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​मिर्चपुर कांडः दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बदला, 33 को दोषी करार दिया, 12 को उम्रकैद

हिसार के मिर्चपुर गांव में दलितों के साथ 2010 में हुई थी हिंसा। गांव से करना पड़ा था पलायन।

Dainik Bhaskar

Aug 25, 2018, 05:25 PM IST
मिर्चपुर में जलाए गए दलितों के घर। मिर्चपुर में जलाए गए दलितों के घर।

हिसार/नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2010 के मिर्चपुर हत्याकांड में दिए गए रोहिणी कोर्ट के फैसले को शुक्रवार को पलट दिया। जस्टिस एस मुरलीधर और आईएस मेहता की बेंच ने एससी-एसटी एक्ट के तहत मामले के 58 आरोपियों में से 33 को दोषी माना। इनमें से 12 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। 12 दोषियों को 2-2 साल और 9 को 1-1 साल कैद की सजा सुनाई गई है। हाईकोर्ट ने दोषियों को सरेंडर करने के लिए एक सितंबर तक का समय दिया। अगर किसी ने सरेंडर नहीं किया तो गिरफ्तारी वारंट जारी होंगे। कोर्ट ने हरियाणा सरकार को दोषियों पर लगाए गए जुर्माने की राशि का इस्तेमाल पीड़ितों के पुनर्वास के लिए करने का आदेश भी दिया। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि आजादी के 71 साल बाद भी दलितों के खिलाफ दबंगों के अत्याचार की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। कोर्ट ने कहा कि जाट समुदाय के लोगों ने वाल्मीकि समुदाय के घरों को जानबूझकर निशाना बनाया। गौरतलब है कि हिसार के इस मामले की निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केस दिल्ली के रोहिणी कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया था। रोहिणी कोर्ट ने कुल 97 आरोपियों में से 15 को सजा सुनाई थी।

इन्हें उम्रकैद की सजा
कुलविंदर, रामफल, राजेंद्र, कर्मवीर, संजय, प्रदीप, राजपाल, प्रदीप पुत्र सुरेश, धर्मवीर, जोगल, सत्यवान, पवन।

इनको 2-2 साल की जेल
कर्मपाल, धर्मवीर, सुमित, सुनील, मोनू, विकास, अमित, दीपक, प्रदीप पुत्र बलवान, सत्यवान, दयासिंह, राजबीर।

इनको 1-1 साल कैद हुई
जोगिंद्र, सोनू, जगदीश, राजेंद्र पुत्र धूपसिंह, रोशन लाल, सत्तु, प्रदीप पुत्र सतबीर, बलवान, जसवीर। कुलविंद्र, रामफल, राजेंद्र व पवन को आईपीसी की धारा 302 व एससी-एसटी एक्ट की धारा 3 (2) (4) में भी सजा हुई है। अन्य दोषियों को भी एससी-एसटी एक्ट में सजा सुनाई है। बलजीत, भोबल, ऋषि व जगदीश की सुनवाई के दौरान मौत हो चुकी है।

पहले 97 में से 15 को सजा हुई थी, अब 58 के खिलाफ चली सुनवाई, 33 को सजा, 4 की हो चुकी मौत
पीड़ित पक्ष के एडवोकेट रजत कल्सन व श्रीजी भावसर ने बताया कि रोहिणी काेर्ट में चले मामले के दौरान कुल 97 आरोपी थे। रोहिणी कोर्ट ने उनमें से 15 को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी। तीन को उम्रकैद, पांच को 5-5 साल की कैद एवं 7 को 2-2 साल की सजा सुनाई थी। 5 नाबालिग आरोपियों का केस हिसार के जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में केस चला। एक आरोपी को 3 साल की सजा हुई। दिल्ली हाईकोर्ट में 58 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई चली। 33 को सजा सुनाई गई है।

आगे क्या

हाईकोर्ट ने 58 में से 21 आरोपियों को बरी किया है। पीड़ित पक्ष के वकील इन्हें सजा दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकते हैं। वहीं, आरोपी पक्ष के लोगों ने भी सजा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है।

