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विदेशी निवेश के लिए भारत की नई शर्तों पर ज्यादातर देश राजी नहीं

Bhaskar News Network | Last Modified - Jan 20, 2018, 04:05 AM IST

अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन में जाने से पहले निवेशक को भारतीय अदालतों में कम से कम 5 साल तक केस लड़ना पड़ेगा।

राज्यों के किसी फैसले से टैक्स को लेकर विवाद हुआ तो विदेशी निवेशक केंद्र सरकार से दावा नहीं कर सकते हैं।

पिछले साल 50 देशों से करार रद्द कर सरकार ने नया मॉडल एग्रीमेंट तैयार किया

लेकिन निवेश की सुरक्षा कम होने से समझौते के लिए तैयार नहीं हैं प्रमुख देश

एजेंसी | नई दिल्ली

पिछले साल करीब 50 देशों के साथ निवेश करार रद्द करना भारत के लिए भारी पड़ रहा है। समझौते के लिए भारत ने नया मॉडल एग्रीमेंट तैयार किया है। लेकिन ज्यादातर देश नई शर्तों पर करार के लिए तैयार नहीं हैं।

इस कारण कनाडा, यूरोपियन यूनियन और ईरान जैसे देशों से विदेशी निवेश रुका हुआ है। इन देशों के वार्ताकारों का कहना है कि निवेशक भारत में आना तो चाहते हैं, लेकिन वे अपने निवेश की सुरक्षा भी चाहते हैं। सूत्रों ने बताया कि भारत का नया मॉडल एग्रीमेंट ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे दूसरे विकासशील देशों के समान है, फिर भी 10 महीने से बात आगे नहीं बढ़ी है। यूरोपियन कमीशन के अधिकारियों का कहना है कि भारत का मॉडल एग्रीमेंट पुराने और नए निवेशकों में भेदभाव करता है। पुराने निवेशकों को तो पुरानी संधि के तहत छूट दी गई है। उनके निवेश को तो सुरक्षा मिलती रहेगी, लेकिन नए निवेशकों के मामलों में ऐसा नहीं है। कनाडा 2004 से भारत के साथ करार के लिए बातचीत कर रहा है। लेकिन अभी तक कोई नतीजा नहीं निकला। भारत इस समय करीब 20 अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन में उलझा हुआ है। ज्यादातर मामले रेट्रोस्पेक्टिव यानी पुरानी तारीख से टैक्स लगाने से जुड़े हैं। हारने पर भारत सरकार को दावा करने वालों को हजारों करोड़ रुपए का हर्जाना देना पड़ सकता है।

हाल ही जापान की निसान कंपनी ने 77 करोड़ डॉलर (लगभग 5,000 करोड़ रुपए) का मुकदमा दायर किया है। तमिलनाडु सरकार से वादे के मुताबिक इन्सेंटिव नहीं मिलने के कारण इसने केंद्र से यह रकम मांगी है। इनसे पहले वोडाफोन, केयर्न एनर्जी और ड्यूश टेलीकॉम भी भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन में गई हैं।

नई शर्तें जिन पर निवेशकों को आपत्ति है

पुराने करार में ज्यादा हर्जाने की शर्त थी

पुराने समझौते 1990 के दशक में किए गए थे। तब देश को विदेशी पूंजी की जरूरत थी। इसलिए उस समय की सरकारों ने अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन में हारने पर ज्यादा हर्जाना देने जैसी शर्तों को भी मान लिया था।

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