 31,409 करोड़ रुपए का कलेक्शन हुआ, जिसमें से एसजीएसटी के एवज में सरकार के हिस्से में सिर्फ 6,960 करोड़ आया, जो कुल कलेक्शन का 22 फीसदी है। वहीं वित्त वर्ष 2016-17 में सरकार को वैट के एवज में कुल 29 हजार करोड़ रुपए मिले थे। इस तरह 9 महीनों में सरकार की तिजोरी में कम से कम 21,750 करोड़ रुपए आना चाहिए थे। मगर, जीएसटी लागू होने के बाद सरकार को 9 महीने में सिर्फ 6,960 करोड़ रुपए ही मिले। इस तरह 14,790 करोड़ रुपए की हानि हुई, जो 68 फीसदी है।

प्रदेश में जीएसटी

कलेक्शन

वित्त वर्ष 2017-18

31,409 करोड़

एसजीएसटी

एसजीएसटी

6,960 करोड़

6,960 करोड़

कुल कलेक्शन

22 फीसदी

इंटर स्टेट कारोबार अधिक होना कम टैक्स की वजह

आईसीएआई के पूर्व अध्यक्ष सीए नवीन गर्ग का कहना है कि हरियाणा में इंट्रा स्टेट की तुलना में इंटर स्टेट कारोबार अधिक होना टैक्स कलेक्शन की कमी का सबसे बड़ा कारण है। हरियाणा औद्योगिक उत्पादक प्रदेश है। देश की 66 फीसदी यात्री कार का उत्पादन हरियाणा में होता है। बाइक उत्पादन में 60 फीसदी भागीदारी है। इसी तरह ट्रैक्टर और रेफ्रिजरेटर उत्पादन में भी आधी हिस्सेदारी है। जीएसटी से पहले वैट व्यवस्था में हरियाणा में उत्पादन होने वाले माल का अन्य प्रदेशों में खपत पर हरियाणा को सेंट्रल सेल्स टैक्स (सीएसटी) के एवज में 2 फीसदी का टैक्स मिलता था। अब जीएसटी में बाहर बिक रहे माल पर उत्पादक प्रदेश को कुछ भी नहीं मिल रहा। हरियाणा के लिए यह बड़ी हानि है।

जीएसटी में प्रदेश सरकार के लिए गुड़गांव वरदान साबित हो रहा है। उपभोक्ता शहर होने के चलते गुड़गांव की भागीदारी बढ़कर 57 फीसदी हो गई है। इससे पहले वैट में गुड़गांव की हिस्सेदारी 37 फीसदी थी। बीते 9 महीनों में गुड़गांव से 17,965 करोड़ रुपए का कलेक्शन हुआ। गुड़गांव से एसजीएसटी के एवज में प्रदेश को 3,167 करोड़ रुपए मिले, जो गुड़गांव से कुल कलेक्शन का मात्र 17.6 फीसदी है। गुड़गांव में इंट्रा स्टेट की तुलना में इंटर स्टेट कारोबार अधिक हो रहा है।

गुड़गांव पर टिकी सरकार की नजर

गुड़गाव. सेक्टर 32 स्थित केंद्रीय उत्पाद शुल्क भवन।

स्लैब अनुसार वस्तुओं की संख्या

स्लैब वस्तु संख्या

0.25% 3

03 % 18

स्लैब वस्तु संख्या

05 % 258

12 % 223

स्लैब वस्तु संख्या

18 % 429

28 % 49

141 प्रकार की वस्तुओं में किसी तरह का टैक्स नहीं लगाया गया है।

छह महीने बाद स्टेट और सेंटर में हुआ बंटवारा

जीएसटी को लेकर केंद्र और प्रदेश के बीच खींचतान की स्थिति है। प्रदेश में जीएसटी के तहत करीब 2.50 लाख डीलर्स रजिस्टर्ड हुए हैं, जिसकी मॉनिटरिंग को लेकर केंद्र और राज्य के अफसर उलझन है। हालांकि, जीएसटी लागू होने के छह महीने बाद जनवरी में केंद्र और राज्य के बीच रजिस्टर्ड डीलर्स का बंटवारा हो गया। वैसे तो, जीएसटी कलेक्शन में स्टेट और केंद्र की हिस्सेदारी आधी-आधी है, मगर डीलर्स की निगरानी में स्टेट को 9 गुना अधिक जिम्मेदारी दी गई। जीएसटी के तहत 1.5 करोड़ रुपए से अधिक के वार्षिक टर्नओवर वाले कारोबारियों को स्टेट और सेंटर के बीच बराबर बांटा गया, जबकि 1.5 करोड़ से कम के वार्षिक टर्नओवर वाले टैक्स पेयर को स्टेट और सेंटर के बीच 90:10 के रेशियो में बांटा है।

17 टैक्स समायोजित हुए

आईसीएआई के अध्यक्ष सीए राकेश अग्रवाल का कहना है कि जीएसटी लागू होने से व्यापारियों के लिए बड़ी राहत ये है कि देश में 17 विभिन्न प्रकार टैक्स का एक टैक्स में समायोजन हो गया। पहले जहां 40 तरह के टैक्स कानून में माथापच्ची करनी पड़ती थी, वहीं अब केवल एक कानून के अध्ययन की जरूरत है। व्यापारियों के साथ उपभोक्ताओं के लिए अच्छी बात है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक वस्तु की कीमत एक समान लागू है। प्रदेश की सीमा पर चेकिंग बंद होने से माल ढुलाई की गति में 30 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

जीएसटी की राह में अभी भी कुछ बड़ी बाधाएं

आईसीएआई के पूर्व अध्यक्ष सीए नवीन गर्ग का कहना है कि जीएसटी से कारोबार की राह तो आसान हो गई, मगर इसमें अभी भी कुछ बड़ी बाधाएं हैं। कारोबारियों को पर्याप्त समय दिए बिना ही सरकार नियमों में बार-बार बदलाव कर रही है, जिसका कारोबार पर नकारात्मक असर पड़ता है। जीएसटी को लेकर अफसर भी स्पष्ट नहीं हैं। एक अधिकारी की सलाह को दूसरे गलत ठहराते हैं। ई-वे बिल को लेकर भी समस्या बनी है। नई व्यवस्था में इंस्पेक्टर स्तर का एक अधिकारी वाहनों को रोककर ई-वे बिल रिजेक्ट कर सकता है, जिसे उच्च अधिकारी भी पास नहीं कर सकते। गुड़गांव में ऐसे कई मामले हुए हैं, जिसमें इंस्पेक्टर की जानकारी के अभाव का खामियाजा व्यापारी को भुगतना पड़ा। कुल मिलाकर सीए नवीन गर्ग का कहना है कि जीएसटी व्यवस्था में गलती की माफी नहीं है। यदि एक बार गलती पकड़ी गई तो कारोबार बंद करने की नौबत आ जाती है, जो देश की अर्थव्यस्था के लिए हानिकारक है।

टैक्स स्लैब में कमी हो

एनसीआर चेंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के प्रेसिडेंट एचपी यादव का कहना है कि जीएसटी व्यापक स्तर के लिए सराहनीय है, मगर अधिकतम टैक्स स्लैब में 4 फीसदी की कटौती होनी चाहिए। लघु व मध्यम श्रेणी के उद्योगों के लिए स्लैब में 6 फीसदी की कटौती की मांग हो रही है। इसके अलावा टैक्स रिटर्न प्रणाली को और आसान करने की जरूरत हे। इसमें अभी भी काफी भ्रम की स्थिति है।