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इंस्पेक्टर सरोज की अग्रिम जमानत याचिका खारिज

दुष्कर्म की शिकायत पर सौदेबाजी और रिश्वत प्रकरण में आरोपी इंस्पेक्टर सरोज बाला को अतिरिक्त सेशन कोर्ट से गुरुवार...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 18, 2018, 03:15 AM IST

दुष्कर्म की शिकायत पर सौदेबाजी और रिश्वत प्रकरण में आरोपी इंस्पेक्टर सरोज बाला को अतिरिक्त सेशन कोर्ट से गुरुवार को राहत नहीं मिली। अदालत ने अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत में बचाव पक्ष के अधिवक्ता पीके संधीर और पब्लिक प्रोसिक्यूटर के बीच बहस हुई। इस दौरान पीड़ित पक्ष की तरफ से अधिवक्ता ने अपना पक्ष रखा। करीब एक घंटे तक बहस चली।

बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने कहा कि कस्टोडियन इंटेरोगेशन का सवाल ही नहीं उठता। इंस्पेक्टर सरोज बाला ने कई होटलों पर रेड मारी थी इसलिए उसे झूठे केस में फंसाया गया है। इस पर पब्लिक प्रोसिक्यूटर ने कहा कि विजिलेंस के पास इंस्पेक्टर के खिलाफ मामले में संलिप्तता संबंधित काफी सबूत हैं। अभी तक इन्वेस्टीगेशन को ज्वाइन भी नहीं किया है। इसलिए याचिका को खारिज कर दिया जाए। इस दौरान इस मामले में पीड़ित मोना-सतीश बिठमड़ा के अधिवक्ता महेंद्र सिंह नैन ने कहा कि हीनियस क्राइम हुआ है। इंस्पेक्टर सरोज बाला ने अपने पद का दुरुपयोग किया है। फर्जी शिकायतों में राजीनामा न होने पर पैसे नहीं मिलते थे तो झूठे केस में फंसा दो। अदालत ने तमाम पक्षों को सुनने के बाद याचिका को खारिज ही कर दिया।

बचाव पक्ष अधिवक्ता - कस्टोडियन इंटेरोगेशन का सवाल ही नहीं, इंस्पेक्टर को झूठा फंसाया

पब्लिक प्रोसिक्यूटर बोले - विजिलेंस के पास सबूत है, तफ्तीश में शामिल नहीं हुई इंस्पेक्टर

जानिए : बचाव पक्ष, पीड़ित पक्ष और पब्लिक प्रोसिक्यूटर के बीच बहस के अंश

बचाव पक्ष : द्वेष भावना के चलते इंस्पेक्टर सरोज को झूठे केस में फंसाया है। उसने होटलों पर छापा मारा था। इसलिए उस पर आरोप लगाए हैं। दुष्कर्म की शिकायत में युवती का नाम और आरोपी का नाम कुछ और है। हकीकत में उनके नाम कुछ और हैं लेकिन रिश्वत मांगने का आरोप लगा किसी दूसरे नाम के व्यक्ति ने शिकायत दर्ज करवाई है। रिश्वत लेते समय इंस्पेक्टर को नहीं पकड़ा है। ऐसे में आरोप बेबुनियाद है, जिसके आधार पर जमानत मंजूर की जाए।

पब्लिक प्रोसिक्यूटर रिश्वत प्रकरण में महिला थाना में तैनात ईएचसी सुरेंद्र के डिस्कलोजर में इंस्पेक्टर सरोज बाला की संलिप्तता उजागर हुई है। ईएचसी और बिचौलिया को पांच-पांच हजार रुपए और 60 हजार रुपए इंस्पेक्टर को देने थे। मामले में नामजद होने के बाद से इंस्पेक्टर फरार है। इन्वेस्टीगेशन को ज्वाइन नहीं किया। उसके खिलाफ काफी सबूत हैं। कस्टडी में आने के बाद अहम खुलासे हो सकते हैं। इंस्पेक्टर की जमानत याचिका खारिज की जाए।

पीड़ित पक्ष : कस्टोडियन इन्वेस्टीगेशन होनी चाहिए। ईएचसी की क्या हिम्मत कि वह किसी शिकायत के नाम पर रिश्वत ले। उसने अपने डिस्कलोजर में खुलासा किया था, तभी इंस्पेक्टर के विरुद्ध भी केस दर्ज हुआ है। इस मामले में छह-सात और शिकायतें आई हैं। यह काफी सीरियस इश्यू है। तफ्तीश हुई तो काफी खुलासे होंगे। इसलिए जमानत याचिका खारिज होनी चाहिए, ताकि विजिलेंस आगामी कार्रवाई कर सके।

अदालत ने पूछा : इंस्पेक्टर सरोज बाला क्या ड्यूटी पर है। जवाब मिला कि गैर हाजिर और मामले में फरार चल रही है। वहीं इंस्पेक्टर को अधिकारी बताने पर भी बहस हुई। तब बताया गया है कि इंस्पेक्टर कर्मचारी होता है। डीएसपी एवं इससे ऊपर स्तर के अधिकारी कहलाए जाते हैं।

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