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मोदी का कांग्रेस को निशाना बनाना निरर्थक नहीं

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शारीरिक भाषा पढ़ना निरर्थक है। वे इतने मझे हुए कलाकार हैं कि पंक्तियों या मुद्राओं...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 13, 2018, 04:20 AM IST

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शारीरिक भाषा पढ़ना निरर्थक है। वे इतने मझे हुए कलाकार हैं कि पंक्तियों या मुद्राओं के बीच कुछ अनकहा अथवा अप्रदर्शित नहीं छोड़ते। वे कैम्पेन की मुद्रा में इतने व्यस्त रहते हैं कि 2014 की जीत के बाद जल्द ही उनके भाषण ऐसे लगने लगे कि जैसे वे फिर मैदानी लड़ाई में उतर गए हैं। संसद के दोनों सदनों में उनके पिछले दो भाषणों में विपक्ष के लिए आमतौर पर दिखने वाले तिरस्कार की तुलना में गुस्से का भाव ज्यादा था। सबसे बड़ी बात कांग्रेस उनके दिमाग में फिर सबसे बड़ी चिंता के रूप में लौट आई है। लोकसभा के भाषण में करीब एक दर्जन बार कांग्रेस का सीधा उल्लेख है।

कांग्रेस के अलावा नेहरू से शुरुआत करके ‘वंश’ को लेकर कई अन्य संदर्भ भी थे। उनके व उनके प्रत्येक उत्तराधिकारी के विवाद गिनाए गए। नेहरू के लिए कश्मीर, इंदिरा के लिए आपातकाल, राजीव के लिए 1984 के दंगे, सोनिया के लिए जल्दी में किया आंध्र का राजनीतिक विभाजन और राहुल का सार्वजनिक रूप से अध्यादेश फाड़ना। यह कह सकते हैं कि बदलती हवा महसूस करके भी सत्तासीन नेता अविचलित हैं। या वे इतने हिल गए हैं कि कांग्रेस को जरूरत से ज्यादा महत्व दे रहे हैं। याद रखें, मोदी की शैली में कुछ भी परम्परागत लागू नहीं होता। जो उन्हें जानते हैं वे बताएंगे कि वे किसी विपक्ष को कभी हल्के में नहीं लेते।

2019 की परीक्षा में कांग्रेस को कैसा भी आंका जाए पर इस साल त्रिपुरा को छोड़कर हर प्रादेशिक चुनाव में भाजपा के लिए वही मुख्य चुनौती है। उपचुनाव में सफलता के बाद उसे मध्यप्रदेश व राजस्थान में मौका दिख रहा है। मोदी जानते हैं कि 2018 के यही छह-सात चुनाव 2019 की दिशा तय करेंगे। यदि कांग्रेस कर्नाटक में कायम रहती है तो बाद में राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में हवा का रुख इसके साथ होगा। यदि इनमें से दो जीत लेती है, तो 2019 के लिए तमाम बाजियां खुल जाएंगी। भाजपा कर्नाटक हथिया लेती है तो दृश्य बदल जाएगा।

मोदी उस आज्ञाकारी बैट्समैन की तरह नहीं हैं, जो कोच की इस सलाह को मानता है कि सामने वाली गेंद पर ही फोकस रखो, आगे आने वाली की चिंता मत पालो। मोदी ऐसे खिलाड़ी हैं, जो पिच, मौसम, अम्पायर और मीडिया सबको ध्यान में रखकर खेलेंगे। उनका तरीका मध्ययुगीन विजय अभियानों की तरह है, जिसमें विजेता का ही सबकुछ होता है। इसीलिए जैसा एक चरण में गुजरात में हुआ था, थोड़ी भी कठिनाई नज़र आई कि वे पाकिस्तानियों और डॉ. मनमोहन सिंह के हाथ मिलाने के षड्यंत्र की अद्भुत कहानी सहित सबकुछ दांव पर लगा देते हैं। गुजरात में अपेक्षा से अधिक निकट का फैसला और राजस्थान उपचुनाव के नतीजे संकट के अधिक दर्शनी संकेत हैं।

कुछ अन्य भी हैं। करीब छह माह का यह सबसे लंबा वक्त है जब राहुल गांधी ने बिना भटके फोकस दिखाया है। उन्हें पार्टी के भीतर और लोगों में प्रतिसाद मिला है। आज अन्य दल कांग्रेस के साथ आने के इच्छुक नहीं हैं, पर यह कर्नाटक में कायम रहती है तो रुख बदल भी सकता है। ध्यान रहे मोदी व शाह इतने चतुर हैं कि कांग्रेस को 2014 की 44 सीटों के नज़रिये से ही नहीं देखते रहेंगे। उन्हें अहसास है कि तब उनकी पार्टी ने 17 करोड़ वोट हासिल किए तो चुनाव में कांग्रेस को भी करीब 11 करोड़ वोट मिले। लेकिन, कांग्रेस यदि सिर्फ 11 से 13 करोड़ वोट पर पहुंच जाए तो इसका नतीजा होगा एक अलग किस्म का एनडीए। यही टालने के लिए मोदी-शाह संघर्ष कर रहे हैं।

