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अदालत प्रेरित अनगिनत फिल्में और उपन्यास

अक्षय कुमार अभिनीत ‘जॉली एलएलबी’ की सफलता से प्रोत्साहित अदालत केंद्रित फिल्में फिर बनने लगी हैं। बलदेवराज...

Dainik Bhaskar

Mar 31, 2018, 03:45 AM IST
अदालत प्रेरित अनगिनत फिल्में और उपन्यास
अक्षय कुमार अभिनीत ‘जॉली एलएलबी’ की सफलता से प्रोत्साहित अदालत केंद्रित फिल्में फिर बनने लगी हैं। बलदेवराज चोपड़ा की ‘कानून’ में गहरा रहस्य रचा गया था परंतु अंतिम भाग में अपराधी का जज का हमशक्ल होना दिखाकर उन्होंने आसान रास्ता अपनाया। विजय तेंडुलकर का ‘शांतता कोर्ट चालू आहे’ अत्यंत सफल रहा और यह नाटक फिल्माया भी गया। अगाथा क्रिस्टी का ‘विटनेस फॉर प्रॉसिक्यूशन’ दशकों तक मंचित हुआ और फिल्माया भी गया। छोटे परदे पर भी ‘अदालत’ कार्यक्रम एक दशक से दिखाया जा रहा है। संजीव बक्षी की ‘भूलन कांदा’ में भी अदालत का अभूतपूर्व दृश्य है।

आधुनिक भारत की ‘महाभारत’ की तरह रचे गए श्रीलाल शुक्ल के ‘राग दरबारी’ में एक व्यक्ति सारा जीवन अपने पक्ष में हुए फैसले की प्रतिलिपि प्राप्त करने का प्रयास करता है और रिश्वत नहीं देने की उसकी ज़िद के कारण उसे कागज नहीं मिलते। अदालतें फुटबॉल खेल की तरह होती हैं, जिसमें गेंद एक-दूसरे को दी जाती है और गोल हो जाना फैसले की तरह होता है। ख्वाजा अहमद अब्बास की लिखी ‘आवारा’ में नायक 45 मिनट बाद ही परदे पर दिखाई देता है परंतु उससे बचने के लिए पटकथा में पहला ही दृश्य अदालत का रखा गया, जिसमें सारे पात्र मौजूद है। नायक मुजरिम के कठघरे में खड़ा है, उस पर कत्ल का मुकादमा कायम है और नायिका उसकी ओर से पैरवी कर रही है तथा जज रघुनाथ पर आरोप लगा है। इस दृश्य के फिल्मांकन में जज राज कपूर के दादा हैं, पिता पृथ्वीराज भी हैं और तीन पीढ़ियां एक ही दृश्य में अभिनय कर रही हैं। नायिका से उनकी गहरी अंतरंगता रही है।

ख्वाजा अहमद अब्बास ने अपनी ‘आवारा’ की पटकथा मेहबूब खान को दी थी और वे फिल्म बनाना चाहते थे। मेहबूब खान जज रघुनाथ की भूमिका पृथ्वीराज कपूर को और पुत्र की भूमिका दिलीप कुमार को देना चाहते थे। अब्बास साहब का विचार था कि यथार्थ के पिता-पुत्र ही भूमिकाएं अभिनीत करें तो फिल्म में प्रस्तुत भावना को धार मिलेगी। अब्बास साहब और मेहबूब खान के इस मतभेद की बात नरगिस ने राज कपूर को बताई। मुंबई के शिवाजी पार्क के नज़दीक एक श्मशान भूमि के निकट बने होटल में अब्बास साहब रहते थे। बहरहाल, राज कपूर आधी रात अब्बास साहब को मिलने गए और अलसभोर तक पटकथा सुनी। उस समय उनकी जेब में मात्र एक रुपया था, जो उन्होंने लेखक को पेशगी स्वरूप दिया। ‘आवारा’ की सफलता ने राज कपूर का जीवन ही बदल दिया। ग्राम पंचायत भी अदालत का ही एक स्वरूप है और मुंशी प्रेमचंद की ‘पंच परमेश्वर’ श्रेष्ठ कथा है। अदालत से जुड़ा साहित्य भी कमाल का है। शेक्सपीयर की पोर्शिया भी महाजन से कहती है कि अपने करार के अनुरूप वह एक पाउंड मांस कर्जदार व्यक्ति का काट सकता है पर एक बूंद खून भी नहीं बहना चाहिए, क्योंकि करारनामे में खून का जिक्र नहीं है।अब सारी गणतांत्रिक संस्थाअों को योजनाबद्ध ढंग से तोड़ा जा रहा है। कुछ समय पूर्व ही न्यायाधीश समुदाय ने इसका विरोध किया था और पहली बार न्याय देने वालों को न्याय के लिए गुहार लगाना पड़ी। सेना की अदालत अलग होती है, जिससे प्रेरित फिल्म ‘शौर्या’ एक महान फिल्म है। नानावटी प्रकरण पर दो बार फिल्में बन चुकी हैं। पहली बार बनी आरके नय्यर की फिल्म यथार्थ के अधिक निकट थी। दूसरी बार बनी फिल्म में देशप्रेम का तड़का लगाया गया था। लिआन युरिस का उपन्यास ‘क्वींस कोर्ट नंबर 7’ अत्यंत रोचक है। राजकुमार संतोषी की फिल्म ‘दामिनी’ में सनी देओल द्वारा कहा गया संवाद ‘तारीख पर तारीख पड़ती है, न्याय नहीं मिलता’ अब दसों दिशाओं में गूंजता-सा लगता है। इसी तरह मेहबूब खान की फिल्म ‘अमर’ पर एक किताब लिखी जा सकती है।

जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

jpchoukse@dbcorp.in

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