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खादी के लिए जिसने मास्टरी छोड़ जेल में बिताई रातें उसे भूल गई सरकार

शहीदों की मजारों पर जुड़ेंगे हर वर्ष मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशा होगा...।

Bhaskar News | Last Modified - Jan 26, 2018, 08:09 AM IST

खादी के लिए जिसने मास्टरी छोड़ जेल में बिताई रातें उसे भूल गई सरकार

हिसार। शहीदों की मजारों पर जुड़ेंगे हर वर्ष मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशा होगा...। जगदंबा प्रसाद मिश्रा की यह कविता उन शहीदों और क्रांतिकारियों को समर्पित थी। जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। पर, मौजूदा समय में यह कविता बेईमानी साबित होती दिखाई दे रही है क्योंकि अब मेले लगना तो दूर की बात है, स्वतंत्रता सेनानियों और उनके परिवार को 15 अगस्त या 26 जनवरी के दिन याद ही नहीं किया जाता है।

देश के लिए सब कुछ दांव पर लगाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार आज भी उपेक्षित है। स्वतंत्रता सेनानी मास्टर नान्हू राम का परिवार भी आज सरकार की उपेक्षा का शिकार हो रहा है। ये आरोप है स्वतंत्रता सेनानी मास्टर नान्हू राम की दोहती उर्मिला राठी का। बसंत विहार कॉॅलोनी निवासी उर्मिला राठी ने भास्कर के साथ अपना दर्द साझा किया। उन्होंने कहा कि भारत को अंग्रेजों से आजाद कराने में उनके नाना का भी मुख्य रोल रहा है। वह कई बार जेल गए, लेकिन अंग्रेजो भारत छोड़ो का नारा कभी नहीं छोड़ा।

उन्होंने जेल में करीब 10 वर्षों तक यातनाएं सही है। इन सबके बावजूद जसराना गांव के सरकारी स्कूल में प्रतिमा बनाकर इतिश्री कर दी गई। कितने साल बीत गए, पर उनके नाना और परिजनों को आज तक राष्ट्र समारोह में बुलाकर सम्मानित नहीं किया गया है। जिनके नाना हकदार भी है। वर्ष 1952 में स्वतंत्र भारत का पहला चुनाव लड़ने के बाद गोहाना हल्के से पंजाब विस के सदस्य बने। वह दो बार विधायक चुने गए और 1962 तक अपनी सेवाएं दी। इस दौरान जो वेतन राशि उन्हें मिली, वह भी सरकार को वापस लौटा दी। वर्ष1948 में गांधी की याद में एक लाख रुपए चंदा एकत्रित कर हाई स्कूल बनाया, जिसे बाद में सरकार को दे दिया।


खादी के कपड़े पहनने से किया मना तो छोड़ी मास्टर की नौकरी रोहतक से पढ़ाई पूरी करने के बाद उनकी नौकरी शिक्षाविभाग में लग गई। एक दिन वह सरकारी स्कूल में पढ़ा रहे थे तो अंग्रेज इंस्पेक्टर ने आकर निरीक्षण किया। उन्हें खादी के कपड़े पहने देखकर इंस्पेक्टर ने पूछा कि वह महात्मा गांधी को मानता है। तब नान्हू राम ने मना कर दिया, लेकिन जब नौकरी पर खादी के कपड़े पहनकर आने से मना कर दिया गया तो उन्होंने तुरंत प्रभाव से इस्तीफा दे दिया। मास्टर की नौकरी छोड़कर जिला कांग्रेस कमेटी के इंचार्ज बने और आजादी की लड़ाई में भाग लिया।

इस तरह रहा संघर्ष
वर्ष 1930 में नमक सत्याग्रह में शामिल होने के बाद संघर्ष शुरू हुआ। उन्हें 6 महीने की सजा मिली। फिर, वर्ष 1931 में दो मुकद्दमों पर दो साल की सजा मिली। 1932 में दोबारा असहयोग आंदोलन शुरू हुआ, तो एक साल की सजा काटी। 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह में फिर से जुड़े और एक साल के लिए जेल में गए। हाईकोर्ट के फैसले पर जेल से रिहा होने के बाद दोबारा से सत्याग्रह में भाग लिया और दोबारा से जेल में गए। 1942 के आखिर में नजरबंद कर दिया गया।

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Web Title: khaadi ke liye jisne maastri chhoड़ jail mein bitaaee raaten use bhul gayi srkar
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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