कोर्ट की टिप्पणी : क्या अलग टाउनशिप बनाने से सामाजिक और समानता का अधिकार मिल जाएगा?
इस केस में जिन्होंने गवाही नहीं दी, वे गांव में जाकर रहने लगे। लेकिन जिन्होंने गवाही दी, वे डर के कारण गांव नहीं गए। उनके मन में खौफ का माहौल है। इसलिए राज्य सरकार को उनके लिए अलग से ढंढूर में टाउनशिप बनाने का निर्णय लेना पड़ा। संविधान समानता व सामाजिक अधिकार देता है। क्या केवल टाउनशिप बनाने से यह अधिकार मिल जाएगा? देश को आजाद हुए 71 साल हो गए। लेकिन दलितों के खिलाफ दबंगों के अत्याचार की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। मिर्चपुर कांड उसकी याद दिलाता है। 25 नवंबर 1949 को संविधान का अंितम ड्राफ्ट पेश करते हुए डाॅ. भीमराव अाम्बेडकर ने समानता और भाईचारे पर जोर दिया था। आज भारतीय समाज में इनका पूरी तरह अभाव दिख रहा है। डॉ. अाम्बेडकर ने 26 जनवरी 1950 को कहा था कि राजनीति में आदमी एक, वोट एक और एक वोट एक वेल्यू। लेकिन सामाजिक व आर्थिक जीवन में एेसा नहीं है। आजाद होना एक तरह से खुशी की बात है, लेकिन अंग्रेजों के समय हमारे साथ ज्यादती होती थी तो दोष अंग्रेजों को दिया जाता था, पर आजाद होने के बाद दोष किसी और को नहीं दे सकते। इसके लिए हम ही जिम्मेदार हैं। लोग चाहते हैं कि सरकार लोगों के द्वारा, लोगों के लिए और लोगों की ही बने।
(जस्टिस एस मुरलीधर और आईएस मेहता की फैसले में की गई टिप्पणी)

29 गवाहों की सुरक्षा के लिए आज दायर की जाएगी याचिका
पीड़ित पक्ष के वकीलों ने बताया कि फैसले के बाद गवाहों की जान को खतरा है। अभी दोषियों की गिरफ्तारी नहीं हुई है। इसलिए शनिवार को हाईकोर्ट में याचिका दायर कर 29 गवाहों और उनके परिवारों को फिर से सुरक्षा मुहैया कराने की मांग करेंगे।

मामला 2010 का : आगजनी में बुजुर्ग और उसकी दिव्यांग बेटी जिंदा जल गई थी
20 अप्रैल 2010 को मिर्चपुर में कुतिया को पत्थर मारने पर विवाद हुआ था। जाट समुदाय के लोगों ने 21 अप्रैल को वाल्मीकि बस्ती को घेरकर आगजनी व हिंसा की थी। इसमें 18 घर पूरी तरह जला दिए गए थे। वाल्मीकि समुदाय के बुजुर्ग ताराचंद व उनकी दिव्यांग बेटी सुमन जिंदा जल गई थी। 50 लोगों को चोटें आई थी। हिसार कोर्ट में पीड़ित पक्ष के वकीलों से मारपीट हुई तो केस दिल्ली ट्रांसफर कराना पड़ा।

ग्राउंड रिपोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद मिर्चपुर में खामोशी पसरी है। सुरक्षा के मद्देनजर गांव में बख्तरबंद वाहन व भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। पुलिस व प्रशासन के अफसर गांव पर नजर बनाए हुए हैं। आरोपी पक्ष से जुड़े परिवार के सदस्यों का कहना है कि फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील की जाएगी। साथ ही कुछ लोग सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं। दिल्ली के रोहिणी कोर्ट के फैसले के अनुसार 5 वर्ष की सजा काट चुके धर्मबीर ने कहा कि सीबीआई जांच होती तो हमें न्याय मिलता। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील करेंगे। चंद्रसिंह वाल्मीकि व उनकी पत्नी फूलकली ने कहा कि राजीनामे में ही भलाई है। वाल्मीकि समुदाय के ही सजना, प्रवीन, कुलबीर, राजेंद्र, अशोक, उमेश, बीरभान व राजेश ने कहा कि हम घटना को भूल चुके थे। पहले कोर्ट ने जो फैसला सुनाया था, उससे हम संतुष्ट थे। सरपंच सत्यवान ढांडा ने कहा कि फैसले की कॉपी जब तक हाथ में नहीं आ जाती, इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।

घरों के अंदर रखा सामान जलकर हो गया था राख। घरों के अंदर रखा सामान जलकर हो गया था राख।
घर के अंदर एक पिता और विकलांग बेटी की हो गई थी मौत। घर के अंदर एक पिता और विकलांग बेटी की हो गई थी मौत।
केंद्र ने सीआरपीएफ को कर दिया था तैनात। केंद्र ने सीआरपीएफ को कर दिया था तैनात।
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मिर्चपुर में जलाए गए दलितों के घर।मिर्चपुर में जलाए गए दलितों के घर।
घरों के अंदर रखा सामान जलकर हो गया था राख।घरों के अंदर रखा सामान जलकर हो गया था राख।
घर के अंदर एक पिता और विकलांग बेटी की हो गई थी मौत।घर के अंदर एक पिता और विकलांग बेटी की हो गई थी मौत।
केंद्र ने सीआरपीएफ को कर दिया था तैनात।केंद्र ने सीआरपीएफ को कर दिया था तैनात।
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