जब से देश ने स्पष्ट जनादेश देना (1984 के बाद से) बंद किया है, तो मैंने गठबंधन सरकारों पर बेस्ट-ऑफ-नाइन-सेट टेनिस मैच का लॉजिक लागू होते देखा है। इसलिए नौ प्रमुख राज्य देखें जहां राजनीतिक भाग्य बदल सकता है : उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश (2014 में तेलंगाना सहित), मध्यप्रदेश, बिहार, राजस्थान, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु को इस टेनिस मैच के नाइन सेट्स समझें। इनमें से पांच जीतने वाला कोई भी दल या गठजोड़, गठबंधन बनाकर देश पर शासन कर सकता है। इन राज्यों में 351 सीटें हैं और जो भी पक्ष पांच जीतेगा वह 200 पार कर लेगा। यह नया 272 है, क्योंकि यह तब पर्याप्त छोटे दलों को आकर्षित कर लेगा। 2014 की मोदी-शाह जीत ने इसे अप्रचिलित कर दिया था। निकट से देखेंगे तो उनकी चिंता समझ में आएगी। 282 में पूरा राजस्थान, मध्यप्रदेश में दो छोड़कर सारी, महाराष्ट्र में 48 में से 42 और उत्तर प्रदेश व बिहार में क्रमश: 80 में से 73 व 40 में से 31 (जिसमें कुछ सहयगियों की सीटें शामिल हैं)। इसके अलावा गुजरात, उत्तराखंड और हिमाचल में सफाया तथा झारखंड, छत्तीसगढ़ और हरियाणा जैसे छोटे राज्यों में लगभग सफाया। भाजपा की समस्या यह है कि इसके 282 में भगवा हिंदी हृदय प्रदेश व पश्चिम का बहुत भारी योगदान है। दक्षिण व पूर्व ज्यादातर बाहर रहे लेकिन, तब इसका महत्व नहीं था। एक तरह से भाजपा की 2014 की जीत 1977 की जनता पार्टी की जीत जैसी थी।

भाजपा जानती है कि सफाये वाले राज्यों में इसे दोहराना असंभव होगा। यहां तक कि गुजराज में भी कुछ क्षति हो संभव है। यदि देश का राजनीतिक नक्शा देखें तो फिर से 272 का आंकड़ा पार करना असंभव है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र (खासतौर पर जब शिवसेना अलग हो गई हो) और उत्तर प्रदेश में हानि होगी। पूर्वोत्तर से कुछ सीटों को छोड़कर यह खामी कोई नहीं भर सकता।

यही वजह है कि हम बिना स्पष्ट बहुमत के भाजपा वाली एनडीए सरकार की संभावना की बात करें, कांग्रेस सत्ता में आती नहीं दिखती। छह माह पहले बिना भाजपा के बहुमत वाला एनडीए एक कल्पना लगती थी। आज यह संभव है। जैसा हमने पहले कहा है बिना बहुमत वाले प्रधानमंत्री मोदी आधे मोदी ही रह जाएंगे। उनकी शैली एकाधिकारवादी है, सामंजस्य वाली नहीं। केंद्र में पांच साल और गुजरात में 13 साल पूर्ण बहुमत वाली सरकार चलाने के बाद वे लेन-देन वाली सरकार नहीं चलाना चाहते। यही वजह है कि वे 2019 के चुनाव अभियान पर निकल चुके हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)



महिला अधिकारों पर सिर्फ बातें करने से कुछ नहीं होगा



करंट अफेयर्स पर 30 से कम उम्र के युवाओं की सोच

महेश तिवारी, 20

माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय, भोपाल

Twitter @maheshauthor

शेखर गुप्ता

एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

Twitter@ShekharGupta

देश में महिलाओं के विषय में बात होना अच्छी बात है। बीते दिनों मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने कहा कि महिलाओं का सम्मान करना हमारी संस्कृति में है। आज महिलाएं हर विधा और हर क्षेत्र में नए आयाम छू रही हैं। प्रधानसेवक ने स्कंद पुराण का ज़िक्र करते हुए कहा, एक बेटी दस बेटों के बराबर होती है। अगर आत्मविश्वास है, तो कुछ भी संभव नहीं है।

प्रधानमंत्री की ये बातें सुनकर सवाल यही उठता है कि सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में महिलाओं की क्या स्थिति है? यह किसी से छिपी नहीं है। फिर महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक स्थिति में सुधार का व्यापक कदम उठाया क्यों नहीं जाता? सभी क्षेत्रों में महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिए जाने की बातें होती हैं, लेकिन उसे अमलीजामा क्यों नहीं दिया जाता? संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण न मिल पाना ही यह साबित करने के लिए काफी है कि शायद राजनीति भी दोमुंही बात करने में ज्यादा यकीन रखती है। जब महिलाओं की सामाजिक स्थिति सुधारनी ही है तो फिर उन्हें राजनीतिक और सामाजिक अधिकार क्यों नहीं दिए जा रहे। देश में स्त्रियों की दशा और दिशा सुधारने की राजनीतिक पहल करने की बात मुखर होती रहती है। फ़िर अगर किसी लड़की के साथ सामाजिक या शारीरिक उत्पीड़न होता है, तो हो सकता है कि मुकदमा दर्ज करने और घटना सुनने वाला कोई पुरुष हो।

पुलिस बल में महिलाओं की बेहतर उपस्थिति सुनिश्चित करने 2009 में मनमोहन सिंह सरकार ने सभी केंद्र शासित प्रदेशों और राज्यों के पुलिस बल में महिलाओं की संख्या कम से कम 33 फीसदी करने के लिए कहा था। पर यह महिलाओं के अधिकार के प्रति अचेतन अवस्था का परिणाम है कि महिला अपराधों में तेजी से वृद्धि हो रही है, लेकिन पुलिस बल में महिलाओं की संख्या में विशेष अजाफा होता नहीं दिख रहा। देश में सिर्फ 586 महिला पुलिस थाने हैं, यानी प्रत्येक जिले में एक भी नहीं। देश में लगभग 641 जिले हैं। यह साबित करता है कि हमारा पितृसत्तात्मक समाज आज भी महिलाओं को उनका अधिकार देने से कतरा रहा है।

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